भाजपा एक समिति बना कर पंथ तथा पंजाब के मामले हल करे

झुक कर सलाम करने में क्या हज़र् है मगर,
सर इतना मत झुकाओ कि दस्तार गिर पड़े।
इकबाल अज़ीम का यह शे’अर इसलिए याद आ गया कि पिछले दिनों कई प्रमुख सिख नेता मिले जो इस बात के समर्थक हैं कि इस समय सिख तथा पंजाबी भाजपा सरकार से अपनी बहुत-सी मांगें मनवा सकते हैं। ज़रूरत बस भाजपा के साथ चलने की है। वे कई उदाहरण भी देते हैं, जिनमें से सबसे प्रमुख उदारहण यह होता है कि आपातकाल के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सिखों की सभी मांगें मानने के लिए तैयार थी, परन्तु अकाली नेताओं ने वक्त तथा हालात का लाभ नहीं लिया। कुछ तो यह भी कहते हैं कि ऑपरेशन नीला तारा भी सिखों या अकालियों द्वारा आपातकाल के समय किए विरोध में से ही उपजा था। ़खैर, यह सब चर्चा है और इसमें क्या सच है और और क्या झूठ, इस संबंधी पक्के तौर पर कुछ भी कहना सम्भव नहीं, क्योंकि ऐसा कुछ दस्तावेज़ों में उपलब्ध नहीं होता, परन्तु यह सच है कि आम तौर पर केन्द्र की सरकारों का रवैया पंजाब के प्रति न्याय वाला नहीं रहा। चाहे कांग्रेस के समय सिखों के साथ 1984 में बहुत बुरा व्यवहार किया गया, इसे सिख नस्लघात की संज्ञा तक दी जाती है, परन्तु एक बात स्पष्ट है कि कांग्रेस के समय सरकारे-दरबारे सिखों की स्थिति आम तौर पर बहुत शान वाली रही, वह आज कहीं भी दिखाई नहीं देती। भाजपा सिखों के प्रति मौखिक हमदर्दी तो बहुत करती है, परन्तु क्रियात्मक रूप में सिख मामलों विशेषकर पंजाब के मामले हल करने में उसकी कोई दिलचस्पी दिखाई नहीं देती। वैसे तो इस बारे में खोज के लिए महीनों की मेहनत से एक पेपर लिखने की ज़रूरत है, परन्तु वह इन कालमों में तो नहीं समा सकेगा। यह भूमिका बनाने की ज़रूरत इसलिए पड़ी क्योंकि जो भाजपा सरकार ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में 2019 में श्री गुरु नानक देव जी के 550वें प्रकाश पर्व के अवसर पर सद्भावना के रूप में 8 सिख बंदियों जिनमें प्रो. दविन्दर पाल सिंह भुल्लर भी शामिल थे, को विशेष माफी देकर रिहा करने की सिफारिश की थी और भाई बलवंत सिंह राजोआना की मौत की सज़ा उम्र कैद में बदलने की बात भी की थी परन्तु जो भाजपा लगातार इस सिफारिश के अधूरे रहने का आरोप दूसरी पार्टियों की राज्य सरकारों द्वारा सहमत न होने पर लगाती रही है, आज उसी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासन में उनकी अपनी ही पार्टी की दिल्ली सरकार के ‘सज़ा समीक्षा बोर्ड’ ने 23 दिसम्बर की मीटिंग में उसी प्रो. दविन्दर पाल सिंह भुल्लर को रिहा करने से इन्कार कर दिया है। पहले यही काम दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार भी करती रही है। ‘आप’ का रवैया स्पष्ट रूप में बंदी सिंहों की रिहाई के विरुद्ध है, परन्तु अब भाजपा की दिल्ली सरकार का रवैया भी बड़े प्रश्न खड़े कर रहा है। विशेषकर उस समय जब इस सरकार में दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान रहे मनजिन्दर सिंह सिरसा एक प्रभावी मंत्री भी हैं। हैरानी की बात है कि प्रो. दविन्दर पाल सिंह भुल्लर की मौत की सज़ा 2014 में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने उम्र कैद में तबदील कर दी थी। भारत में आम तौर पर उम्र कैद कितने वर्ष काटनी पड़ती है, सबको पता है, परन्तु प्रो. भुल्लर तो 33 वर्ष से जेल में बंद हैं और मानसिक रूप में ठीक भी नहीं हैं। ऐसे में सर्व समर्थ भारत सरकार को उससे क्या खतरा हो सकता है।    
वैसे अफसोस की बात यह भी है कि दिल्ली सरकार के इस फैसले के विरोध में कुछेक सिख नेता ही बोले हैं। ‘आप’ के सांसद विक्रमजीत सिंह साहनी ने पार्टी के स्टैंड से हट कर भी इसका विरोध किया है। पूर्व सांसद तरलोचन सिंह भी इसके विरोध में सामने आए हैं। चाहे अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल,  शिरोमणि कमेटी के अध्यक्ष हरजिन्दर सिंह धामी तथा दिल्ली के कुछ सिख नेता भी इसके खिलाफ बोल रहे हैं, परन्तु यह विरोध सिर्फ ‘गोंगलुओं तों मिट्टी झाड़ने’ जैसा विरोध ही प्रतीत हो रहा है। शिरोमणि कमेटी जिसने बंदी सिंहों की रिहाई के लिए देश-विदेश में लाखों हस्ताक्षर करवाए, प्रधानमंत्री को मिलने के लिए कमेटी बनाई थी, परन्तु धीरे-धीरे चुप्पी छा गई है। हम समझते हैं कि यदि भाजपा सचमुच ही सिखों को अपना