एक विवाद और

वर्ष 2014 में जब से केन्द्र में मोदी सरकार बनी है, उस समय से ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भारतीय जनता पार्टी द्वारा देश में अपना सैद्धांतिक प्रभाव बनाना शुरू कर दिया है। उसका यह एजेंडा लगातार जारी है। इसी क्रम में ही सदियों पुराने धार्मिक स्थलों और इमारतों को निशाना बनाया गया है। केन्द्र में इस सरकार के अस्तित्व में आने से पहले अयोध्या में बाबरी मस्जिद को लेकर भाजपा के उस समय के वरिष्ठ नेताओं, जिनमें आजकल ज्यादातर हाशिये पर हैं, ने बाबरी मस्जिद गिराने में अपनी अहम भूमिका निभाई थी, जिससे भारत और इसके पड़ोसी देशों में साम्प्रदायिक दंगे हुए थे और भारत में भी बड़ी सीमा तक अलग-अलग समुदायों में भारी तनाव पैदा हो गया था। सैकड़ों लोगों के मारे जाने और करोड़ों अरबों की सरकारी और ़गैर-सरकारी सम्पत्तियों के नुकसान के बाद भी यह सिलसिला किसी न किसी तरह जारी रहा है।
गुजरात में भी गोधरा कांड के बाद श्री नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्री होते हुए जो भयानक साम्प्रदायिक दंगे हुए थे, जिनमें हज़ारों लोग मारे गए थे और देश में बड़े यत्नों से पैदा की गई सद्भावना को भारी आघात पहुंचा था। किसी न किसी रूप में यह तनाव अभी भी जारी है, जिसने अक्सर देश के कई भागों में अलग-अलग समुदायों के बीच ऩफरत को जन्म दिया है, जो आज भी देश की सद्भावना, एकजुटता और अखंडता के लिए चुनौती बनी हुई है। केन्द्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार बनने के बाद भाजपा अयोध्या में बाबरी मस्जिद के स्थान पर मंदिर बनाने में तो सफल हो गई थी, परन्तु उसके बाद कट्टर हिन्दू संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और केन्द्र सरकार में शक्तिशाली हुई भाजपा ने अपना व्यवहार नहीं बदला। चाहे वर्ष 1991 में देश की संसद में यह कानून बनाया गया था कि देश की आज़ादी और विभाजन, अभिप्राय: 1947 में धार्मिक स्थानों की जो भी स्थिति थी, उसमें बदलाव नहीं किया जाएगा परन्तु देश में बने इस कानून के बावजूद साम्प्रदायिकता और धर्म के ठेकेदारों ने इस कानून की धज्जियां उड़ाने में कोई कमी नहीं छोड़ी। इसीलिए आज अनेक धार्मिक निर्माणों और स्थानों पर विवाद पैदा किए गए हैं, जिनके कारण लगातार ऩफरत के माहौल का दायरा बड़े से बड़ा होता जा रहा है।
देश की कई अदालतों ने भी संसद द्वारा बनाए इस कानून को दर-किनार करते हुए इन विवादों को हवा ही दी है और इस कानून को सख्ती से लागू करने के स्थान पर अक्सर हिचकिचाहट ही प्रकट की है। आज कांग्रेस पार्टी सहित अन्य बड़ी पार्टियां और संगठन आरोप लगा रहे हैं कि शैक्षणिक संस्थानों से लेकर सामाजिक संगठनों और प्रत्येक तरह के छोटे और बड़े सरकारी संस्थानों में भाजपा द्वारा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपना एजेंडा लागू करने पर बज़िद दिखाई देता है और अपने उद्देश्यों में वह सफल भी हो रहा है। यहीं बस नहीं, धार्मिक, सामाजिक और सभ्याचारक मंचों पर देश भर में ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, जो आपसी ऩफरत बढ़ाने वाला है और देश की एकता और अखंडता को ़खतरे में डालने वाला होता है। अब बात यहां तक पहुंच गई है कि समाज में अनेक वर्गों ने क्या खाना है और क्या पहनना है, किस तरह अपने छोटे-बड़े खुशी और ़गम के त्यौहार मनाने हैं, उनमें भी घुसपैठ करने का यत्न किया जा रहा है और ऩफरती माहौल को और गर्माया जा रहा है।
हम समझते हैं कि देश में ऐसा माहौल एक योजनाबद्ध ढंग से पूरी तरह सोच-समझ कर बनाया जा रहा है। विगत दिवस राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ संबंधी भी केन्द्र सरकार द्वारा एक सुनियोजित योजना के तहत बड़ा विवाद पैदा करने का यत्न किया गया है। आज़ादी के संघर्ष के समय इस गीत को 150 वर्ष पहले बंकिमचंद्र चटर्जी ने लिखा था और इसे अपने नावल ‘आनंद मठ’ में भी शामिल किया था। नि:संदेह इस गीत ने देश में आज़ादी की चेतना जगाने में बड़ा योगदान डाला था और आज़ादी के संघर्ष के दौरान इसे अक्सर गाया जाता था। देश के विभाजन के बाद भारत के आज़ाद होने के बाद इस गीत को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया था परन्तु इसके कुल छ: छंद में उस समय के संविधान निर्माताओं ने दो छंद ही गाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर रखे थे, इसलिए कि उस समय के माहौल को भांपते हुए संविधान की भावना को समझते ऐसा किया गया था ताकि अलग-अलग समुदायों द्वारा इस गीत पर किसी भी तरह का किन्तु-परन्तु न हो। अब 150 वर्ष पूरे होने पर मोदी सरकार ने इस गीत संबंधी जो विवाद खड़ा किया है, उसने देश के भीतर माहौल को और भी गर्मा दिया है। सरकार भी यही चाहती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में बयान दिया है कि इस गीत को पूरा गाया जाना चाहिए और इस संबंध में उठे किसी भी किन्तु-परन्तु की चिन्ता नहीं की जानी चाहिए। हम समझते हैं कि ऐसा कुछ एक सुनियोजित योजना के तहत साम्प्रदायिक संगठनों के दबाव में किया गया है। इससे यदि एक बार फिर बड़े विवाद उठ खड़े हुए तो आपसी ऩफरत का माहौल और भी बढ़ सकता है। ऐसा कुछ भारत के लिखित संविधान की भावना के विपरीत है।
अब केन्द्रीय गृह मंत्रालय द्वारा ये दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं कि इस राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को समूचे रूप में गाया जाना ज़रूरी है और सरकारी और अन्य ़गैर-सरकारी समारोहों में यह गीत राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ से पहले गाया जाना चाहिए और इसे शैक्षणिक संस्थानों में भी गाया जाना ज़रूरी होगा। हम समझते हैं कि ऐसा करके कट्टर साम्प्रदायिक संगठनों ने केन्द्र सरकार द्वारा एक बार फिर अपने उद्देश्य की पूर्ति की ओर बड़ा कदम बढ़ाया है, जिससे जहां संविधान की भावना को दृष्टिविगत किया गया है, वहीं एक बार फिर ऐसा बड़ा विवाद खड़ा करने का यत्न किया गया है, परन्तु इससे देश में पैदा होने वाले असन्तोष की लहर से ब़ेखबर नहीं हुआ जा सकता। आज देश भक्ति के नारे बुलंद करने वालों को यह भी सोचना चाहिए कि ऐसा माहौल तैयार करके वे देश की कितनी बड़ी सेवा कर रहे हैं और अपने गौरवमय लिखित संविधान को उनकी ओर से किस हद तक दृष्टिविगत किया जा रहा है।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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