महंगा सोना, हल्का रुपया और मुश्किल होती ज़िन्दगी
आज आम आदमी को कारण कुछ पता नहीं पर बस यह पता है कि सोना और चांदी ऐतिहासिक ऊंचाई पर हैं, लेकिन रुपया लगातार कमजोर हो रहा है और आम आदमी की जेब दिन-प्रतिदिन हल्की होती जा रही है। कहने का अर्थ यह है कि सोने की कीमत भले ही बढ़ रहा है किन्तु यह रोज़मर्रा की आम ज़िन्दगी पर सीधा प्रहार है, फिर भले ही इसे बाज़ार का खेल समझा जाए या कुछ और।
2007 में स्वर्ण धातु का भाव 10 हज़ार रुपये तौला (10 ग्राम) था, तब तक तो इसे सामाजिक परम्परा और सुरक्षित निवेश का ही प्रतीक माना जाता था क्योंकि सस्ता ही था और लगभग सबके बस की बात थी। शादी-विवाह, त्योहार या भविष्य की चिंता के हल में यानी हर जगह सोने की अहम भूमिका थी, लेकिन आज हालात यह हैं कि सोना के साथ-साथ चांदी भी आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गई है। पिछले कुछ वर्षों में सोने की कीमतों में लगभग 100-500 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अब सोना खरीदने का मन भी हो तो जेब हां नहीं कर पा रही है, तो कभी मध्यम वर्ग की धातु मानी जाने वाली चांदी ने भी आज आम आदमी से दूरी बना ली है। इन बढ़ते दामों को हम भले ही देश की अर्थव्यवस्था के लिए तरक्की मानें,मगर सच्चाई और परिणाम यह है कि आज गहनों की खरीद शौक नहीं, मजबूरी में टलने वाला निर्णय बन गई है।
दोनों धातुओं के बढ़ते भाव केवल ज्वेलरी बाज़ार की समस्या नहीं हैं। इसका सीधा असर कारीगरों, छोटे व्यापारियों और रोज़गार पर भी पड़ रहा है। कई छोटे ज्वेलर्स की बिक्री में 30-40 फीसदी गिरावट हुई है। उन्होंने इस वजह से कारीगर भी कम किए हैं।
जहां पहले लोग वजन देखकर इनको खरीदते थे, अब डेढ़ लाख रुपये तौला देख ‘डिज़ाइन दिखाकर बजट में समेटने’ की कोशिश हो रही है क्योंकि खरीदी बूते से बाहर है। आम आदमी के लिए सोना अब निवेश नहीं, सिर्फ तस्वीरों और विज्ञापनों की चीज़ बनता जा रहा है।
अब बात करें रुपये के अवमूल्यन यानी नीचे जाने की, तो इसकी असली जड़ समझिए। इस पूरी समस्या की जड़ कहीं और है। कुछ साल पहले जहां डॉलर के मुकाबले रुपया अपेक्षाकृत मजबूत था, आज वही रुपया लगातार फिसल रहा है। कमज़ोर रुपया मतलब—आयात महंगा, कच्चा माल महंगा, ईंधन महंगा और अंतत: रोज़मर्रा की ज़िन्दगी महंगी होना है।
सरल भाषा में बोलें तो ‘सोने की चिड़िया’ कहलाने वाला भारत सोने का बड़ा आयातक है, इसलिए जैसे-जैसे रुपया कमज़ोर होता है, वैसे-वैसे सोना अपने-आप महंगा हो जाता है। ऊपर से महंगाई का असर सिर्फ सोने-चांदी तक सीमित नहीं है। दूध, दाल, सब्ज़ी, दवाई, गैस सिलेंडर और विद्यालय फीस जैसे हर मोर्चे पर आम आदमी बड़े दबाव में है, कारण कि आय तो वही है, लेकिन खर्च कई गुना तेज़ी से बढ़ रहा है।
एक आम परिवार की मासिक ज़रूरतें पिछले एक-डेढ़ दशक में लगभग दोगुनी हो चुकी हैं जबकि आय में वह अनुपात नहीं दिखता है। नतीजा यह कि बचत भी शून्य के करीब पहुंचती जा रही है। सीधी सी बात है कि ‘आय रेंग रही है और खर्च दौड़ रहा है।’
अक्सर सरकार द्वारा नीतिगत स्तर पर दावा किया जाता है कि अर्थव्यवस्था मज़बूत है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे अलग कहानी कहती है। जब रुपया कमज़ोर है और महंगाई अधिक है, तब उसका सबसे पहला और सबसे बड़ा बोझ आम आदमी ही उठाता है। सोने व चांदी के दाम बढ़ने पर सरकार को तो ‘कर’ से लाभ होता है, मगर आम आदमी के लिए यह केवल एक और बंद दरवाज़ा बन जाता है। ऐसी स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर यही हाल रहा तो आने वाले समय में मध्यम वर्ग की ‘बचत संस्कृति’ का क्या होगा? जो वर्ग देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, वही वर्ग आज सबसे ज़्यादा पिसा रहा है। अमीर को कोई फर्क नहीं पड़ना है।
कुल मिलाकर सोना-चांदी महंगा होना सिर्फ बाज़ार तक सीमित नहीं, इसका प्रभाव आम लोगों पर भी पड़ता है। कमज़ोर रुपया, बढ़ती महंगाई और स्थिर आमदनी—इन तीनों ने मिलकर आम जन की ज़िन्दगी को मुश्किल बना दिया है। इस स्थिति पर सरकार को तत्काल नियंत्रण करना चाहिए। सरकार अभी चेत जाए तो अच्छा है। (अदिति)



