भरोसेमंद पत्रकारिता का दूसरा नाम सर मार्क टली
पत्रकारिता में सच्ची खबर लिखने और धारणा बनाने या पेश करने में एक महीन फासला होता है और एक सच्चे पत्रकार को इस फासले का हमेशा सम्मान करना चाहिए। भारतीय विद्या भवन से पत्रकारिता की पढ़ाई करते समय यह मूल मंत्र हमें विद्यार्थियों को पहले दिन ही दिया गया था। मौजूदा समय में ज्यादातर पत्रकार इस फासले को नज़रअंदाज़ करते हैं लेकिन एक प्रवासी भारतीय और ब्रिटिश नागरिक मार्क टली पूरा जीवन इस मंत्र की जीवित तस्वीर बने नज़र आए। दशकों तक बी.बी.सी. के लिए ‘भारत की आवाज़’ बने मार्क टली की बेबाक आवाज़ 25 जनवरी, 2026 को खामोश हो गई।
मार्क टली ने पत्रकारिता के उक्त सिद्धांत को ऐसे जज़्ब कर लिया था कि उनका मतलब ही भरोसे की खबर का होना होता था। ‘सर’ की उपाधि के साथ नवाज़े गये मार्क टली ने भारत के कई अहम चरणों में रिपोर्टिंग की। फिर चाहे वह बाबरी मस्ज़िद गिराने का मामला हो, साका नीला तारा हो, भोपाल गैस दुखांत, 1971 की भारत-पाकिस्तान जंग, इंदिरा गांधी हत्याकांड, राजीव गांधी हत्याकांड और अन्य कितने ही ऐसे ऐतिहासिक घटनाक्रम सर मार्क टली, जो विदेशी मागरिक होने के बावजूद हिन्दी, उर्दू, बंगला और पंजाबी भाषा बड़ी अच्छी तरह से बोल लेते थे, ने साका नीला तारा (ब्लू स्टार) से पहले और बाद में श्री दरबार साहिब के अंदर सेना दाखिल होने के घटनाक्रम की रिपोर्टिंग की। इस दौरान उन्होंने संत जरनैल सिंह भिंडरांवाला के इंटरव्यू भी किए। मार्क टली के अनुसार संत भिंडरांवाला एक प्रभावशाली और चिताकर्षक शख्सियत थे। मार्क टली ने उस समय के विवरण को इकट्ठा कर अपने बी.बी.सी. के सहयोगी सतीश जैकब के साथ मिलकर एक किताब लिखी Amritsar : Mrs Gandhi’s Last Battle इस किताब की प्रस्तावना में ही उन्होंने भारतीय उप-निवेश और उसके बाद के शासन की निरंतरता पर तीखी टिप्पणियां करते हुए कहा कि विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र आज भी ब्रिटिश शासन की संस्थाओं द्वारा शामिल और प्रसारित है। प्रशासन पर भारी पड़ी भारतीय प्रशासनिक सेवा (आई.ए.एस.) ब्रिटिश शासन की आई.सी.एस. की हूबहू नकल है और भारतीय पुलिस सेवा भी उसी की हूबहू नकल है। उन्होंने आगे यह भी कहा कि मैकाले का सज़ा देने वाला कानून आज भी लागू है। किराये के जो गवाह ब्रिटिश राज के हक में गवाही देते थे, वे अब मैजिस्ट्रेटों के सामने स्वतंत्रत भारत की पुलिस के हक में गवाही देते हैं। अंग्रेजों द्वारा विरासत में मिली कानून व्यवस्था का इस्तेमाल अमीर और रसूख वाले लोग सरकार के इरादों को नाकाम करने के लिए करते हैं। गरीब लोग पुलिस और अदालतों को अपना शोषण करने वाला मानते हैं।
बाबरी मस्जिद गिराने के समय के घटनाक्रम मौके पर भी मार्क टली अपने इस बेखौफ और दिलेर अंदाज़ में रिपोर्टिंग करते नज़र आए थे। जानकारी के अनुसार मार्क टली और देश-विदेश के अन्य कई पत्रकार बाबरी मस्जिद के सामने एक छत पर तैनात थे। जब कारसेवक मस्जिद के सुरक्षा घेरे की तारें तोड़ कर अंदर दाखिल हुए और बाबरी मस्जिद का एक गुम्बद गिरा तो उस समय मार्क टली ने फैजाबाद जाने का फैसला किया। उस समय मोबाइल नहीं होते थे और लंदन में बी.