रक्षा क्षेत्र के लिए योजनाबंदी
भारत, यूरोपियन यूनियन और अन्य भिन्न-भिन्न देशों के साथ हुए व्यापारिक समझौतों से जहां आगामी समय में भारत की बढ़ती हुई सम्भावित शक्ति को देखा जा सकता है, वहीं कई देशों के साथ भारत के हुए सुरक्षा समझौतों का भी अपना बड़ा महत्त्व है। पिछली सदी में दूसरे विश्व युद्ध में भारत ने अहम भूमिका निभाई थी। उस समय हालात बिलकुल अलग थे। भारत उस समय अंग्रेज़ों का गुलाम था। भारतीयों के पास कोई भी बड़ा फैसला लेने के लिए अपनी इच्छा नहीं थी। ब्रिटिश सरकार ही इस महान देश के लिए बड़े फैसले लेती थी। दूसरे विश्व युद्ध में जहां यूरोप के देश जर्मनी और इटली एक तरफ थे, वहीं एशिया में उनका सहयोगी जापान था। दूसरी तरफ यूरोप के ज्यादातर देशों के साथ अमरीका भी इस युद्ध में शामिल हो गया था। सोवियत यूनियन (रूस) बहुत विशाल देश था, जिसकी सीमाएं यूरोप से लेकर एशिया तक फैली हुई थीं। वह भी ज्यादातर यूरोपियन देशों और अमरीका वाले पक्ष के साथ विश्व युद्ध में शामिल था। इस युद्ध में ब्रिटेन ने भारत को अपनी ओर से युद्ध में शामिल करने की घोषणा कर दी थी, क्योंकि देश ब्रिटेन का गुलाम था। उस समय देश की आज़ादी की लड़ाई भी शिखर पर थी। यहां वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं ने इस ब्रिटिश फैसले के विरुद्ध आवाज़ उठाई थी, परन्तु अंग्रेज़ों को बड़ी भर्ती की ज़रूरत थी, जिसकी पूर्ति भारत से ही की जा सकती थी। देश की आज़ादी के बाद भारत एक प्रभुसत्ता सम्पन्न इकाई के रूप में उभरा। विभाजन होने के साथ-साथ उसे एक तरफ तो पाकिस्तान की चुनौती दरपेश आई, जिसकी सहायता कुछ मुस्लिम देश और विशेष रूप से अमरीका कर रहा था। कुछ वर्षों बाद ही चीन ने भी भारत की ज़मीन पर अपना दावा जताते हुए इसके साथ युद्ध छेड़ दिया था और 1962 के युद्ध में भारत को चीन से नमोशीजनक हार का मुंह देखना पड़ा था।
आज विश्व का नक्शा पूरी तरह बदला हुआ दिखाई देता है। जहां पहले अमरीका और सोवियत यूनियन शक्तिशाली देशों के रूप में उभरे थे, वहीं अब चीन का भारी उभार देखा जा सकता है, जो भारत के लिए चिन्ता का विषय बना हुआ है। चीन अपने पड़ोसी देशों की धरती पर अपना दावा जताने के साथ-साथ समुद्रों के बड़े भाग पर भी अपना दावा पेश करने में लगा हुआ है, जो कि पानी के अन्तर्राष्ट्रीय नियमों के विरुद्ध है। इससे अमरीका, आस्ट्रेलिया, जापान और बहुत-से यूरोपियन देश चिन्तावान दिखाई देते हैं और भिन्न-भिन्न बने अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों द्वारा ज़ाहिरा तौर पर अपनी नीतियां बनाने के लिए विवश हैं। भारत ने भी हिन्द-प्रशांत सागर में चीनी विस्तारवाद को लेकर इन देशों के साथ रक्षा संबंधी अब तक अनेक समझौते किए हैं। इसी दिशा में विगत दिवस दिल्ली में हुए भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच हुए समझौते को देखा जा सकता है।
यूरोपियन यूनियन के नेताओं की उपस्थिति में भारत एवं यूरोपियन यूनियन के बीच रक्षा संबंधी समझौता भी सम्पन्न हो गया है। यूरोपियन यूनियन की विदेश और सुरक्षा नीति के प्रमुख काज़ा कालाम के साथ भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर के हस्ताक्षरों के साथ हुआ यह सुरक्षा समझौता बहुत अहम माना जा रहा है। इसमें समुद्री सुरक्षा उद्योग के रूप में सैन्य उपकरण बनाना और इसी दिशा में तकनीकी योग्यता का आदान-प्रदान करना भी शामिल है। देश ने आत्म-निर्भरता की नीति के तहत यूरोपियन देशों की टैक्नोलॉजी को आधार बना कर यहां नए उद्योग स्थापित करने की योजनाबंदी बनाई है, जिसमें ड्रोनों और सुरक्षा के लिए अन्य हथियारों का निर्माण भी शामिल है। पांच वर्ष के लिए किए गये इस विस्तृत समझौते के सम्पन्न होने के बाद भारत के रक्षा संबंधी निर्माण के क्षेत्र में बेहद शक्तिशाली देश के रूप में उभरने की सम्भावनाएं बनी दिखाई देती हैं। भारत की ओर से इस क्षेत्र में बढ़ाए गए कदमों से भविष्य में कठिन से कठिन चुनौतियों का मुकाबला करने की सम्भावना भी बन जाएगी।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

