किसी बड़े हादसे की राह तकते देश के 216 से ज्यादा जर्जर बांध

इससे बड़ी चिंतनीय खबर और क्या हो सकती है कि देश के जल शक्ति राज्यमंत्री राजभूषण चौधरी ने स्वीकार किया है कि देश के 216 बांध गंभीर कमियों से जूझ रहे हैं। महाराष्ट्र के 50 बांध तुरंत मुरम्मत की मांग कर चुके हैं और तेलंगाना का मेडिगड्डा बैराज तथा उत्तर प्रदेश का लोअर खजूरी डैम खतरे की इमरजेंसी स्थिति में हैं। इन दोनों को तुरंत मुरम्मत चाहिए। मंत्री ने यह भी कहा कि दोनों इमरजेंसी खतरे वाले डैमों की अगर तुरंत मुरम्मत नहीं हुई तो कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है। हादसा कितना बड़ा होगा, इसे दिल्ली से सटे नोएडा में पिछले दिनों जान गंवाने वाले उस इंजीनियर की मौत से समझ लीजिए जो दो घंटे तक मदद को चिल्लाता रहा और उसकी मदद मौके पर मौजूद सरकारी हुक्मरानों ने नहीं की। कारण वहां ठंडा पानी था और जब यह डैम हादसे से गुजरेंगे तो कितना पानी बहेगा, इसका अनुमान लगाइये और फिर सोचिए कि कितनी जानें जाएंगी। कितने करोड़ों की संपत्ति मिट्टी में मिल जाएगी। यहां पर लोगों की मदद करने के लिए ठंडे या अधिक पानी से डरने वाले कर्मवीर मददगार कैसे आगे आएंगे? 
जिस तरह से राज्य स्तरीय मंत्री ने यह बात स्वीकार की है, संसद को बताया है, उसी तरह से अभी तक कहीं से भी यह खबर नहीं आ रही है कि जो बांध खतरे की ज़द में थे या हैं, उनकी मुरम्मत या सुध लेना अभी आरंभ हुआ या नहीं? गर हो गया है तो जो जनसामान्य यह खबर सुन चुका है कि 216 बांध मौत का परवाना ला सकते हैं, उसे यह क्यों नहीं बताया जा रहा है कि सरकार ने काम आरंभ कर दिया है, डरने की अब ज़रूरत नहीं है। क्या हादसा हो जाने के बाद यह काम आरंभ होगा? हिन्दुस्तान में आज़ादी के बाद से बना सबसे पहला बांध भाखड़ा नंगल बांध कहा जाता है। इसका निर्माण 1948 में आरंभ हुआ। वैसे हीराकुंड बांध भी 1947 में बनना आरंभ हुआ था। उसके बाद से बांधों के माध्यम से देश का विकास विभिन्न कार्यों में हुआ। पानी, बिजली जैसी व्यवस्थाओं के लिए इनका सर्वाधिक उपयोग हुआ, लेकिन इनकी सुध उस रफ्तार से नहीं ली गई जिस रफ्तार से इनके निर्माण के लिए योजनाएं बनीं। 
इसका अंदाज लगाइये कि देश के बांधों में सरंचनात्मक और तकनीकी कमी है और इनकी संख्या 216 है। बाकी जो बांध बचे हैं उनकी क्या स्थिति है इसका उदाहरण जयपुर का रामगढ़ बांध है। रामगढ़ बांध जिसे बंधा भी कहा जाता है, में देश के पहले एशियन गेम में नौकायन की प्रतियोगिता हुई थी और यह लंबे समय तक शहर की प्यास बुझाता रहा। पर आज इसमें पानी नहीं है और इसमें पले-बड़े हुए मगरमच्छ जब-तब बांध के आसपास घूमते नज़र आते हैं। न जाने कितने फार्म हाउस बन चुके हैं तथा यहां आने वाले पानी को कैचमेंट एरिया की आड़ में रोक दिया गया है। आखिर रामगढ़ जैसे बांध देश में कितने हैं, इसका आंकड़ा कब सामने आएगा? देश में जो बड़े बांध हैं, उनमें शामिल हैं- हीराकुंड, सरदार सरोवर, फरक्का, उरी, इंदिरा गांधी, रणजीत सागर, इडुक्की, भाखड़ा नंगल, पोंग, नागार्जुन, धौलीगंगा, रिहंद, अलमाटी, टिहरी और कोटेशवर आदि। इन बांधों पर देश की अधिसंख्या आबादी सिंचाई और पीने के पानी के लिए निर्भर है। जो बांध बहुत ही नाजुक स्थिति में हैं, उनमें महाराष्ट्र के 50 बाधों के अतिरिक्त मध्यप्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में 24-24, तमिलनाडु में 19, तेलंगाना में 18, उत्तरप्रदेश में 12, झारखंड मं 10, केरल में 9, आंध्रप्रदेश में 7,गुजरात में 6 तथा मेघालय में भी 7 बांध हैं। 