बी.सी. हैड ऑफिस भाव मुख्य दफ्तर के साथ सम्पर्क का एक ही ज़रिया फैज़ाबाद में सैंट्रल टैलीग्राफ दफ्तर ही था। जब मार्क टली खबर फाईल करके वापिस अयोध्या जाने लगे तो मस्जिद का बड़ा हिस्सा गिराया जा चुका था। उस समय हिंसक भीड़ ने पूरे रास्ते बंद कर दिए थे। मार्क टली और अन्य स्थानीय पत्रकारों को हिंसक भीड़ ने घेर लिया। वे मार्क टली बी.बी.सी. के पत्रकार की अयोध्या की कवरेज से काफी नाखुश थे। उस समय ज्यादातर कारसेवकों द्वारा ‘मार्क की मौत’ के नारे लगाए गये। हालांकि कुछ अन्य कारसेवकों के सुझाव पर मार्क सहित 5 अन्यों को एक इमारत के एक कमरे में बंद कर दिया गया। एक महंत की मदद से सभी को शाम 6 बजे छोड़ा गया और रात 8 बजे फैज़ाबाद भेजा गया, परन्तु दिलचस्प बात है कि इस घटना के बाद भी मार्क टली ने अयोध्या छोड़ने का फैसला नहीं किया जबकि ज्यादातर पत्रकार उसी रात अयोध्या से रवाना हो गए। मार्क टली ने बाद के समय में दिए इंटरव्यू में मस्जिद गिराने को भारत की धर्म-निर्पेक्षता को आज़ादी के बाद लगा सबसे बड़ा घातक करार दिया। उन्होंने कहा कि मस्जिद गिराने की घटना ने भारत में कई दशकों में हुई सबसे बड़ी बुरी धार्मिक हिंसा को भड़काया।
इंदिरा गांधी द्वारा एमरजैंसी के दौरान जब सैंसरशिप लगाई और जो भी विदेशी पत्रकारों ने इस सैंसरशिप को मानने से इन्कार कर दिया, उनको देश से बाहर भेज दिया गया। मार्क टली उन पत्रकारों में से एक और शायद पहली कतार वाले पत्रकार थे। जानकारी के अनुसार उस समय के सूचना और प्रसारण मंत्री वी.सी. शुकला ने बी.बी.सी. द्वारा जारी की गई उस कथित खबर की पुष्टि करने को कहा जिसमें कहा गया था कि इंदिरा गांधी ने एक कैबिनेट बैठक में ऐलान किया है कि वह एमरजैंसी लगाने वाले हैं। टली ने कहा कि बी.बी.सी. द्वारा यह खबर नहीं चलाई गई, परन्तु यदि वह (मंत्री) इसकी तसदीक करते हैं तो वह यह खबर चला देंगे। बाद में मार्क टली ने जब सैंसरशिप के साथ संबंधित कागज़ों पर हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दिया तो उनको 24 घंटे में देश छोड़ने को कहा गया। हालांकि 18 माह बाद वह वापिस भारत आ गये और अंतिम समय तक भारत में ही रहे।
विदेशी नागरिक और प्रवासी भारतीय
मार्क टली मूल रूप से ब्रिटिश नागरिक थे, परन्तु उन्होंने अपनी ज़िंदगी का तीन चौथाई से अधिक समय भारत में बिताया। टली ने कभी भी अपनी ब्रिटिश नागरिकता नहीं छोड़ी थी। हालांकि भारत में रहते हुए उन्होंने प्रवासी भारतीय होने का पास्पोर्ट भी हासिल कर लिया था। उन्हें सदैव अपनी भारतीय और ब्रिटिश पहचान पर गर्व था।
मार्क टली का जन्म कोलकाता में 1935 में हुआ उनके पिता विलियम स्कार्थ कार्लिस्ले टली (William Scarth Carlisle Tully) और माता का नाम पेशेंस ट्रेबी (Patience Treby) था जो ब्रिटिश शासन के रसूखदार परिवारों में से थे। 1935 का ही वह साल था जब भारत सरकार द्वारा कानून पास हुआ था, जिसके मुताबिक 12 सालों में सत्ता का तबादला ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र भारत को किया जाना था। उस समय जब अंग्रेज़ों भारत छोड़ो मुहिम चल रही थी, टली अपने घर में ब्रिटिश संस्कारों के साथ बड़ा हो रहा था। ऐशपरस्ती वाली ज़िंदगी जी रहे टली को हिन्दी बोलने और सीखने की सख्त मनाही थी। एक बार जब उनकी अंग्रेज़ नैनी (आया) ने उसको परिवार के ड्राईवर के साथ हिन्दी सीखते हुए सुना तो उसने ज़ोर से थप्पड़ मारते हुए कहा था, यह नौकरों की भाषा है, आपकी नहीं।
