ट्रम्प की नज़र अब ग्रीनलैंड पर

नोबेल शांति पुरस्कार की बेचैनी से इंतजार करते ट्रम्प युद्ध और कब्ज़े में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं। है न अजीब! वेनेजुएला पर आधिपत्य स्थापित करने के लिए राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में लिया। ईरान को धमकाया, अब ग्रीनलैंड पर उनकी नज़र है। सीधे कहा कि आठ युद्ध रुकवाने पर भी नोबेल नहीं मिला अब मैं ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करूंगा। उनके ऐसे ही विचारों के कारण ब्रांड अमरीका कमज़ोर पड़ गया। उनके फैसलों से दुनिया पर असर हुआ और साइड इफैक्ट नज़र आने लगे। अमरीका के राष्ट्रपति के रूप में उनका पहला साल पूरा हुआ। अब 2.0 यानी दूसरा साल आरम्भ हुआ है। पिछले साल ट्रम्प ने टैरिफ के नाम पर 91 से अधिक देशों पर इकोनॉमिक वारफेयर शुरू किया, लेकिन ब्रांड अमरीका कमज़ोर हुआ है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 80 साल में पहली बार ऐसा हुआ है। हालांकि टैरिफ से निपटने के लिए भारत, चीन व जर्मनी ने अपने रास्ते तलाश लिए हैं, लेकिन लगने लगा है कि ट्रम्प अब मिल्ट्री पावर के रूप में दुनिया पर कब्ज़ा करने की सोचने लगे हैं। ग्रीनलैंड पर कब्ज़े के ट्रम्प के इरादे से नाटो के बिखराव की सम्भावना बढ़ गई है।
इस समय ग्रीनलैंड अन्तर्राष्ट्रीय विमर्श के रूप में उभर चुका है। पहले तो ट्रम्प की दिलचस्पी ने चौंकाया वह एक ऐसा द्वीप है, जिसका अधिकांश हिस्सा बर्फ से ढका है, जिसकी जनसंख्या 57000 मात्र है। लेकिन रेयर अर्थ्स, खनिजों और भविष्य की सम्भावनाओं से भरपूर। शीत युद्ध के दौरान ग्रीनलैंड-आइसलैंड-यू.के. गैप नाटो की समुद्री रणनीति का केन्द्रीय तत्व था, जो अटलांटिक में प्रवेश करने वाली सोवियत पनडुब्बियों की निगरानी को सम्भव बनाता था। दशकों तक आर्कटिक एक जमे हुए बफर की तरह रहा-दूरस्थ, दुर्गम बना फिर जलवायु परिवर्तन ने मंजर बदल दिया। पिघलती बर्फ ने नये रास्ते खोल दिए। इसके अतिरिक्त हाइपरसोनिक हथियारों, लम्बी दूरी के स्टीक प्रहार, अंतरिक्ष आधारित सैंसर, मिसाइल रक्षा और समुद्रगत प्रणालियों के कारण दूरी सिमट रही है।  अमरीका को शायद काफी कम खतरों का सामना करना पड़ा है। पर्ल हार्बर ने उसके मेनलैंड को निशाना नहीं बनाया था। परम्परागत रूप से प्राथमिकता यही रही कि वह खतरों से दूर अपनी सीमाओं को देखते हुए विदेशों में व्यस्त रहे। 
एक ऐसा रणनीतिक क्षेत्र जिसकी जनसंख्या काफी कम है और सुरक्षा प्रबन्धन में ज्यादा मज़बूत न हो शिकारी नज़रों में आकर्षण का केन्द्र बन जाते हैं। वैसे भी ग्रीनलैंड को रणनीतिक रूप से कमज़ोर छोड़ देना कभी अमरीका के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। लेकिन सभ्य समाज जंगल के कानून से नहीं चलता। यहां जीओ और जीने का स्लोगन ज्यादा आदर्श वाक्य है जिसका पालन सभी देशों को करना ही चाहिए। स्वार्थ से भरा नेरेटिव गढ़ने की ज़रूरत नहीं। न ही वर्चस्ववाद को लेकर पैनिक होने की।
उधर रूस ने आर्कटिक के बड़े हिस्सों पर दोबारा सैन्यकरण कर लिया है। उसने पुराने ठिकानों को फिर से सक्रिय किया है और अपनी सैन्य क्षमताओं का विस्तार किया है। चीन ने भी नियर आर्कटिक राष्ट्र घोषित करते हुए शोध केन्द्रों, निवेश, कूटनीति के जरिए इस क्षेत्र में मौजूदगी को लगातार  काम किया है। ऐसे में अमरीका का चुप बैठे रहना असम्भव था। ट्रम्प ऐसी ही शैली अपना रहे हैं। ग्रीनलैंड में दुर्लभ मिनरल्स का विशाल भंडार है जो ट्रम्प को आकर्षित लग रहा है। कुछ लोगों को लगता है कि वहां तेल और गैस के भंडार हो सकते हैं। रूस को छोड़ कर वहां सबसे ज्यादा ऑयल है। ट्रम्प तो वैसे भी शांति की बात के लिए बाध्य नहीं हैं। ऐसा वह खुद कह रहे हैं।

#ट्रम्प की नज़र अब ग्रीनलैंड पर