पंजाबी संस्कृति के शाहजहान एम.एस. रंधावा
2 फरवरी, 2026 से 7 फरवरी 2026 तक चंडीगढ़ के 16 सैक्टर स्थित कला भवन में महेन्द्र सिंह रंधावा साहित कला उत्सव मनाया जा रहा है। उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना के उप-कुलपति डा. एम.एस. गोसल करेंगे, जिसमें मेरे दिवंगत दोस्त डॉ. हरभजन सिंह के कला प्रेमी बेटे मदन गोपाल सिंह मुख्य भाषण देंगे। इस कार्यक्रम के मुख्यातिथि सांस्कृतिक मामले, ग्रामीण विकास और पंचायत कैबिनेट मंत्री होंगे, और समापन समारोह के लिए निवेदिता सिंह के विरासती संगीत का कार्यक्रम रखा गया है।
उद्घाटन समारोह के बाद हरित क्रांति से लेकर सांस्कृतिक क्रांति तक पंजाब की उपलब्धियों पर एक सेमिनार होगा, जिसमें अमरजीत ग्रेवाल, आर.एस. घुमन और गगनदीप शर्मा अपने विचार पेश करेंगे और अध्यक्षता गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के उप-कुलपति डा. करमजीत सिंह करेंगे। इस कार्यक्रम के मंच संचालक पंजाब भाषा विभाग, पटियाला के डायरेक्टर जसवंत ज़फर होंगे। महिन्द्र सिंह रंधावा उत्सव में पंजाब कला परिषद की सिनेमा तथा डिजीटल आर्ट को समर्पित नई अकादमी सहित कला परिषद् की साहित्य, ललित कला तथा संगीत नाटक से संबंधित तीनों अकादमियां अपने-अपने कार्यक्रम पेश करेंगी, जहां ‘चौराहे पर खड़ा रंग मंच : भविष्य और चिंताएं’ नामक सेमिनार में रानी बलबीर कौर, नीलम मान सिंह, महिन्द्र कुमार, साहिब सिंह और केवल धालीवाल वक्ता होंगे और इसी तरह के एक और सेमिनार में हरिभजन सिंह भाटिया और ईश्वर दयाल गौड़ मुख्य वक्ता होंगे, जिसके बाद होने वाली चर्चा में डा. योग राज, डॉ. परवीन और गुरबीर सिंह बराड़ शामिल होंगे।
सिनेमा तथा डिजीटल आर्ट को समर्पित अकादमी का कार्यक्रम चाहे अंतिम दौर के लिए बनाया गया है, परन्तु इसमें चर्चा का विषय पंजाबी सिनेमा के अलग-अलग रूपों को आधार बना कर गुरविंदर सिंह की कलात्मक उपलब्धि को केन्द्र में रखा गया है। डॉ. गुरमुख सिंह के शब्दों में यह ‘खामोशी की ज़ुबान है’ स्थानीय से वैश्विक मंचों तक के बड़े विषय पर चर्चा करने का कार्यक्रम है। खुली चर्चा के लिए जसबीर मंड के साथ गुरविंदर सिंह, सैमुअल जॉन, विवेक सचदेवा और जसदीप सिंह के उपस्थित रहने की संभावना है। इस चर्चा के मुख्य मेहमान संजीव अरोड़ा, कैबिनेट मंत्री स्थानीय निकाय, उद्योग, वाणिज्य तथा एन.आर.आई. मामले होंगे और मंच संचालन की ज़िम्मेदारी जगदीप सिद्धू को सौंपी गई है, लेकिन प्रीतम रूपल अपने धन्यवाद शब्दों में पूरे मामले का सारांश पेश करेंगे।
पंजाब कला परिषद की ललित कला अकादमी शाखा के प्रमुख गुरदीप धीमान ने भी सुमित दुआ और सतवंत सुमेल के साथ मिलकर खुला कैलीग्राफी मुकाबला-2026 के अलावा एक फोटो प्रदर्शनी की भी योजना बनाई है, जिसके बारे चर्चा के लिए योग राज और अमरजीत ग्रेवाल उपस्थित होंगे और उसके बाद आयोजित किये जाने वाले पेंटिंग स्लाइड शो पर मदन लाल तथा सुभाष परिहार रोशनी डालेंगे।