टली के मां-बाप आज़ादी के बाद इंग्लैंड चले गये। दाज़र्ीलिंग से अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी होने के बाद आगे की पढ़ाई उन्होंने इंग्लैंड से की। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से धर्म शास्त्र की पढ़ाई के बाद वह पादरी बनना चाहते थे परन्तु बाद में उन्होंने यह विचार छोड़ दिया हालांकि दिल से वह काफी धार्मिक थे। शायद भारत में उनके रहने का एक कारण यह भी था कि उनका विचार था कि भारत सभी महान धर्मों के लिए एक ऐतिहासिक घर है।
वह 1964 में वापिस भारत आ गये। उस समय बी.बी.सी. में कोई अंग्रेजी का पत्रकार नहीं था और हिन्दी सेवा के साथ जुड़े कई अस्थायी पत्रकार थे। मार्क टली ऐसे हालात में बी.बी.सी. रोडियो के साथ जुड़े जब 1960 के समय में रेडियो प्रसारण में आकाशवाणी, जो कि सरकारी ज़बान बोलता मीडिया माना जाता था और रोडियो सिलोन का बोलबाला था परन्तु सरकारी दबाव और अन्य परेशानियों के बावजूद टली ने पत्रकारिता में अपना स्थान बनाया और कई एतिहासिक और कई काले घटनाक्रमों की गवाही दी जिसने उनको इतिहास में पत्रकारों के बेहतरीन वर्ग में ला कर खड़ा कर दिया।
टली जो बाद में बी.बी.सी. के भारत में ब्यूरो चीफ बने, ने 22 साल तक भारत में संस्था के का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने 1994 में बी.बी.सी. के उस समय के डायरैक्टर जनरल जॉहन बर्ट और बी.बी.सी. पर कार्पोरेट संस्थाओं की तरह चलाने और उसको डर के साथ चलाने के आरोप लगाते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। बाद में वह स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर पत्रकारिता करते रहे और एक प्रोग्राम ‘समथिंग अंडरस्टुड’ द्वारा बी.बी.सी. के साथ भी जुड़े रहे।
किताबें और सम्मान
टली ने Amritsar : Mrs Gandhi’s Last Battle के अलावा भी कई किताबें लिखीं, ‘No full stops in india’ जो भारत में दो दशकों से अधिक कार्य करने संबंधी 10 निबंधों का संग्रह है। इसके अलावा ‘India in Slow Motion, India’s Unending Journey, India : The road ahead, The Heart of India, Upcountry tales—Once upon a time in the heart of India’ शामिल हैं।
टली को उनकी सेवाओं के लिए 1992 में पद्मश्री के साथ और 2005 में पद्म भूषण के साथ सम्मानित किया गया। साल 2002 में ब्रिटेन द्वारा उनको पत्रकारिता के लिए ‘सर’ की उपाधि दी गई।
भारत की आवाज़ माने जाते और भारत को केन्द्र में रख कर शब्दों को समर्पित ज़िंदगी जीने वाले मार्क टली चाहे अब हमारे बीच नहीं हैं, परन्तु उनकी रचनाएं और पत्रकारिता करने का उनका सलीका आने वाली पीढ़ियों की रहनुमाई करता रहेगा। उनके योगदान को कुछ ल़फ्ज़ों में पिरोना हो तो कह सकते हैं :
‘नहीं कोई ज़रूरत याद रखने की हमें
हम खुद ही याद आएंगे जहां ज़िक्र-ए-व़फा होगा।’
-मो. 099101-88350
ईमेल : upma.dagga@gmail.com




