नौजवानों को साम्प्रदायिकता के लिए भड़काना कहां तक सही ?

देश में पहले से ही घोर साम्प्रदायिकता का माहौल था, लेकिन अब साम्प्रदायिकता का नंगा नाच शुरू होने वाला है। इसकी बाकायदा अधिकृत घोषणा कर दी गई है। घोषणा करने वाले हैं राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार यानी (एन.एस.ए.) अजीत डोभाल। अभी तक साम्प्रदायिकता फैलाने की ज़िम्मेदारी मुख्य रूप से नफरती चिंटुओं के पास रहती थी। कभी-कभी नरेंद्र मोदी और अमित शाह इन चिंटुओं द्वारा सुलगाई गई आग में घी डालते हुए ज़रूर दिखते थे लेकिन अजीत डोभाल ने एक कदम आगे जाते हुए देश के नौजवानों से अपील कर डाली है कि वे अतीत की घटनाओं का बदला लेने के लिए अपने दिल में आग जला लें। यह अपील करते हुए वे बड़े जोश में थे। लगता था कि घर से तय करके आए थे कि आज तो वे साम्प्रदायिक लफ्फाज़ी के सारे रिकॉर्ड तोड़ देंगे। वे शाहरुख खान के अंदाज़ में दोनों हाथ फैला कर बोल रहे थे। उन्होंने भारत के इतिहास में हुई अपमान, विनाश और बेबसी का जिक्र किया, जैसे पूर्वजों ने फांसी झेली, गांव जलाए गए, सभ्यता नष्ट की गई, मंदिर लूटे गए और लोग मूक दर्शक बने रहे। उन्होंने कहा कि यह इतिहास हमें चुनौती देता है कि आज भारत के हर युवा के अंदर एक आग होनी चाहिए। ‘बदला’ शब्द आदर्श नहीं है, लेकिन बदला अपने आप में एक बड़ी ताकत है। हमें अपने इतिहास का बदला लेना होगा। डोभाल की ये बातें दरअसल कुछ नहीं छिपातीं।  डोभाल की पुरानी आदत है कि जब भी वे कोई सार्वजनिक भाषण देते हैं, तो सिविलाइज़ेशनल ब्लीडिंग की चर्चा ज़रूर करते हैं यानी, हमारी भारतीय सभ्यता 12वीं सदी से ही घायल है। उसके घावों से लगातार खून रिस रहा है। अब इसका बदला तो लेना ही होगा। ज़रा सोचिए, आखिर कोई इतिहास का बदला किससे लेगा। डोभाल के इस भड़कावे वाले भाषण से पहले ही देश भर में विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, राम सेने, हिंदू सुरक्षा वाहिनी और ऐसे ही संगठन जगह-जगह बदले की कार्रवाइयां कर रहे हैं। डोभाल की बातों से बदले की भावना जंगल में आग की तरह फैलने का अंदेशा है। हमें ताज्जुब नहीं होना चाहिए यदि डोभाल के इस भाषण के बाद बदले की ये कार्रवाइयां दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती हुई दिखाई दें। 
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का पद देश के शीर्ष पदों में से एक है। अजीत डोभाल 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद से ही लगातार एनएसए बने हुए हैं। डोभाल का पद कैबिनेट मंत्री के रैंक का है। वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे विश्वसनीय सलाहकारों में से एक माने जाते हैं। वे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रमुख हैं। वे प्रधानमंत्री को आंतरिक और बाहरी सुरक्षा, खुफिया जानकारी, आतंकवाद-रोधी कार्रवाई, सीमा सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों से जुड़े मामलों पर सीधी सलाह देते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय के प्रमुख के रूप में वे आंतरिक/बाहरी सुरक्षा से जुड़े सभी मामलों के लिए शीर्ष निकाय का नेतृत्व करते हैं। वे इंटेलिजेंस ब्यूरो और रिसर्च एनालैसिस विंग जैसी खुफिया एजेंसियों के बीच समन्वय स्थापित करते और उनकी गतिविधियों पर नज़र रखते हैं। 
हम नहीं भूल सकते कि उन्हीं के एनएसए रहते हुए 2019 में पुलवामा हमला हुआ। यह हमला सीआरपीएफ के काफिले पर हुआ था, जिसमें 40 से ज्यादा जवान शहीद हुए। पूर्व जम्मू-कश्मीर के पूर्व गवर्नर सत्यपाल मलिक दावा कर चुके हैं कि यह सिस्टेमिक फेलियर था, जिसमें इंटेलिजेंस और सुरक्षा लापरवाही शामिल थी और प्रधानमंत्री मोदी तथा एनएसए डोभाल ने उन्हें इस हमले पर चुप्पी साधने को कहा था। डोभाल उस समय क्या कर रहे थे? क्या उनके दिल की वह आग जिसे वे नौजवानों के दिल में सुलगाना चाहते हैं, उस समय ठंडी पड़ी हुई थी। अप्रैल 2025 में पहलगाम की बैसरन घाटी में पर्यटकों पर आंतकवादियों ने खूनी हमला जिसमें 26 मौतें हुईं। इसे भी इंटेलिजेंस विफलता माना गया, क्योंकि पर्यटन को सामान्य घोषित किये जाने के कारण वहां बड़ी संख्या में पर्यटक आए थे लेकिन सुरक्षा में चूक हुई। 