भाजपा के लिए समस्या बन गया है यू.जी.सी. के नियमों का विवाद
जिस समय सुप्रीम कोर्ट यू.जी.सी. की इक्विटी नियमावली पर रोक लगाने का फैसला दे रही थी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस समय गणतंत्र दिवस के कार्यक्रमों का समापन करते हुए बीटिंग रिट्रीट की धुन सुन रहे थे। मैं यह सोचना चाहता हूँ कि क्या नरेंद्र मोदी के कान में जब उनके किसी सहायक ने फुसफुसा कर खबर दी होगी कि कोर्ट ने नियमावली पर स्टे दे दिया है, तो क्या उन्होंने राहत की सांस ली होगी। मेरे खयाल से नरेंद्र मोदी ने उस सहायक से पूछा होगा कि ठीक-ठीक बताओ, रोक लगाई है या उसे खारिज कर दिया है। ज़ाहिर है कि मोदी जी रोक वाले फैसले से तसल्ली पाने जैसी गलती नहीं कर सकते थे। तो क्या कोर्ट अगर खारिज कर देता तो मोदी जी कुछ समय के लिए ठंडी सांस ले सकते थे। मुझे तो लगता है कि मोदी जी न रोक से खुश हो सकते थे, न खारिज होने से। आज के हालात में रोक का मतलब यह है कि भाजपा के खिलाफ आंदोलनरत सामाजिक शक्तियां चुप नहीं बैठेंगी। वे इसे पूरी तरह से खारिज करवाने के लिए आंदोलन जारी रखेंगी क्योंकि उन्हें डर है कि इसी नियमावली को कुछ हेरफेर के साथ, कुछ अधिक चालाकीपूर्ण शब्दावली में फिर से लागू कर दिया जाएगा। इसी तरह आज के हालात में खारिज करने का मतलब यह है कि ब्राह्मण-ठाकुर खुशी मनाएंगे, और एसटी-एसटी और ओबीसी आंदोलन के मैदान में कूद पड़ेंगे ताकि सरकार को मजबूर कर दिया जाए कि वह इस तरह की नियमावली किसी न किसी रूप में लाज़िमी तौर पर लागू करके दिखाए।
मुझे तो लगता है कि वह प्रधानमंत्री निवास जा कर इस उधेड़बुन में लग गये होंगे कि जो जिन्न बोतल से निकल आया है उसे दोबारा बोतल में कैसे बंद किया जाए। दरअसल, यह जिन्न जब बोतल में था तो बहुत छोटा सा लगता था। अब बाहर निकल आया है, तो इतना बड़ा और विकराल लग रहा है कि उसे फिर से बोतल में डालने के लिए मोदी और भाजपा को न जाने क्या-क्या तिकड़में करनी पड़ेंगी। मोदी जी काफी चालाक हैं, वे समझ चुके हैं कि इस मामले में उनके दायें कुआं, बायें खाई, आगे तालाब और पीछे नदी है। किधर भी जाएं, किसी न किसी में गिरना तय है। अभी तक होता यह था कि पार्टी जिस मुद्दे पर कभी फंसती थी, उसका ठीकरा या विपक्ष की साज़िश पर फोड़ दिया जाता था, या कथित राष्ट्रविरोधियों के मत्थे मढ़ दिया जाता था। कभी-कभी विदेशी ताकतें भी समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार करार दे दी जाती थीं लेकिन यूजीसी के काले कानून के मामले में ठीकरा हर तरह से मोदी जी की देहरी पर ही फूट रहा है।
