सुरक्षा को लेकर अभी चुनौती बने रहेंगे घुसपैठिये
घुसपैठियों के खिलाफ प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के प्रतिबद्ध और प्रखर बयानों को देखते हुए लगता है कि अब अवैध प्रवासियों एवं घुसपैठियों की खैर नहीं, जल्द ही कोई बड़ा कदम इस ओर उठेगा और देश के संसाधनों का अनुचित लाभ उठाने वाले आर्थिक नुकसान पहुंचाने और सामाजिक ताने बाने को ध्वस्त करने वाले इन घुसपैठियों को चुन-चुनकर देश के निकाल दिया जायेगा, परन्तु क्या सचमुच ऐसा हो पायेगा?
लगता है कि जल्द ही इस ओर कोई बड़ी पहल सामने आने वाली है। प्रधानमंत्री अपनी चुनावी सभाओं में लगातार घुसपैठियों तथा अवैध अप्रवासियों से मुक्त भारत की बात कर रहे हैं। प्रधानमंत्री के बयानों की दृढ़ता यह दर्शाती है कि वह इस समस्या को स्थानीय राजनीति, कानून-व्यवस्था का ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और जनसांख्यिकीय संतुलन का प्रश्न भी मानते हैं। उनको यह भी भान होगा कि विगत दो दशकों से उनकी सरकार के सामने यह समस्या मौजूद है, पर विगत सरकारों को दोष देने और हर बार चुनावों में इस मुद्दे को उठाने, कुछ घोषणाओं और आधे-अधूरे प्रयासों के अलावा कोई ठोस समाधान अभी तक सामने नहीं आया है।
हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते बरस भी 15 अगस्त को लाल किला से भारत में मौजूद घुसपैठियों का ज़िक्र किया था, फिर उसी महीने और अगले महीने यही बात उन्होंने बिहार चुनावों में भी दोहराई थी। चुनावी भाषणों के अलावा भी वे घुसपैठियों के मुद्दे पर चिंता व्यक्त करते रहे हैं और अब बंगाल चुनावों से पहले उनकी यह चिंता चरम पर दिखती है। प्रधानमंत्री ही नहीं गृहमंत्री ने भी कई बार इस आशय के बयान दिये हैं कि वे घुसपैठियों को अब चुन-चुनकर देश के बाहर निकालने वाले हैं। प्रधानमंत्री ने छह महीने पहले इसके प्रति अपनी प्रतिबद्धता का प्रमाण देते हुए घुसपैठियों की समस्या से निबटने के लिये बड़े जोरशोर से डेमोग्राफी मिशन शुरू करने की भी बात कही और घोषणा की थी कि बहुत जल्द ये मिशन अपना काम शुरू करेगा। सर्वविदित है कि घुसपैठ के असर बहुआयामी हैं। घुसपैठिए सरकारी योजनाओं और राजनीतिक संरक्षण का लगातार अनुचित लाभ उठाते जा रहे हैं, जिससे सरकार पर अनावश्यक आर्थिक बोझ बढ रहा है। जनसांख्यिकी बदलावों के चलते स्थानीय समुदायों में जातीय अस्मिता, भाषा और भूमि को लेकर तनाव बढ़ रहा है। सामाजिक तनाव और अपराधों में वृद्धि हो रही है। कृषि, निर्माण और घरेलू मजदूरी के क्षेत्रों में इन घुसपैठियों के सस्ते श्रमिक बन जाने से स्थानीय मजदूरों की रोजी-रोटी पर असर पड़ता है। घुसपैठिए वोटर आईडी और आधार कार्ड जैसे फर्जी दस्तावेज़ बनाकर चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर लोकतंत्र को कमज़ोर तो कर ही रहे हैं, इसके अतिरिक्त वे सीमावर्ती राज्यों में नकली करेंसी, नशीली दवाओं, गायों की तस्करी और आतंकवादियों के स्लीपर सेल बनने का माध्यम भी बन रहे हैं।
आंकड़ों का प्रश्न इस समाधान की सबसे कमज़ोर कड़ी है। 2004 में यूपीए सरकार ने 1.2 करोड़ का आंकड़ा दिया था। आज उनकी आधिकारिक संख्या क्या है? पश्चिम बंगाल के भाजपा प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष और किरेन रिजिजू के अनुसार भारत में लगभग 2 करोड़ मुसलमान बांग्लादेशी घुसपैठिए मौजूद हैं जिसमें से एक करोड़ पश्चिम बंगाल में हैं। पर इनका न तो कोई स्रोत है न ये आधिकारिक। तकरीबन दशक, दो दशक पहले पश्चिम बंगाल में 57 लाख और असम में 50 लाख घुसपैठियों का जो आंकड़ा दिया गया था, वह भी प्रमाणिक नहीं है। संसद में सरकार की तरफ से नित्यानंद राय ने जो एक लाख दस हज़ार अवैध प्रवासियों का आंकड़ा दिया वह भी अधूरा है। यूपीए सरकार के अनुसार 2005-2013 के बीच 88,792 अवैध अप्रवासियों को निर्वासित किया गया जबकि 2014-2019 के बीच यह संख्या घटकर 2,566 रह गई। 2019 के बाद कोई विश्वसनीय आधिकारिक आंकड़ा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है, क्यों? सरकार मानती है कि बांग्लादेश घुसपैठियों और अवैध अप्रवासियों की तादाद भी लगातार बढ़ती जा रही है।
गृहमंत्री के अनुसार बांग्लादेश के अंदर लगभग 20 प्रतिशत अल्पसंख्यकों की आबादी घटी है। ये लोग मारे गये या धर्म परिवर्तन हो गया या फिर शरणार्थी बनकर अपने धर्म और सम्मान को बचाने के लिए वे भारत में आए, तो क्या बांग्लादेश से आने वाले बहुत-से घुसपैठियों में हिंदू शरणार्थी भी शामिल हैं? इनका भी स्पष्ट आंकड़ा क्यों नहीं है? सरकार को पारदर्शी आंकड़ों के आधार पर समयबद्ध कार्ययोजना, अंतर-मंत्रालयी समन्वय, सीमांत प्रबंधन की मजबूती और मानवाधिकार-सम्मत, लेकिन ठोस कदम उठाने होंगे। तभी ‘घुसपैठ मुक्त भारत’ का सपना साकार होगा।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



