मैं ज़िन्दा हूं, प्रमाणित करने का अभियान

आजकल इस देश में ‘आप ज़िन्दा हैं, ज़िन्दा लोगों की सूची में रहने के काबिल हैं’, इसे सिद्ध करना एक और समस्या बन गई है। एक और इसलिए कहा कि इस देश में बहुत-सी समस्याएं हैं, जिन्होंने कभी हल न होने की कसम खा रखी है। हज़ारों की संख्या में बेकारों में नौकरी के नियुक्ति पत्र बंटने और शासक दल के चुनावी घोषणा-पत्र में एक और उपलब्धि बन जाने के बावजूद आज भी करोड़ों लोग बेकार हैं, और जीने के लिए सस्ते राशन की दुकानों के बाहर कतार लगा कर खड़े हैं। आदमी एक समय एक ही जगह खड़ा हो सकता है, इसलिए वे राशन की दुकानों के बाहर खड़े मिलते हैं, रोज़गार दिलाने की खिड़कियों के बाहर नहीं। इसलिए सरकार का कथन है कि उसने बेकारी की समस्या को हल कर दिया है।
हल कर दिया है अनुकम्पा उर्फ मुफ्त रेवड़ियां बांटने की शार्ट कट संस्कृति से। यह दीगर बात है कि इस संस्कृति के पल्लवित होने के साथ-साथ कर्म संस्कृति लुप्त हो गई है। काम के सूचकांक बताते हैं कि एशिया में सबसे अधिक भारत के लोग काम की जगह आराम को पसन्द करते हैं, ‘चाहे आराम हराम है’ का सबसे ऊंचा नारा भारत में लगाया जाता है, लेकिन जगह-जगह फलदार बेरियों के नीचे आपको निष्क्रिय लोग लेटे हुए नज़र आते हैं। ये वहां निस्पन्द लेट कर अपनी छातियों पर कोई बेर गिरने का इंतज़ार करते हैं। बेर गिर जाये तो वे लेटे लेटे पास से गुज़रते आदमी को कहते हैं, ‘भाई मेरी छाती से उठा कर यह बेर मेरे मुंह में डाल दो’। रहगुज़र उस बेर को उठा कर अपने मुंह में डाल लेता है, और कालांतर में सत्ता का दलाल कहलाता है। बाद में आपके लिए बाकी रह जाता है एक ही काम कि साबित करो कि आप अभी ज़िन्दा हो, और इन बेरियों से टपकते बेर खाने के काबिल हो। असमर्थ रहने पर आपका नाम बेर उपकृत संस्कृति से काट दिया जाता है, और आपकी जगह किसी दूसरे को मिल जाती है।
वैकल्पिक रूप से उपलब्ध हो जाना यहां कोई समस्या नहीं है। भारी आबादी है, एक तलाशने पर हज़ार मिलते हैं। यह एक की जगह हज़ार का मिलना ही सबसे बड़ी समस्या है, इसलिए आजकल ज़िन्दा लोगों में मर चुके लोगों की तलाश हो रही है, अर्थात   सब सूचियों को पुनरीक्षित किया जा रहा है। आजकल राज्य-राज्य में वोट सूचियों को पुनरीक्षित किया जा रहा है। इसके बाद मनरेगा सूचियों की पड़ताल होगी। जी हां, वही वोटर सूचियां जिनकी पड़ताल पर आजकल विपक्षी दल भारी वावेला कर रहे हैं, और कहते हैं कि इन सूचियों से उनके समर्थकों के नाम इसलिए कट जाते हैं, ताकि सत्ता पक्ष जीत कर सत्ता की कुर्सी के नज़दीक से कभी न फिसल सके। सत्ता में जो बैठे हैं, उनके नाम पर ही कुर्सी सुरक्षित रहे। उनके जाने की नौबत आए तो उनके नाती-पौत्र इन कुर्सियों पर डट जाएं, और समाज और राजनीति के परिवारवाद के विरुद्ध नारा लगाएं। आप तो जानते हैं कि हर नियम के अपवाद होते हैं। इस नियम के अपवाद स्वरूप कुर्सी-धारियों के नाते रिश्तेदार हाज़िर हो जाते हैं। जो अभागा रह गया, उसे भी किसी न किसी कार्पोरेशन के चेयरमैन बनने का सुख अवश्य प्राप्त हो जाएगा। नहीं बना तो बड़े आदमियों की शोभा यात्रा में एक ज़िन्दाबाद का नारा लगा कर सुख से अपना जीवन व्यतीत कर लेगा। इनकी चिन्ता आप न कीजिये।
लेकिन सुख से जीवन व्यतीत करने के लिए समय-समय पर सिद्ध करते रहें कि आप अभी ज़िन्दा हैं, और राशन की कतार में खड़े रहने के लिए चाकचौबन्द।
यह भी खूब है कि समय-समय पर आपको अपने ज़िन्दा रहने का प्रमाण देना पड़ता है, कभी नाम बदली मनरेगा में एक बरस में से एक सौ पच्चीस दिवस करना या वेतन प्राप्त कर कर्मशाली हो सकने का अभियान प्राप्त कर सकने का।
बात यूं नहीं समझ आती, तो सुन लीजिये। इनमें सबसे मनोरंजक और शौर्यपूर्वक है अपने आपको ज़िन्दा साबित करने का अभियान। सरकारी वोटर पुनरीक्षण सूची से लेकर इसके लिए बहुत-सी जगहों पर ‘मैं ज़िन्दा हूं’ चिल्लाना पड़ता है। आदमी यूं अपना स्वर गंवा कर मूक दर्शक बन कर रह जाता है।
यह मूक दर्शक बन जाना भी खूब है साहिब! अब देश में कुछ भी हो जाये, आप केवल महामना के हक में उठा हुआ एक नारा हैं। नारे उठाते रहिये, आपके ज़िन्दा रहना साबित करने के लिए लिपिक आपके घर तशरीफ ले आएंगे। नारा न उठा सको तो आप चाहे नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ही क्यों न हों, आपका नाम कट जाएगा। फिर शोर-शराबा करके आप ज़िन्दा लोगों की श्रेणी में आ सकते हैं। शर्त यही है कि आपके घर के पास वाले सुविधा केन्द्र का सरवर खराब न हो। वैसे सरवरों को भी एन समय पर खराब होने की आदत हो गई है। भई, अब सबको ऑनलाइन जीने की आदत हो गई है, और इसको चलाने वाले सरवरों को खराब रहने की और आपके चल बसने की घोषणा की। चिन्ता न कीजिये, जल्द ही सरवर ठीक हो जाएगा और आप अपने आपको ज़िन्दा रखने का कार्यक्रम चलाते रहेंगे।

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