समझती है तो उसे कभी हमदर्दी, कभी नफरत की राजनीति की बजाय सिखों तथा पंजाब के मामलों के लिए एक विशेष समिति बना कर पंजाबियों के सभी गिले-शिकवे गुण-दोष के आधार पर एक बार में ही हल कर देने चाहिएं। सिखों तथा पंजाबियों से बड़ा देशभक्त और कोई नहीं, यह बात स्वतंत्रता संग्राम तथा बाद की भारत-पाक तथा भारत-चीन युद्धों में सिद्ध हो चुकी है, परन्तु बीच-बीच में विरोध के स्वरों का उठना स्वाभाविक है और बार-बार न्याय न मिलना भी इन स्वरों को हवा देता है। सिखों तथा पंजाबियों को याद रखना चाहिए कि सरकार से दोस्ती और दुश्मनी दोनों ही आग व दरिया में से गुज़र कर जाने जैसी होती हैं।
ये इश्क नहीं आसां इनता ही समझ लीजै,
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।
—जिगर मुरादाबादी
बाबा गुरिन्दर सिंह ढिल्लों की सक्रियता
पंजाब की राजनीति में डेरावाद विगत कई दशकों से प्रभावी है। हालांकि सच यही है कि डेरों को राजनीतिज्ञ जितना अधिक महत्व देते हैं, वास्तव में वे उतने प्रभावी होते नहीं। लोग मतदान करते समय अपने निजी हित तथा संबंधों को सबसे पहले देखते हैं, परन्तु राजनीतिक नेताओं ने जान-बूझ कर वोट बैंक बनाने के लिए डोरों को महत्व दिया हुआ है। पंजाब में कुल मिला कर लगभग 9000 डेरे हैं, जिनमें लगभग एक दर्जन व्यापक प्रभाव वाले माने जाते हैं। डेरा ब्यास ने अभी तक प्रत्यक्ष रूप में राजनीति में कभी दखल नहीं दिया, परन्तु ऐसे संकेत अवश्य मिलते रहे हैं कि किसी अदृश्य संकेत के कारण आम तौर पर डेरे के श्रद्धालु किसी एक पार्टी को बहुतायत में वोट देते हैं। चाहे बाबा गुरिन्दर सिंह ने राजनीति में कभी प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करने वाला कोई बयान नहीं दिया, परन्तु उनकी अकाली नेता बिक्रम सिंह मजीठिया से रिश्तेदारी, मुलाकातें तथा मजीठिया को बेगुनाह बताने पर मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान द्वारा उन पर तंज़ कसना पंजाब की राजनीति में हलचल मचा रहा है। ऐसी चर्चा बड़े ज़ोर से चल रही है कि बाबा गुरिन्दर सिंह का प्रभाव अकाली-भाजपा समझौते का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। परन्तु हमारी जानकारी के अनुसार अभी तक ऐसी कोई सम्भावना नहीं है। जहां पंजाब सरकार यह दावे कर रही है कि ‘युद्ध नशे के विरुद्ध’ के माध्यम से वह पंजाब में नशा खत्म करने में सफल हो रही है, वहीं राज्यपाल की पद-यात्रा सरकार के विफल होने के संकेत दे रही है। कुछ ऐसी चर्चाएं भी हैं कि सरकार डेरे से संबंधित कुछ ज़मीनों की गुप्त जांच भी करवा रही है, परन्तु इस बात की कहीं से भी कोई पुष्टि नहीं करता। हमारी समझ के अनुसार डेरा प्रमुख बाबा गुरिन्दर सिंह पर्दे के पीछे जो मज़र्ी करें, परन्तु प्रत्यक्ष रूप से राजनीति में नहीं आएंगे। हां, यह ज़रूर प्रतीत होता है कि उनकी यह सक्रियता कुछ खास तरह के संकेत अवश्य दे रही है, जिसे समझने में अभी समय लगेगा। राहिब मैत्रेय के शब्दों में :
छपा हुआ है बहुत कम, छुपा ज़्यादा है,
हमें ़खबर है ़खबर क्या तेरा इरादा है
6000 अप्रैल तक, 6000 दिसम्बर तक
स्वाभाविक रूप से पंजाब विधानसभा के चुनाव जीतने के लिए आम आदमी पार्टी हर सम्भव प्रयास करने के लिए तैयार है। जब यह सिद्ध हो चुका है कि महिलाओं के खाते में पैसे डाल कर जीतना आसान है तो ‘आप’ क्यों पीछे रहे। ताज़ा उदाहरण बिहार तथा महाराष्ट्र के हैं। भाजपा, कांग्रेस तथा अन्य पार्टियां इस मामले में कोई भी पीछे नहीं। खैर, चर्चा है कि आम आदमी पार्टी इस बार बजट में महिलाओं को प्रत्येक माह 1 हज़ार रुपये देने का वायदा पूरा करने के लिए 8000 करोड़ रुपये रख रही है और अप्रैल में विगत 6 माह की किश्तों के रूप में महिलाओं के खाते में 6000-6000 रुपये ट्रांस्फर किए जा रहे हैं, जबकि 2027 के चुनाव से पहले दिसम्बर तक 6-6 हज़ार रुपये एक बार और ट्रांस्फर किये जाने की भी चर्चा है, क्योंकि ‘आप’ को डर है कि दिसम्बर के बाद शायद चुनाव आयोग इस पर कोई रोक लगा सकता है। पंजाब पर ऋण पहले ही बहुत है। यदि कुछ हज़ार और बढ़ गया तो भी क्या है? चन्द्र श़ेखर वर्मा के शब्दों में : 
हैं कुछ ईमान तेरे खेल में या,
तेरा मकसद यहां बस जीतना है।

-1044, गुरु नानक स्ट्रीट, समराला रोड, खन्ना-141401
-मो. 92168-60000

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