ग्रामीण समृद्धि की रीढ़ बनेगा पशुधन

घुम और ग्रामीण की समृद्धि की रीढ़ अब केवल कृषि तक सीमित नहीं रह गई है। इस आम बजट में सरकार ने पशुधन से पशुपालकों और दुग्ध उत्पादकों की आय बढ़ाने के ठोस उपाय किर दिए हैं। इससे रोज़गार बढ़ने के साथ दैनिक और मासिक आमदनी में स्थिरता आएगी। कृषि पर बढ़ते संकट कम होंगे। पशुधन, मुर्गी व मत्स्य पालन ग्रामीणों की आजीविका के भरोसे का सहारा बनेंगे। यह पशुधन स्वस्थ बना रहे, इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए 20 हज़ार से अधिक पशु चिकित्सकों की उपलब्धता भी तय की गई है। ताकि गांव में ही त्वरित इलाज की सुविधा मिले। फिलहाल देश में पशु चिकित्सकों की बहुत कमी है। इस कारण उत्पादन प्रभावित हो रहा है। इस कमी को दूर करने के लिए डेढ़ लाख पशु देखभाल प्रशिक्षित सेवकों की अतिरिक्त तैनाती की जाएगी। इस उपाय से दुधारू पशुओं की असमय मृत्यु में कमी आएगी। 
पशुधन की महिमा इस तथ्य से जानी जा सकती है कि कृषि से होने वाली कुल आय में करीब 16 प्रतिशत की भागीदारी पशुपालन और उनसे उत्पादित आहार से है। इस आय में लगातार पिछले 11 साल से 12.77 प्रतिशत की वार्षिक दर से वृद्धि हो रही है यानी कृषि जहां लघु व मध्यम किसानों के लिए घाटे का सौदा बनी हुई है, वहीं पशुपालन ग्रामीणों की आय का साधन बन गया है। भारत दूध उत्पादन में दुनिया में पहले सोपान पर है। विश्व के कुल दूध उत्पादन में भारत 25 प्रतिशत का योगदान दे रहा है। विगत 10 वर्ष में देश में दूध का उत्पादन लगभग 57 प्रतिशत बढ़ा है। परिणामस्वरूप प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता 2024-25 में 485 ग्राम प्रतिदिन हो गई है। 9 वर्ष पहले यह उपलब्ता महज 300 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन थी। कुछ साल पहले दुग्ध उत्पादों के आयात की संभावना जताई जाने लगी थी, किन्तु अब पशु संवर्धन के लिए किए गए प्रयास रंग दिखाने लगे हैं। विगत एक दशक में दूध के उत्पादन एवं उत्पादकता में आज़ादी के बाद से सर्वाधिक वृद्धि हुई है। मुर्गी एवं मत्स्य पालन के साथ जलीय कृषि को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। इसीलिए अमरीका जैसे देश भारत के दूध बाज़ार को हड़पना चाहते हैं। भारत ने अमरीका के लिए निर्मित वस्तुओं को बाज़ार नहीं खोले तो अनर्गल टैरिफ लगा दिए।
पशुधन का संरक्षण इसलिए ज़रुरी है, क्योंकि ग्रामों में दूध नियमित नकद आय का पुख्ता आधार बना हुआ है। ग्रामीण रोज़गार और अर्थव्यवस्था में इसकी बड़ी भागीदारी है।  जैविक तकनीक के क्षेत्र में भविष्य की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए केंद्र सरकार इस क्षेत्र में देश में पहली बार ई-3 (इकोनोमी, एनवायरमेंट, एमप्लायमेंट) नीति कुछ समय पहले जारी की है। इसके तहत दूध, खाद्यान्न, पर्यावरण सहित आम जनजीवन के सामने आने वाली प्रत्येक चुनौती से निपटने की तैयारी है। इस क्षेत्र में फिलहाल जनता को सबसे बड़ा लाभ जैविक दूध के रूप में मिलने वाला है। पशुधन के बिना मिलने वाला यह जैविक दूध इसकी कमी पूरा करने के साथ पौष्टिक भी होगा। यह नई औद्योगिक क्रांति, जैव तकनीक और बायो मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में होगी। 
अब तक बिना किसी सरकारी मदद के दूध का कारोबार फलता-फूलता रहा है। दूध का 70 फीसदी कारोबार असंगठित ढांचा संभाल रहा है। इस व्यापार में लगे ज्यादातर लोग पारम्परिक ज्ञान से न केवल वे दुग्ध उत्पादन में दक्ष हैं, बल्कि दूध के सह-उत्पाद बनाने में भी कुशल हैं। दूध का 30 फीसदी कारोबार डेयरियों के माध्यम से होता है। देश में दूध के उत्पादन से 96 हज़ार सहकारी संस्थाएं जुड़ी हैं। 14 राज्यों की भी अपनी दुग्ध सहकारी संस्थाएं हैं। देश में कुल कृषि खाद्य व दूध से जुड़ी प्रसंस्करण संस्थाएं केवल दो प्रतिशत हैं। चाहे वे अशिक्षित हैं, किन्तु पारम्परिक ज्ञान से कुशल ग्रामीण स्त्री-पुरुष ही हैं, जो दूध का देशी उपायों से प्रसंस्करण करके दही, घी, मक्खन, पनीर आदि बना रहे हैं। इस कारोबार की विलक्षण खूबी यह भी है कि इससे सात करोड़ से ज्यादा लोगों की आजीविका चलती है। एक अनुमान के अनुसार भविष्य में जलवायु परिवर्तन और उच्च तापमान के कारण सालाना दूध उत्पादन में 32 लाख टन की कमी आ सकती है। इसलिए ज़रुरी है कि दुधारू पशुओं की सभी प्रजातियों की नस्लों का संरक्षण व संवर्धन किया जाए। 
इस दृष्टि से 20 हजार पशु चिकित्सक, डेढ़ लाख दक्ष पशु सेवा प्रदाताओं के प्रबंध के साथ 84 पशु चिकित्सा महाविद्यालय खोलने का प्रावधान इस बजट में किया गया है। भारत में देशी नस्ल के दुधारू पशु उत्तर, मध्य, पूर्व और पश्चिम भारत में पाए जाते हैं। यदि इनके आनुवंशिक स्वरुप को उन्नत करने और इनके वंश की वृद्धि के कारगर प्रबंध किए जाते हैं तो देसी नस्ल की गायों से दुग्ध का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। दक्षिण भारत में पाई जाने वाली पंगुनूर, विचूर और कृष्णा घाटी की गायों के आनुवंशिक संरक्षण की आवश्यकता को भी पूरा किया जाना ज़रूरी है, क्योंकि इस नस्ल के पशुओं की संख्या में तेजी से गिरावट आ रही है। यदि यह योजना प्रभावी ढंग से क्रियान्वित होती है तो आने वाले चंद सालों में पशुधन ग्रामीण भारत की रोज़गार की पुख्ता गारंटी बन जायेगा। -मो. 94254-88224

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