राजनीतिक दृष्टिकोण से भी देखा जा रहा है प्रधानमंत्री का पंजाब दौरा
असर ना हो जो दिल पे तो वो सह़ाफत क्या है,
समझ में साफ आ जाए तो सियासत क्या है।
समाचार हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 1 फरवरी को पंजाब आ रहे हैं। वैसे तो प्रधानमंत्री का दौरा स्वागतयोग्य है, परन्तु इस समय चर्चा इसके राजनीतिक अर्थ समझने की भी चल रही है। सच तो यही है कि किसी राजनीतिज्ञ के किसी भी कदम के अनेक ही अर्थ होते हैं और उसका वास्तविक लक्ष्य क्या है, उसे समझना आम लोगों के बस की बात नहीं होती, परन्तु फिर भी जो सरगोशियां सुनाई दे रही हैं, उनके अनुसार प्रधानमंत्री मोदी 1 फरवरी को शाम के चार बजे गुरु रविदास जी की जन्म जयंती के अवसर पर डेरा बल्लां पहुंच रहे हैं। डेरा बल्लां के प्रमुख संत निरंजन दास जो गुरु रविदास जी के जन्म स्थान सीर गोवर्धनपुर (उत्तर प्रदेश) जो प्रधानमंत्री के ही लोकसभा क्षेत्र में पड़ता है, के भी प्रमुख हैं, वह उस दिन जन्म स्थान पर पहुंचे होंगे। हो सकता है कि वह भी विमान से शाम 4 बजे तक डेरा बल्लां पहुंच जाएं। उल्लेखनीय है कि इस दौरे से बिल्कुल पहले भारत सरकार ने पंजाब सरकार द्वारा पद्म सम्मानों के लिए भेजे नामों की सूची को नकार कर जिन तीन पंजाबियों को पद्म पुरस्कार के लिए चुना है, उनमें संत निरंजन दास जी का नाम भी शामिल है।
अब जब पंजाब तथा उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों का बिगुल बज चुका है तो इस सम्मान के बिल्कुल बाद प्रधानमंत्री के स्वयं डेरा बल्लां प्रमुख को मिलने पहुंचने के कई राजनीतिक अर्थ लिए जा रहे हैं। बेशक प्रधानमंत्री गुरु रविदास जी को श्रद्धा भेंट करने के लिए आ रहे होंगे, परन्तु इसके राजनीतिक अर्थों से इन्कार नहीं किया जा सकता। उल्लेखनीय है कि पंजाब में लगभग 33 प्रतिशत दलित वोट हैं, जिसमें भारी संख्या रविदास समुदाय की है। उत्तर प्रदेश में भी दलित समुदाय के लगभग 21 प्रतिशत वोट हैं। आमतौर पर पंजाब में प्रभाव है कि रविदासी समुदाय अधिकतर कांग्रेस की ओर जाता है, चाहे पिछले विधानसभा चुनाव में वह बड़ी सीमा तक ‘आप’ की ओर भी झुका था। इसके राजनीतिक प्रभावों की चर्चा इसलिए भी अधिक है क्योंकि इस दौरे से लगभग दो माह पहले डेरा बल्लां प्रमुख की दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात हुई थी, जिसमें पंजाब भाजपा के बड़े नेता एवं राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ, पूर्व केन्द्रीय मंत्री विजय सांपला तथा अविनाश चन्द्र के उपस्थित होने की बात भी चर्चा में रही है।
समझा जाता है कि रविदासिया समुदाय को अपने साथ जोड़ने के लिए भाजपा तथा कांग्रेस दोनों ही पार्टियां ज़ोर लगा लही हैं। दूसरी ओर मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान भी चुनावी लड़ाई शुरू होने के बाद ही 6 फरवरी को गुरु रविदास जी के तपोस्थान खुरालगढ़ (होशियारपुर) में 151 फुट ऊंचे मीनार-ए-ब़ेगमपुरा का उद्घाटन भी कर रहे हैं।
