बांग्लादेश के चुनावों पर उठते सवाल
अनेक पक्षों से कठिनाइयों में फंसे बांग्लादेश में 12 फरवरी को चुनाव होने जा रहे हैं। अगस्त 2024 अभिप्राय डेढ़ वर्ष पहले शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग पार्टी की निर्वाचित सरकार को, आरक्षण के मुद्दे पर हुए ज़बरदस्त आन्दोलन और हिंसा के उपरांत सत्ता छोड़नी पड़ी थी और श़ेख हसीना को भारत में शरण लेने के लिए विवश होना पड़ा था। उसके बाद अशांत और गड़बड़-ग्रस्त इस देश में नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस को अंतरिम सरकार का मुख्य सलाहकार बनाने के लिए बांग्लादेश के भिन्न-भिन्न पक्षों में सहमति हो गई थी, परन्तु मोहम्मद यूनुस ने जिस तरह प्रशासन चलाया, उससे देश भर में शांति होने की बजाय और भी निरंकुशता पैदा हो गई थी, जिसके दृष्टिगत बांग्लादेश में अल्प-संख्यक समुदायों, जिनमें दो बड़े हिन्दू और ईसाई समुदाय शामिल थे, को बेलगाम संगठनों द्वारा अपने आक्रोश का निशाना बनाया जाने लगा था।
इस समय वहां एक करोड़ से अधिक हिन्दू रहते हैं, जिन्हें विगत डेढ़ वर्ष से बेहद मुश्किलों में से गुज़रना पड़ रहा है। यूनूस सरकार ने इस स्थिति को सुधारने की बजाये बल्कि तरह-तरह के स्पष्टीकरण देकर ही समय विहाने का काम किया। यहीं बस नहीं, बांग्लादेश की इस अंतरिम सरकार ने देश की सबसे बड़ी पार्टी अवामी लीग पर एक कार्यकारी आदेश जारी करके प्रतिबन्ध लगा दिया और यह भी आदेश जारी कर दिया कि यह पार्टी आगामी किसी भी तरह के चुनावों में भाग नहीं ले सकेगी। इससे पहले श़ेख हसीना ने अपना शासन के दौरान देश की गिरती आर्थिकता में सुधार करके इसे विकास के मार्ग पर डाला था। अपने पड़ोसी देश भारत के साथ भी उन्होंने अच्छे संबंध बनाए रखने की नीति धारण की थी। भारत ने भी उनकी प्रत्येक पक्ष से सहायता करने की अपनी वचनबद्धता दोहराये रखी थी। शेख हसीना के पिता शेख मुजीब-उर-रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश को पाकिस्तान के शिकंजे से आज़ाद करवाया गया था। आज़ादी की लड़ाई में पाकिस्तान ने 30 लाख से अधिक वहां के नागरिकों की हत्या कर दी थी और असहनीय अत्याचार किए थे। उस समय लाखों ही बांग्लादेशी शरणार्थी बनकर भारत में दाखिल हो गए थे। भारत ने ऐसे बिगड़े हालात में शेख मुजीब-उर-रहमान की खुल कर सहायता की थी और 1971 में बांग्लादेश एक स्वतंत्र देश बन गया था।
बाद में शेख मुजीब-उर-रहमान और उनके परिवार की कुछ सैनिकों द्वारा की गई हत्या के समय शेख हसीना और उनकी एक बहन बच गई थीं, क्योंकि इस ख़ौफनाक घटनाक्रम के समय वह ढाका में मौजूद नहीं थीं। शेख हसीना ने पुन: बांग्लादेश के लिए लगातार अपनी प्रतिबद्धता दिखाते हुए अवामी लीग पार्टी के शासन को पुन: स्थापित कर दिया था। उनके मुकाबले में बांग्लादेश नैशनलिस्ट पार्टी का भी बड़ी सीमा तक प्रभाव बना रहा था, जिसने जमात-ए-इस्लामी जैसी कट्टर सांप्रदायिक पार्टियों के साथ मिल कर लम्बी अवधि तक शासन भी किया था। उस समय वहां देश में इस्लामिक तत्वों के पुन: उभार के कारण भारत और बांग्लादेश के संबंध अच्छे नहीं रहे थे, परन्तु उस समय भारत का प्रत्येक पक्ष से सहयोग लेना बांग्लादेश की विवशता थी। चाहे उस समय इसने चीन के समक्ष भी सहायता के लिए अपना हाथ फैलाया था और आतंकवादी इस्लामिक संगठनों ने इसी समय पाकिस्तानी सेना द्वारा किए अनन्त अत्याचारों को भुलाते हुए उसके साथ फिर दोस्ती करने का यत्न किया था। यह सिलसिला लम्बी अवधि तक जारी रहा, परन्तु शेख हसीना की सरकार बनने पर उन्होंने हमेशा भारत के साथ दोस्ती और सहयोग को प्राथमिकता दी, जो उनकी सरकार के समय तक जारी रही, परन्तु उनका तख्ता पल्टने के बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार बनी। यह सरकार पाकिस्तान और चीन की तरफ झुक गई और इस सरकार द्वारा भारत से दूरी ही नहीं बनाई गई अपितु उसकी गतिविधियां भी दुश्मनी की सीमाएं पार करने लगी हैं। इस स्थिति का पाकिस्तान और चीन ने पूरा लाभ उठाया है। विगत अवधि में भारी जन-दबाव होने के कारण यूनुस सरकार को देश में चुनावों की घोषणा करनी पड़ी थी। इन चुनावों के दृष्टिगत बांग्लादेश नैशनलिस्ट पार्टी का लंदन में बैठा नेता तारिक रहमान जो पूर्व प्रधानमंत्री ़खालिदा ज़िया का पुत्र भी है, देश लौट आया है, जिससे चुनाव प्रक्रिया और भी तेज़ हो गई है। अब हो रहे इन चुनावों में तारिक रहमान की बांग्लादेश नैशनलिस्ट पार्टी को भारी समर्थन मिलता दिखाई दे रहा है। उसने जमात-ए-इस्लामी जैसी पार्टी के साथ कोई गठबंधन करने से इन्कार कर दिया है। इसी समय बांग्लादेश में हिन्दुओं को लगातार हिंसा का निशाना बनाया जा रहा है।
चाहे मोहम्मद यूनुस ने यह कहा है कि नई सरकार बनने से देश में स्थिरता आएगी, परन्तु इस बात संबंधी इसलिए आशंका बनी रहेगी, क्योंकि इन चुनावों में वहां की प्रभावशाली राजनीतिक पार्टी अवामी लीग पर चुनाव लड़ने संबंधी प्रतिबन्ध लगाने के आदेश जारी किए हुए हैं। यह बात सुनिश्चित है कि इस बड़ी और प्रभावशाली पार्टी के चुनावों में भाग न लेने के कारण बांग्लादेश में कोई भी स्थिर और मज़बूत सरकार बनना कठिन होगा। इससे यह अनुमान लगाना भी मुश्किल नहीं कि समस्याओं में फंसे और वंचित देश को शांति और विकास के पथ पर चलने के लिए अभी लम्बा समय लग सकता है। पड़ोसी देश में ऐसी स्थिति भारत के लिए कदाचित अच्छा संदेश नहीं मानी जाएगी।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