यह जिन्न कितना विकराल है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिस समय मोदी जी बीटिंग रिट्रीट की धुन सुन रहे थे, उसी से कुछ पहले भाजपा की लखनऊ इकाई के 11 पदाधिकारी मंडल स्तर के महामंत्री अंकित तिवारी के नेतृत्व में यूजीसी के काले कानून के खिलाफ इस्तीफा दे रहे थे। बात यहीं तक नहीं रुकी थी। रायबरेली में एक मंडल मुखिया श्याम सुंदर त्रिपाठी का इस्तीफा भी अध्यक्ष के पास पहुंच चुका था। ये तो केवल दो उदाहरण हैं। संगठन के पदों से इस्तीफे की सूची बहुत लम्बी है। यह केवल उत्तर प्रदेश तक ही सीमित नहीं है। भाजपा के पूरे प्रभाव-क्षेत्र (जिसमें समूचा उत्तर भारत, मध्य भारत, पश्चिम भारत) में यूजीसी के काले कानून के खिलाफ प्रतिध्वनियां हो रही हैं। काशी के मंदिरों में वे कसमें गूंज रही हैं जिनमें मोदी के पूर्व भक्तों ने देवताओं के सामने कसमें खाई हैं कि वे अब भाजपा को किसी भी कीमत पर वोट नहीं देंगे।
तकनीकी रूप से यह आंदोलन जनरल कैटेगरी के लोगों का है, जिनका 80-90 प्रतिशत हिस्सा पिछले 11 साल से भाजपा का निष्ठावान वोटर है, मोदी जी का भक्त है। हम जानते हैं कि उत्तर प्रदेश के ब्राह्मणों और ठाकुरों में आज की नहीं, बहुत पुरानी राजनीतिक लाग-डांट है, पर इस आंदोलन का नेतृत्व मोटे तौर पर उत्तर प्रदेश व बिहार के ब्राह्मण और ठाकुर मिल कर रहे हैं, हालांकि आंदोलनकारियों की भीड़ में ऊंची जातियों के सभी हिस्सों की नुमाइंदगी जम कर देखी जा रही है। ऐसे समय में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की तरफ से बनारस में अपने भव्य सिंहासन पर बैठे हुए योगी सरकार की ठकुराइत पर छींटाकशी जारी है, लेकिन यूजीसी वाले मामले में परशुराम सेना और करणी सेना के लक्ष्यों की एकता साफ दिखाई पड़ रही है। ये जनरल कैटेगरी वाले लोग स्वयं को सवर्ण कह रहे हैं। यह अलग बात है कि ओबीसी जातियों के पास भी वर्ण व्यवस्था में एक वर्ण होता है, पर यह भाजपा सरकार और यूजीसी का कमाल है कि चार वर्णों में से एक वर्ण इस समय अवर्णों यानी अनुसूचित जातियों और जनजातियों के साथ पाले के उस तरफ डाल दिया गया है। पाले के इस तरफ तीन वर्ण और उससे मिलती-जुलती जातियों के लोग हैं।
यहां मैं एक बात साफ कर दूँ कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने उत्तर प्रदेश सरकार पर अपना अब तक का सबसे बड़ा आक्रमण किया है। उन्होंने कहा है कि मैंने तो अपने शंकराचार्य होने का प्रमाण दे दिया। अब योगी जी चालीस दिन में प्रमाण दें कि वह हिंदू हैं। इतने दिनों में उन्हें अपने गो-भक्त होने का प्रमाण दे देना चाहिए। गो-माता को राज्यमाता घोषित करें। उत्तर प्रदेश से गोमांस का निर्यात बंद करें, नहीं तो आपको गैर-हिंदू घोषित कर दिया जाएगा।
हालांकि योगी और मोदी एक-दूसरे को नापसंद करते हैं, पर हिंदुत्व के इन दोनों सेनापतियों पर ऐसा संकट एक साथ पहले कभी नहीं आया था। इस संकट की तलवार दोधारी है। एक धार मोदी की तरफ है, दूसरी योगी की तरफ। दोनों के ही समर्थक उनकी पार्टी भाजपा को भर-भर कर गालियां दे रहे हैं। सरकार को कोस रहे हैं। छले हुए महसूस कर रहे हैं। इस हंगामे और युद्ध में जो लोग किनारे बैठे देख रहे हैं, उनके मन में भी कम अंदेशे नहीं हैं। उन्होंने भी लड़ाई की पूरी तैयारी कर रखी है। याद रखिये 1990 में हुए आरक्षण विरोधी आंदोलन में जब ऊंची जातियां धरती काट रही थीं, तो ओबीसी-दलित चुप बैठे रहे थे। इस बार वे चुप नहीं रहने वाले हैं।