़खैर, इस दौरे के राजनीतिक अर्थ तो अपनी जगह हैं, परन्तु कुछ लोग इसे इसके भी आगे हिन्दू राष्ट्र की प्राप्ति के लिए एक कदम के रूप में भी देखते हैं, क्योंकि यह आर.एस.एस. का सपना है और प्रधानमंत्री स्वयं को सरेआम आर.एस.एस. का प्रचारक बताने पर गर्व करते हैं। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री के इस दौरे को रविदासिया समुदाय को हिन्दू धर्म से जोड़ने की एक पहल के रूप में देखा जा रहा है। नि:संदेह यह बात सच न ही हो, परन्तु इसकी चर्चा तो ज़रूर है। उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री मोदी उत्तर प्रदेश के 2022 के चुनावों से पहले गुरु रविदास की जन्म भूमि, जो वाराणसी में है, में भी विशेष रूप से गए थे और इससे उत्तर प्रदेश के दलित एवं खास तौर पर रविदासिया समुदाय के वोट को छूने में वह सफल भी रहे बताए जाते हैं और इस बार उनका इस अवसर पर पंजाब आना उत्तर प्रदेश तथा पंजाब दोनों में बसते रविदासिया समुदाय को भाजपा की ओर आकर्षित करने के कदम या यत्न के रूप में भी देखा जा रहा है। वैसे जब सभी पार्टियां वोट तथा अपने अन्य राजनीतिक उद्देश्यों के लिए धर्म तथा धार्मिक डेरों को महत्व देती दिखाई देती हैं तो भाजपा की इस कोशिश को भी इसी संदर्भ में देखना और समझना होगा।
मसहलत आमेज़ होते हैं सियासत के कदम,
तू ना समझेगा सियासत तू अभी नादान है।
—दुष्यंत कुमार
अकाली दल पुनर-सुरजीत में नई कतारबंदी?
प्रसिद्ध शायर अली जीशान का एक शे’अर है :
ज़माने भर से ताअलुक की पर्दादारी है,
किसे बताएं कि अब तू हमारे साथ नहीं।
अकाली दल पुनर-सुरजीत के अध्यक्ष ज्ञानी हरप्रीत सिंह के मन की हालत कुछ इस शे’अर जैसी ही होगी, क्योंकि कोई माने या न माने, परन्तु इस अकाली दल में तेज़ी से कतारबंदी हो रही है और आपस में शह-मात का खेल शुरू हो चुका है। एक ओर ज्ञानी हरप्रीत सिंह तथा दूसरी ओर मनप्रीत सिंह इयाली के गुट हैं। नि:संदेह यह लड़ाई निजी तौर पर पदों की लड़ाई है, परन्तु दोनों गुट ऐसा दिखा रहे हैं कि उन्हें पदों की कोई इच्छा ही नहीं। इसीलिए इसे एक गुट अकाली दलों की एकता तथा दूसरा गुट विचारधारा की लड़ाई के वऱकों में लपेट कर पेश कर रहे हैं। वैसे हमें ज्ञानी हरप्रीत सिंह विचारधारा के रूप में अधिक स्पष्ट लगते हैं, क्योंकि वह साफ तौर पर भाई अमृतपाल सिंह की विचारधारा के समर्थक नहीं हैं, जबकि ऐसे समाचार आम हैं कि मनप्रीत सिंह इयाली दोनों अकाली दलों को एकजुट करके साझे दल के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में कमान अपने हाथ में लेने के लिए उत्सुक हैं, परन्तु अब मामला बेहद बिगड़ गया है। वास्तव में अकाली दल पुरन-सुरजीत में एक बार तो यह माहौल बना दिया गया था कि ज्ञानी हरप्रीत सिंह स्वयं ही पीछे हट जाएं और किसी को कार्यकारी अध्यक्ष बना दें या कोई प्रीज़ीडियम बना दें, बाद में ‘अकाली दल वारिस पंजाब दे’ के साथ गठबंधन करके कोई साझा कार्यकारी अध्यक्ष बना लिया जाए। यह सम्भावित कार्यकारी अध्यक्ष कौन हो, यह लगभग सब को पता ही है, परन्तु ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेलीं। जिस व्यक्ति ने सुखबीर सिंह बादल जैसे सर्वेसर्वा नेता को रास्ता नहीं दिया, उसके लिए इस चाल को नाकाम करना कोई अधिक कठिन नहीं था। उन्होंने मामला समितियां बना कर दूसरी ओर मोड़ दिया। जवाब में दूसरे पक्ष द्वारा दबाव की रणनीति के तहत बीबी सतवंत कौर के नेतृत्व में पंथक कौंसिल को सक्रिय करने का यत्न भी सामने आया, परन्तु वह आवश्यक दबाव नहीं बना सकीं, अपितु हालत यह है कि ज्ञानी हरप्रीत सिंह के बहुत-से समर्थक इयाली के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की दबाव बनाने लगे हुए हैं।
ज्ञानी हरप्रीत सिंह का ताज़ा साक्षात्कार देखने योग्य है, जिसमें वह अकाली दल पुनर-सुरजीत के असक्रिय रहने का दोष अपने ही कुछ साथियों पर लगा रहे हैं और यह स्पष्ट है कि वह कोई ठोस तथा कड़ी कार्रवाई करने का आधार तैयार करते प्रतीत हो रहे हैं, परन्तु अभी तक दोनों एकता का राग ही अलाप रहे हैं। बशीर बदर के अनुसार :
मैंने दरिया से सीखी है पानी की ये पर्दादारी,
ऊपर ऊपर हंसते रहना गहराई में रो लेना।
बीबी भट्ठल का बयान
बीबी राजिन्द्र कौर भट्ठल पंजाब के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे थे, परन्तु उसके बाद उनका राजनीतिक भाग्य का सितारा डूबता ही गया, परन्तु अब 30 वर्ष बाद उन्होंने सनसनीखेज़ खुलासा किया है कि 1997 के चुनावों के समय कुछ अधिकारियों ने बम धमाके करवा कर दहशत फैला कर चुनाव जीतने की सलाह दी थी, जो उन्होंने नहीं मानी थी। वह 30 वर्ष चुप रहे, चलो कोई मजबूरी होगी, परन्तु अब भी वह यह क्यों नहीं बताते कि कौन अधिकारी थे जिन्होंने यह सलाह दी थी। इस प्रकार प्रतीत होता है कि यह खुलासा उनकी किसी राजनीतिक चाल का एक हिस्सा ही हो सकता है, परन्तु कुछ भी हो, वह कोई आम व्यक्ति नहीं हैं। वह उस समय की बात कर रही हैं जब वह राज्य की मुख्यमंत्री थीं। यदि यह बात सच हो तो कितनी खतरनाक थी। इसलिए अच्छी बात होगी कि यदि कोई निष्पक्ष अथारिटी इसकी जांच करके सच्चाई लोगों के सामने लाने का काम करे। वैसे मैं बीबी भट्ठल की राजनीतिक मानसिकता के प्रति इबरत मडलीपुरी का एक शे’अर लिखे बिना नहीं रह सकता :
जब आ जाती है दुनिया घूम-फिर कर अपने मरकज़ पर
तो वापस लौट कर गुज़रे जमाने क्यों नहीं आते।
क्या दो पूर्व मुख्यमंत्री भाजपा में जाएंगे?
इस समय चर्चा है कि पंजाब के दो पूर्व मुख्यमंत्री बीबी राजेन्द्र कौर भट्ठल तथा चरणजीत सिंह चन्नी भाजपा में जाने के लिए पर तौल रहे हैं। कारण क्या बताए जा हैं, यह सबको पता है, लिखने की ज़रूरत नहीं, परन्तु हमारी स्पष्ट राय है कि बीबी भट्ठल का जाना तो आसान है, क्योंकि उनके पास अब गंवाने के लिए कुछ भी नहीं, परन्तु चन्नी का फिलहाल जाना आसान नहीं प्रतीत होता। वह अभी ही क्यों अपनी संसद की सदस्यता गंवा लें। पार्टियों में अच्छे-बुरे दिन तो आते ही रहते हैं। हां, कल को क्या होता है, कौन जाने।
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