कैसे बढ़ सकती है किसानों की आय ?

किसानों की आय में कोई विशेष वृद्धि नहीं हो रही, इसके विपरीत उनका कज़र् बढ़ता जा रहा है। उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। ट्यूबवेल की संख्या बढ़कर 14.5 लाख से ज़्यादा हो गई है। ट्यूबवेल और गहरे करवाने के लिए किसानों को खर्च करना पड़ता। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) के सर्वेक्षण से पता चलता है कि राज्य के बहुत-से ज़िलों में भू-जल का स्तर प्रत्येक वर्ष एक मीटर नीचे जा रहा है। प्रत्येक वर्ष धान की काश्त का रकबा बढ़ने से पानी की ज़रूरत बढ़ती जा रही है। फसली विभिन्नता में कोई सफलता नहीं मिल रही। खेत छोटे होते जा रहे हैं, जिनसे किसानों को बहुत कम आय होती है।
किसानों द्वारा धान-गेहूं का फसली-चक्र अपनाए जाने से कृषि स्थिर हो गई है। रोज़गार न होने से गांवों के युवाओं को विदेश का रुख करना पड़ा। उनमें कृषि से दूर होने की रुचि बढ़ गई। ऐसे माहौल पैदा होने से किसानों की आय पर असर पड़ा। जीडीपी में कृषि का योगदान कम होकर 14 प्रतिशत रह गया जबकि दो-तिहाई आबादी कृषि पर निर्भर है। पंजाब में भूमि की उपजाऊ शक्ति कम हो रही है। 
गेहूं उत्पादन और केन्द्रीय अनाज भंडार में योगदान देने में पंजाब अग्रणी राज्य था, जो अब अपना स्थान छोड़कर पिछड़ गया है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्य आगे बढ़ रहे हैं। गत सदी में सब्ज़ क्रांति के बाद कृषि का विकास तो हुआ, लेकिन वह दीर्घकालिक नहीं था। 1980-85 के बीच कृषि विकास दर भारत की आर्थिक विकास दर से ज़्यादा रही। लेकिन वर्ष 1997-98 में यह कम होकर 2 प्रतिशत पर आ गई जबकि भारत की आर्थिक विकास दर 8 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। 
2002-03 में भारत ने गेहूं निर्यात किया और फिर 2007-08 में आयात किया। उसके बाद चाहे देश आत्मनिर्भर और निर्यात करने के योग्य हो गया, जिसमें पंजाब का बड़ा योगदान है। 2022 में चाहे मार्च में अधिक गर्मी पड़ने की वजह से गेहूं का उत्पादन कम होने से देश में गेहूं की कमी हो गई और भंडार (बफर स्टाक) कम हो गया। देश में गेहूं का उत्पादन 2020-21 में भी 3521 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से कम होकर 3484 किलोग्राम पर आ गया और उत्पादन 109.59 मिलियन टन से कम होकर 106.84 मिलियन टन रह गया। इसी तरह, पंजाब में इसी दौरान उत्पादन 4868 किलोग्राम से कम होकर 4216 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पर आ गया। गेहूं को बाहर भेजने पर रोक लगानी पड़ी। गेहूं का उत्पादन बढ़ाने के लिए यत्न तेज़ करने पड़े। धान की काश्त के अधीन प्रत्येक वर्ष बढ़ते रकबे को ध्यान में रखते हुए और फसली चक्र में कोई बदलाव न होने के दृष्टिगत पानी का इस्तेमाल बहुत समझदारी से करना चाहिए।
अंतर्राष्ट्रीय चावल वैज्ञानिक डॉ. गुरदेव सिंह खुश तथा पीएयू एवं पंजाबी यूनिवर्सिटी के पूर्व उपकुलपति डॉ. एच.एस. जौहल समेत विशेषज्ञों ने सरकार को सलाह दी थी कि ट्यूबवेल को मुफ्त बिजली की सुविधा बंद करके पानी बचाने की अन्य तकनीकें जैसे ड्रिप सिंचाई, छिड़काव सिंचाई आदि  इस्तेमाल में ला कर किसानों की मदद की जाए। इससे पानी बचेगा।  लेकिन राजनीतिक कारणों से ऐसा नहीं किया जा सका। मौसम में आ रहे संभावित बदलाव, गर्मी और पर्यावरण प्रदूषण, बेमौसमी बारिश व पराली जलाना भी कृषि में बड़ी दिक्कतें हैं। छोटे किसानों के लिए ऐसे फसली चक्र ढूंढने पर ध्यान देने की ज़रूरत है जो किसानों को धान-गेहूं से ज़्यादा आय दें। आय बढ़ाने के लिए उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ कृषि खर्च कम करना भी ज़रूरी है। इस समय कृषि खर्च जिसमें बीज, खाद, कीटनाशक, खेत मज़दूरों की दिहाड़ी और सिंचाई का खर्च शामिल है, लगातार बढ़ रहे हैं। 
रासायनिक खाद का इस्तेमाल विशेषज्ञों द्वारा की सिफारिशों के अनुसार नहीं हो रहा है। उत्पादन बढ़ाने के लिए गुणवत्ता वाले बीजों की विशेष भूमिका होती है। यदि बीज अच्छा होगा तभी खाद और अन्य सामग्री अपना असर दिखाएंगी। रासायनिक खाद जो अहम सामग्री मानी जाती हैं, किसानों को उसे सिफारिश की गई मात्रा में डालनी चाहिए, जिससे अधिक लाभ होगा। इस समय किसान 6 थैले यूरिया फसल में डाल रहे हैं, जबकि विशेषज्ञ 2.5 थैले डालने को कहते हैं। फिर जो किसान अब दो की बजाय तीन फसलें लेने लगे हैं, उन्हें एक फलीदार फसल लेकर नाइट्रोजन की खुराक कम कर देनी चाहिए। इससे उनकी आय  बढ़ेगी। ज़ीरो टिलेज तकनीक से कम जुताई, लेज़र कराहे से ज़मीन को समतल करवाना और फसल के अवशेष का उचित प्रबंधन भी उत्पादन बढ़ाता है। लेज़र कराहे से ज़मीन को समतल करवाने से पानी भी बचता है। समय पर बुआई करने से उत्पादन बढ़ता है। समय पर बुआई अनुसार ही धान तथा गेहूं की किस्म का चयन किया जाना चाहिए। इससे भी उत्पादन बढ़ेगा।

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