जो लोग चतुर सुजान हैं और दावा करते हैं कि उन्हें भाजपा के भीतर की खबर रहती है और वे ही दरअसल मीडिया को खाने-पीने वाली जनता को हिंदुत्ववादी बनाने का काम करते हैं, उनका होश गुम है। उन्हें तो पता ही नहीं था कि मोदी जी ऐसा कानून लाने वाले हैं। ये लोग धर्मेंद्र प्रधान के बड़े प्रशंसक थे। संघ की किसी आलोचना पर इन्हें बहुत बुरा लगता था। आज ये लोग भी परेशानी में पड़ कर सोच रहे हैं कि भाजपा आत्महत्या करने पर उतारू क्यों है।
मेरे कुछ मित्रों ने पूछा है कि यूजीसी की इक्विटी कमेटी के विवादास्पद सवाल पर राहुल गांधी ने क्या किया? क्या उन्होंने कोई वक्तव्य दिया? उन्हें कुछ तो करना चाहिए था। अपने इन दोस्तों से मेरा तो कहना यह है कि फिलहाल तो राहुल गांधी को इस समय केवल अपनी जगह बैठ कर मुस्कराना चाहिए क्योंकि उन्होंने सामाजिक न्याय का जो नैरेटिव चलाया था, उसमें मोदी जी फंस गए हैं। अमित शाह फंस गये हैं। धर्मेंद्र प्रधान फंस गए हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ फंस गया है। नैरेटिव के लिहाज़ से इतनी बड़ी जीत राहुल गांधी की कभी नहीं हुई। उनके दोनों हाथों में लड्डू हैं। अगर सरकार बज़रिये सुप्रीम कोर्ट के या किसी और तिकड़म से यूजीसी नियमावली को वापिस लेती है या आंदोलनकारियों की मांगों के मुताबिक उसमें संशोधन करती है, तो एससीएसटी-ओबीसी मैदान में उतर आएंगे। अगर नहीं करती, इस कानून को वैसा ही बनाये रखती है तो मोदी और भाजपा के कोर समर्थक पार्टी का साथ छोड़ देंगे और जो गालियां अभी पड़ रही हैं, वे और भी ज्यादा गंदी और भयानक हो जाएंगी। सारा खेल बिगड़ जाएगा। हालत यह है कि इस समय भाजपा हिंदुत्व की जिस पिच पर हिंदू बनाम मुसलमान करने में लगी हुई थी, वह भी ठंडी पड़ी हुई है। कहीं ये तो नहीं कि मोदी जी ने अपने रणनीतिकारों के साथ बैठ कर सोचा हो कि एक सीक्रेट मास्टर स्ट्रोक मारते हैं और राहुल गांधी के नैरेटिव की हवा निकल देते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि राहुल को परास्त करने और उनके ताकतवर नैरेटिव को छीनने के लिए यूजीसी के ज़रिये यह मास्टर स्ट्रोक मारा गया हो। जो भी हो, यह उल्टा बैठ चुका है। जिन्न अब बोतल में वापिस नहीं जाने वाला। भाजपा का कोर वोटर हत्थे से उखड़ चुका है। देखिये, अब राजनीति का ऊंट किस करवट बैठता है।
लेखक अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में प्ऱोफेसर और भारतीय भाषाओं के अभिलेखागारीय अनुसंधान कार्यक्रम के निदेशक हैं।



