वैश्विक समस्याओं का समाधान सहयोग से संभव, टकराव से नहीं
दुनिया का थानेदार अमरीका और उसका विकल्प बनने की चाहत रखने वाले चीन समेत अन्य विघ्नसंतोषी देशों को शांतिप्रिय व गुटनिरपेक्ष देश भारत ने एक नहीं बल्कि कई बार स्पष्ट कूटनीतिक संदेश दिए हैं कि वैश्विक समस्याओं का समाधान पारस्परिक सहयोग से ही संभव है, टकराव से कतई नहीं, लेकिन उनकी शहंशाही प्रवृत्ति है कि मानती नहीं बल्कि तरह-तरह से भारत को घेरने या चिढ़ाने की कोशिश करती रहती है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाले नए भारत ने ऐसे देशों की अनदेखी, अनसुनी करते हुए अपनी सकारात्मक पहलों से अक्सर चौंकाने वाले परिणाम देने शुरू कर दिए हैं, जिससे भारत की प्रतिष्ठा और साख दोनों में अभूतपूर्व इजाफा हुआ है।
खासकर, वैश्विक समस्याओं जैसे जलवायु परिवर्तन, महामारी और गरीबी का समाधान सहयोग से ही संभव है क्योंकि ये सीमाओं से परे हैं। पारस्परिक युद्धों की तरह इन मुद्दों पर टकराव ऐसी समस्याओं को बढ़ाता ही है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय साझेदारी संसाधनों और प्रयासों को एकजुट करती है। यदि पारस्परिक सहयोग के कतिपय प्रमुख उदाहरणों की बात की जाए तो साल 2019 की अंतर्राष्ट्रीय महामारी कोविड-19 के वैक्सीन के विकास में वैश्विक सहयोग ने रिकॉर्ड समय में टीके तैयार किए जिससे निम्न-आय वाले देशों में 2.7 मिलियन मौतें टलीं। इस प्रकार यह पहल वैश्विक महामारी प्रबंधन का एक उत्कृष्ट मॉडल बनी। इससे पहले पेरिस समझौता ने 2015 से ही देशों को एकजुट कर जलवायु लक्ष्य निर्धारित करने में सफलता पाई जिससे नवीकरणीय ऊर्जा निवेश बढ़ा। देखा जाए तो जलवायु पर पेरिस समझौते (2015) ने 196 देशों को वैश्विक तापमान वृद्धि 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने के लक्ष्य पर एकजुट किया जिससे नवीकरणीय ऊर्जा निवेश बढ़ा।
वहीं संयुक्त राष्ट्र जैसे मंच पर्यावरण और शांति के लिए विशेष समूह गठित कर साझेदारी को बढ़ावा देते हैं। जहां तक पारस्परिक टकराव के नकारात्मक प्रभाव की बात है तो रूस-यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक अनाज आपूर्ति बाधित कर 27.6 करोड़ लोगों को भुखमरी की कगार पर पहुंचा दिया जबकि सूडान, गाजा और माली जैसे संघर्षों ने 2024 में 14 करोड़ लोगों को भयानक भुखमरी का शिकार बनाया। शांति स्थापना में यूएन मिशन अंतर्गत संयुक्त राष्ट्र के 63 शांति अभियान 37 देशों में सक्रिय हैं, जैसे पूर्वी स्लावोनिया और कोसोवो में सफल संक्त्रमणकालीन प्रशासन। इस दिशा में भारत ने 2.9 लाख शांति रक्षक तैनात कर सबसे बड़ा योगदान दिया। जहां तक अन्य क्षेत्रीय सफलताओं की बात है तो ब्रिक्स ने यूक्रेन में मध्यस्थता और गाजा में युद्धविराम के लिए कूटनीति चलाई। जबकि क्वाड और आसीयान जैसे मंच सुरक्षा व जलवायु पर सहयोग बढ़ाते हैं। इस प्रकार देखा जाए तो किसी भी प्रकार के टकराव असमानता बढ़ाते हैं और बहुपक्षीय व्यवस्था को कमज़ोर करते हैं। हमें यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि विशिष्ट अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं वैश्विक चुनौतियों पर सहयोग को मज़बूत करने के लिए न केवल समुचित मंच प्रदान करती हैं, बल्कि ये शांति, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में देशों को परस्पर एकजुट भी करती हैं।
मसलन, ऐसी प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं और उनकी भूमिकाएँ देश-दुनिया के लिए महत्वपूर्ण हैं। खासकर जहां संयुक्त राष्ट्र शांति, सुरक्षा और सतत विकास लक्ष्यों के लिए कूटनीतिक संवाद और संकट प्रबंधन करता है। वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन महामारी नियंत्रण और स्वास्थ्य नीतियों में वैश्विक समन्वय स्थापित करता है जबकि विश्व व्यापार संगठन व्यापार नियमों से आर्थिक सहयोग बढ़ाता है। इसी प्रकार से आर्थिक और पर्यावरणीय संस्थाएं भी महत्वपूर्ण हैं। (युवराज)