खास बात यह कि इन राज्यों में से कई राज्यों में भाजपा की सरकार है। यूं भारत में अभी 5254 बांध हैं, जो जनसामान्य को लाभावान्ति कर रहे हैं और न जाने कितने बांध हैं, जिनकी गिनती बाकी है। उन बांधों के विषय में कोई नहीं जानता जो जनता ने खुद मदद की गुहार के बाद भी मदद का परवाना नहीं मिलने के बाद कच्चे या अधपक्के बना लिए हैं और उनमें भी बारिश के बाद उतना पानी होता है कि छोटी-मोटी जनहानि तो हो ही सकती है। महाराष्ट्र बांधों के मामले में पहले नंबर पर है और उसके बाद मध्यप्रदेश तथा गुजरात हैं। बांधों की सुरक्षा और उनकी देखरेख मंत्री के बयान के बाद राष्ट्रीय चिंता का विषय बन गया है। कारण बहुत सीधा सा है। महाराष्ट्र के रत्नागिरि में तिवरे बांध के टूटने से ड़ेढ दर्जन जानें गईं। राजस्थान के मलसीसर में बांध टूटने से भी काफी नुकसान हुआ। गुजरात का मच्छू बांध हादसा कोई शायद ही भूला हो। यहां पर बांध टूटने से दो हजार जानें जाने की सूचना है, तो उत्तराखंड के चमोली में हिमखंड टूटने से हुई बांध दुर्घटना कोई बहुत पुरानी नहीं है। यहां पर कम से कम 100 लोगों के बहने की बात थी। हादसों का रिकार्ड अगर लिखा जाए तो रूह कांप जायेगी। मूल प्रश्न यह है कि आखिर कब व्यवस्था चेतेगी? कब सरकार जगेगी, खासकर जब खुद मंत्री ने स्वीकारा है कि बांधों की तुरंत मुरम्मत होनी चाहिए, कब वे जिम्मेदार अफसर जागेंगे जो इन बांधों को समझते हैं या जिन्हें पता है कि इनमें से एक के भी टूटने से कितनी हजार जानें जाएंगी? क्या इनके टूटने के बाद जांच आयोग बताएगा कि यह नुकसान इस वजह से हुआ?
आज की तारीख में देश के आधे बांध लगभग आधी सदी पुराने हैं और केन्द्र सरकार के विजन-2047 तक ये लगभग उतने पुराने हो जाएंगे कि इनको खतरनाक स्थिति में रखा जायेगा। जब वर्ष 2019 में लोकसभा में बांध सुरक्षा विधेयक पास हो चुका है, पाकिस्तान को बांध के माध्यम से ही ‘आपरेशन सिंदूर’ में हराया जा चुका है, तो फिर क्यों नहीं उनकी मुरम्मत तुरंत आरंभ हो रही है और अगर हो गई है तो उसकी सूचना कहां है? 
जहां तक दलगत बात है तो बांधों की मुरम्मत की बात कांग्रेस सरकार में भी हुई है तो फिर यह 216 का आंकड़ा क्यों डरा रहा है? 1986 में भी बांध सुरक्षा की बात लोकसभा में हुई थी और यह भी जान लीजिए कि भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने वर्ष 2017 में अपनी रिपोर्ट में कह दिया था कि देश के बड़े बांधों में से सिर्फ 349 बांध ही आपातकालीन कार्ययोजना को पूरा करते हैं? इसका मतलब क्या है? क्या बाकी अभी भी असुरक्षित हैं और अगर हां तो उसका जिम्मेदार कौन है? 
ऐसे दूसरे उदाहरण भी हैं जहां मुरम्मत के बाद भी घटनाएं हुईं, लेकिन अब जब सरकार को पता है तो किस बात का इंतजार है? क्या यह मुरम्मत का कार्य भी गंगा-यमुना में बह गए पानी की तरह सिर्फ बयानों में नज़र आएगा या फिर हादसा होने से पहले उसे रोकने के लिए प्राथमिकता तथा युद्धस्तर पर कार्य होगा?

-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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