इस उत्सव में एक कवि दरबार के आयोजन की योजना बनाई गई है जिसमें स्वर्णजीत सवी, अमरजीत ग्रेवाल, गुरतेज कुहारवाला, विजय विवेक, गुरभजन गिल, मनजीत इंदिरा, पाल कौर, जसवंत जफर, त्रिलोचन लोची, नीतू, मनजिंदर धनोआ, हरमीत विद्यार्थी, सुरप्रीत मानसा, अमरजीत काउंके, सुरिंदर बीर, अरतिन्दर संधू, जगदीप सिद्धू, बलविंदर संधू, डॉ. जसलीन, वाहिद, विपिन प्रीत, गुरजंट राजोआना, बलविंदर चहल, संदीप जसवाल, जसप्रीत तथा रणजीत कौर सवी के अलावा ऐसे कवियों के शामिल होने की सम्भावना है, जो किसी विशेष अवसर पर उपस्थित होंगे।
महेन्द्र सिंह रंधावा अखंड हिंदुस्तान के ऐसे सपूत थे, जिन्होंने कुल्लू, कांगड़ा और हरियाणा सहित पूरे पंजाब के साहित्य और संस्कृति को अपने देश में ही नहीं, विदेशों में भी पहुंचाया। आज उनका गुणगान पंजाब कला परिषद के आंगन में ही नहीं, यू-ट्यूब के कार्यक्रमों में भी हो रहा है। अगर सतिंदर सरताज उन पर फिल्म बना रहे हैं, तो दिल्ली निवासी जनसम्पर्क को समर्पित तरलोचन सिंह उनकी ओर से 1947 में दिल्ली की सम्भाल तथा उसके बाद पाकिस्तान से उजड़ कर आए शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए उठाए गए ऐतिहासिक कदमों की बात कर रहे हैं। उन्हें पंजाबी संस्कृति का शाहज़मानी कहा जाना उनके क्रियान्वयनों की सही तज़र्मानी करता है।
यहीं बस नहीं, उन्होंने 1947 में नई दिल्ली के डी.सी. होते समय गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी, अमृता प्रीतम, करतार सिंह दुग्गल, भापा प्रीतम सिंह और अजीत कौर को दिल्ली में बसाकर अपना नाम बनाया और फिर चंडीगढ़ के चीफ कमिश्नर बनते ही छोटे-बड़े सैन्य अधिकारियों को इकट्ठा करके उन्हें चंडीगढ़ में प्लॉट अलॉट करते समय उनकी देश के लिए मर मिटने वाली रुचि की तो तारीफ की, परन्तु सेवा-मुक्ति के बाद चंडीगढ़ जैसे खूबसूरत शहर में बसने के लिए प्रेरित करते हुए बहुत सस्ते प्लॉट अलॉट किए। वह ही थे, जिन्होंने 15 अगस्त, 1947 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के लाल किला की प्राचीर से तिरंगा फहराने की रस्म को मौके पर उपस्थित होकर निर्विघ्न सम्पन्न करवाया था।
उनके जैसा होना आसान नहीं। ज़िन्दाबाद!
खतरनाक चाइना डोर
चाइना डोर के नाम से जानी जाती पतंगों की डोर कैसे अचानक अपनी चपेट में लेकर किसी व्यक्ति की जान ले लेती है। इसकी चर्चा किसी को भूली नहीं। जब तक केंद्र और राज्य सरकारें इस मामले में कोई सार्थक कदम नहीं उठातीं, मेरे एक मित्र ने साइकिल और स्कूटर चलाने वालों को सुझाव दिया है कि वे अपनी जेब में हर समय नेल कटर अवश्य रखें, जिससे चाइना डोर को काटा जा सके।



