राजनयिक सांसत में डाल रहे हैं असम के मुख्यमंत्री बिस्वा सरमा

देश की दो प्रमुख वामपंथी पार्टियों माकपा व भाकपा ने मंगलवार (10 फरवरी 2026) को सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल कीं यह मांग करते हुए कि असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराये जाने और एसआईटी जांच कराये जाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की हैं। याचिकाओं में कहा गया है कि सरमा एक समुदाय विशेष के विरुद्ध नफरती भाषण व बयान देते हैं और हाल ही में उन्होंने एक वीडियो पोस्ट किया, जिसमें उन्हें एक समुदाय के लोगों पर बंदूक से गोली चलाते हुए दिखाया गया है। याचिकाओं में यह भी कहा गया है कि सरमा ने अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ नफरत व हिंसा भड़काने का प्रयास किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब मलेशिया के दौरे पर थे, तो एआई की मदद से बनाया गया यह आपत्तिजनक वीडियो असम की भाजपा इकाई ने अपने आधिकारिक एक्स हैंडल पर पोस्ट किया था, लेकिन जब इसका देश विदेश में ज़बरदस्त विरोध हुआ और यूएई, ओमान, मलेशिया आदि मुस्लिम बहुल देशों (जिनसे भारत के व्यापार समझौते हैं) से राजनयिक संबंध खराब होने की नौबत आ गई तो इस वीडियो को हैंडल से हटा लिया गया। वीडियो अब भी सोशल मीडिया पर वायरल है। 
एक रिकार्डेड बयान में सरमा ने कहा है कि वह भारतीय मुस्लिमों का कभी विरोध नहीं करते हैं बल्कि बांग्लादेश से आये मिया मुस्लिमों के विरोध में हैं। असम में बंगाली बोलने वाले मुस्लिमों को मिया मुस्लिम कहते हैं। असम में विधानसभा चुनाव अप्रैल में होंगे और तभी पश्चिम बंगाल विधानसभा के भी चुनाव होंगे। इससे यह अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश चुनाव के संदर्भ में है लेकिन इससे सांप्रदायिक सौहार्द को गंभीर दीर्घकालीन नुकसान पहुंच सकता है और राजनयिक संबंध भी प्रभावित हो सकते हैं। साथ ही मानवाधिकारों को लेकर भी देश की बदनामी होगी।  
याचिकाकर्ताओं के वकील ने भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के नेतृत्व वाली खंडपीठ से कहा है कि इस विषय पर त्वरित सुनवायी की जाये क्योंकि एक समुदाय विशेष के खिलाफ हिंसा की धमकी सीधे मुख्यमंत्री की तरफ से आ रही है, जोकि संवैधानिक पद है और संवैधानिक जनादेश का पालन करने की ज़िम्मेदारी भी उनकी है। इसके जवाब में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि याचिकाओं पर जितनी जल्दी संभव हो सकेगा, सुनवायी की जायेगी। माकपा ने सुभाषनी अली व भाकपा ने एनी राजा के माध्यम से अपनी याचिका में कहा कि सरमा के अनेक भाषणों को अगर संचयी तौर पर देखा जाये तो वे ‘स्पष्ट रूप से नफरती भाषण हैं, अल्पसंख्यकों को नीचा दिखाते व अपमानित करते हैं, झूठे व कलंकित करने वाले स्टीरियोटाइप को प्रचारित करते हैं, सामाजिक व आर्थिक बायकाट को भड़काते हैं और बहिष्करण व हिंसा की स्थितियों को प्रोत्साहित करते हैं’। 
याचिकाकर्ताओं ने अदालत का ध्यान उक्त आपत्तिजनक वीडियो की ओर भी दिलाया जिसमें सरमा को दो मुस्लिम पुरुषों की ओर गोलियां चलाते हुए दिखाया गया है और वीडियो के नीचे ‘पॉइंट ब्लेंक शॉट’ (सीधा निशाना) और ‘नो मर्सी’ (कोई दया नहीं) लिखा है। याचिकाओं में कहा गया है, ‘जब इस वीडियो को इसके तथ्यात्मक व राजनीतिक संदर्भ में देखा जाता है तो इसके संचयी प्रतीक व लफ्फाज़ी सीधे अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ शत्रुता, बहिष्करण और डराने के वातावरण में वृद्धि करते हैं।’ कुछ सप्ताह के भीतर चुनाव आयोग असम (व पश्चिम बंगाल) विधानसभा चुनाव के लिए तिथियां घोषित करेगा। इसलिए यह आश्चर्य नहीं है कि राज्य में राजनीति बद से बदतर रुख धारण कर रही है लेकिन इस विस्तृत पैमाने पर भी यह वीडियो चिंताजनक व आपत्तिजनक है। हालांकि मूल वीडियो को अब डिलीट कर दिया गया है, लेकिन यह सोशल मीडिया पर अब भी वायरल है। इस सिलसिले में अनेक सवाल उठते हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार से हैं- असम की भाजपा इकाई ने इस प्रकार का वीडियो (भले ही एआई से बनाया हो) जिसमें संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को एक समुदाय के लोगों पर गोलियां चलाते हुए दिखाया गया है, यह सोचकर क्यों बनाया कि ऐसी इमेज बनाना ठीक रहेगा? साथ ही इस पोस्ट को किसने मंज़ूरी दी और किस स्तर पर?
नागरिकों के एक समूह ने गुवाहाटी हाईकोर्ट से आग्रह किया है कि सरमा जो ‘निरंतर नफरती भाषण देते हैं व संविधान विरोधी कार्य करते हैं’ का वह स्वत: संज्ञान ले। असम जातीय परिषद (एजेपी) ने तो सरमा पर आरोप लगाया है कि वह ‘खुलकर सांप्रदायिक हिंसा भड़का रहे हैं’। इस बीच, जैसा कि ऊपर बताया गया, सुप्रीम कोर्ट इस मामले में जल्द सुनवायी करने के लिए सहमत हो गया है। कुछ लोगों ने सुझाव दिया है कि आजकल बहुत से चुनाव काफी हद तक अदालतों में लड़े जा रहे हैं। ज़ाहिर है, यह कोई अच्छा या सकारात्मक ट्रेंड नहीं है। इसके बावजूद यह आवश्यक है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप करे। वर्तमान मामले में तो वास्तव में चुनाव आयोग व भाजपा के केंद्रीय मुख्यालय को असम की भाजपा यूनिट से स्पष्ट कह देना चाहिए कि वह राजनीति को लाल रेखा के आगे ले गई है। 
एक मुख्यमंत्री बिना डर या पक्षपात, बिना प्रेम या नफरत के सभी वर्गों के हितों के लिए व उनके अधिकारों को सुरक्षित रखने की शपथ लेता है। असम की जो फाइनल मतदाता सूची 10 फरवरी 2026 को प्रकाशित हुई है, उससे पहले ही सरमा ने (गलत) घोषणा कर दी थी कि 4-5 लाख ‘मिया वोटों’ को सूची से निकाल दिया जायेगा। एसआर के बाद चुनाव आयोग ने जो असम की फाइनल मतदाता सूची प्रकाशित की है, उसमें 2.43 लाख मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची से हटाये गये हैं। इस फाइनल सूची के बाद अब असम में कुल 2.49 करोड़ मतदाता हैं, जो पिछली सूची से 0.97 प्रतिशत कम हैं। जिन लोगों के नाम हटाये गये हैं, वे 15 दिन के भीतर डीएम के समक्ष अपील कर सकते हैं और दूसरी अपील 30 दिन के भीतर मुख्य चुनाव आयोग से की जा सकती है।

-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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