आत्म-सम्मान ज़रूरी है, अमरीका की मांग नहीं
हमारी अमरीका के साथ इस समय व्यापार के लिए बातचीत चल रही है। भारतीय राजनीति ने इस बातचीत के सफल होने की उम्मीद जाहिर की है। जिसकी शुरुआत अमरीका के धौंस दिखाने के लहज़े से शुरू हुई थी। टैरिफ की धौंस से एकबारगी लगने लगा था कि अब अमरीका के साथ व्यापार की सभी सम्भावनाएं खत्म हो गई हैं और हम जैसे किसी संकट का सामना करने वाले हैं, लेकिन बिना किसी उत्तेजना के हमने शांत रहने का फैसला किया और जहां व्यापार की सम्भावनाएं खत्म हो गई मालूम पड़ने लगी थीं वहीं दोनों देशों ने एक दूसरे तक पहुंच बनाने का कार्यक्रम जारी रखा। अमरीका रिश्ते कायम करने के साथ-साथ अपना एजेंडा आगे बढ़ाता रहा। एक सवाल यह भी सामने आया कि आखिर ट्रम्प को हमसे चाहिए क्या? व्यापारिक सौदा या नोबेल की सिफारिश? पाकिस्तान ने जिस बेशर्मी से उनके नोबेल की सिफारिश कर दी हम वैसा नहीं कर सकते। क्या उन्हें अधिक तवज्जो चाहिए? अपनी चाहत का दायरा शायद ट्रम्प भी नहीं जानते। हालांकि टैरिफ बम छोड़ने से पहले उन्हें अपने नुक्सान का भी आकलन कर लेना चाहिए था, परन्तु उन्होंने नहीं किया। सी.ई.ओ. समिट में बोलते हुए नाटक कर उन्होंने भारत और पाकिस्तान को दो ऐसी शक्तियां करार दिया जो एक दूसरे पर टूट पड़ी थीं दावा किया कि निजी तौर पर उन्होंने दोनों नेताओं को लड़ाई रोकने के लिए मनाया था। वह भी मात्र दो दिन में। यह आत्म-मुग्धता नहीं तो और क्या है? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस बात का खंडन कर चुके हैं। जबकि भारतीय विपक्ष इस बात पर सरकार से खफा है और विभिन्न मंचों पर इसकी आड़ भी लेकर भारत सरकार पर हमले करता जा रहा है।
भारत को अमरीका के साथ बेहतर व्यापारिक समझौते की ज़रूरत है क्योंकि दुनिया का एक शक्तिशाली देश होने के साथ-साथ वह बड़ा उपभोक्ता बाज़ार भी हमारे लिए खोल सकता है लेकिन आत्म-सम्मान की शर्त पर भारत कुछ भी करने को तैयार नहीं होगा। हम चाहेंगे कि बेहतर रिश्ते हों क्योंकि व्यापारिक संबंध हमारी अर्थ-व्यवस्था जी.डी.पी. और रोज़गार में मदद करेंगे जबकि ट्रेड डील से हमें कुछ बातों का ध्यान भी रखना पड़ेगा। हालांकि ट्रम्प की दुनिया में तथ्यों का कोई खास मतलब नहीं होता। वह अपनी कहानियों में बार-बार भारत को फर्स्ट लाते हैं। श्रेय लेने की कोशिश करते हैं और दोस्ती का दिखावा भी, क्यों? क्योंकि उनके पास एक विभाजित, सौदेबाज़ी पर आधारित और असुरक्षित विश्व दृष्टि है। उनके लिए दोस्ती, रिश्ते, एक नेता एक ग्राहक तक सीमित हैं। उनका दृष्टिकोण साफ है कि या तो मेरी चापलूसी करो या फिर मेरा सामना करो।
जापान पर ट्रम्प की धाकड़ नीति चल सकती है। वह अमरीकी चावल खरीदने पर राजी हो गया है। वियतनाम ने टैरिफ शून्य कर दिया है। कतर ने 240 अरब डॉलर निवेश की घोषणा कर दी है, लेकिन भारत यह सब नहीं कर पाया। इसीलिए डील अभी तक लटक रही है। ट्रम्प को भारत जैसा मित्र खोने का डर हमेशा सताता रहेगा। अगर डील किसी तरह सिरे तक नहीं पहुंच पाती। ट्रम्प को महाशक्ति होने का गर्व है तो हमें आत्म-सम्मान का गर्व है जिसे हम खोना नहीं चाहते। हम अमरीका से अच्छे संबंध भी आशा रखते हैं लेकिन हमें रिश्ता बराबरी का की चाहिए। हम लोकतांत्रिक देश हैं। स्वाभाविक सहयोगी हो सकते हैं। आंखें हम खुली रखेंगे। व्यापार पसंद करेंगे और आत्म-सम्मान की रक्षा करेंगे।