11 पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने हमले की जिम्मेदारी लेने वाले ग्रुप टीआरएफ को संयुक्त राष्ट्र में बचाने का दावा किया, जो भारत की कूटनीतिक नाकामी का सबूत है। आतंकियों को हमले का मौका मिलना ही सरकार की विफलता है, खासकर जब कश्मीर में सेना की तैनाती कम नहीं हुई। डोभाल के कार्यकाल में कई हमले हुए हैं, जैसे उड़ी (2016), पठानकोट (2016), रियासी (2024) आदि। एक ऐसी लिस्ट भी मौजूद है जिसमें 30 से ज्यादा ऐसी घटनाएं दर्ज हैं। हर बार इंटेलिजेंस की नाकामी का मामला निकलता है। 1999 के विमान हाईजैक से लेकर पुलवामा और पहलगाम तक डोभाल की एनएसए के रूप में भूमिका पूरी तरह से बड़ी-चढ़ी रही है। वे अक्षम साबित हुए हैं, परन्तु वह जिम्मेदारी भी नहीं लेते हैं, इस्तीफा देना तो दूर रहा। 
2024 में रैडिकल छात्र आंदोलन के कारण बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार का पतन हुआ। ढाका में उस समय आईबी और रिसर्च एनालैसिस विंग का बहुत बड़ा अमला तैनात था। पर भारतीय खुफिया एजेंसियां सोती रहीं। डोभाल को पता ही नहीं चला कि कब पश्चिमी साज़िशकर्ताओं ने हसीना का तख्ता पलट दिया। नए शासन में अस्थिरता, हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले और भारत-बांग्लादेश सीमा पर घुसपैठ बढ़ गई है। दरअसल डोभाल पर पड़ोसी देशों (नेपाल, बांग्लादेश, मालदीव) से संबंधित नीति के संदर्भ में भी विफलता के आरोप हैं। भारत की कूटनीति कमजोर पड़ी है और चीन का प्रभाव बढ़ा है। डोभाल ने बांग्लादेश से जुड़े सुरक्षा मुद्दों (आतंकवाद, घुसपैठ) को संभालने में जो चूक की है, उससे भारत की सीमा सुरक्षा प्रभावित हुई है। 
यह एक आम जानकारी है कि अजीत डोभाल के बेटे विवेक डोभाल भारतीय नागरिकता छोड़ चुके हैं। वे ब्रिटिश नागरिक हैं। सिंगापुर में रहते हैं। पाकिस्तानी कम्पनियों के साथ उनकी पार्टनरशिप रह चुकी है। उनके एक और बेटे शौर्य डोभाल ने विदेश में पढ़ाई की है, और भारत में इंडिया फाउंडेशन नामक संस्था खोली है जो नरेंद्र मोदी से नज़दीकी के लिए जानी जाती है। विदेशी कम्पनियों से प्रायोजित होने के कारण यह संस्था भी विवादों के घेरे में रही है। अजीत डोभाल की मज़ाल देखिये, वे अपने बेटों को तो भारतीयता का पाठ अभी तक पढ़ा नहीं पाए लेकिन भारत के नौजवानों के हृदय में साम्प्रदायिकता की आग जलाना चाहते हैं। 
अजीत डोभाल का एक और कारनामा सुनिये। वे विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन के संस्थापक हैं। यह एक प्रमुख थिंक टैंक है जो राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति, रणनीतिक अध्ययन और सिविलाइजेशनल मुद्दों पर काम करता है। ऊपर से इसे स्वतंत्र और निष्पक्ष बताया जाता है, लेकिन कौन नहीं जानता कि यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा का जेबी संगठन है। अन्ना हजारे आंदोलन जिसे इस फाउंडेशन की शब्दावली में टीम अन्ना कहा जाता था, में इस संस्था की केंद्रीय भूमिका थी। फाउंडेशन ने संघ के थिंक टैंक के रूप में न केवल अन्ना आंदोलन की साजिश रची, बल्कि इशरत जहां केस में मोदी का बचाव किया। इसने कदम-कदम पर और भाजपा की साम्प्रदायिक विचारधारा को बढ़ावा दिया।
डोभाल के इस भाषण के असली अर्थों पर जैसे ही मीडिया मंचों पर रोशनी डाली गई, वैसे ही गोदी मीडिया ने उस पर लीपापोती शुरू कर दी लेकिन इस सवाल का जवाब किसी ने नहीं दिया कि अगर भारत का विकास करना है तो नौजवानों से आर्थिक मोर्चे पर कामयाबी की नयी मंजिलें छूने की अपील करनी चाहिए थी, सामाजिक और साम्प्रदायिक एकता स्थापित करने की अपील करनी चाहिए थी, राजनीति की स्तर सुधारने की अपील करनी चाहिए थी, लेकिन डोभाल ने उन्हें बताया कि बदला शब्द की ताकत क्या है, और अतीत का बदला चुकाना ही विकसित भारत बनाने की शर्त है। 

लेखक अम्बेडकर विश्वविद्यालय,
दिल्ली में प्ऱोफेसर और भारतीय भाषाओं के अभिलेखागारीय अनुसंधान कार्यक्रम के निदेशक हैं।

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