अब एआई कंटेंट की होगी बेहतर निगरानी
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने जहां दुनिया को तेज और स्मार्ट बनाया है, वहीं इसके दुरुपयोग ने भी गंभीर चिंता पैदा कर रखी है। डीपफेक वीडियो, फर्जी तस्वीरें और एआई जनित भ्रामक सामग्री न केवल लोगों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा रही हैं, बल्कि साइबर ठगी और सामाजिक भ्रम का कारण भी बन रही हैं। इन खतरों को मध्य में रखकर केंद्र सरकार की ओर से सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 में किए गए हालिया संशोधन को डिजिटल दुनिया में बढ़ती चुनौतियों के बीच एक महत्वपूर्ण कदम कहा जा सकता है। आगामी 20 फरवरी से लागू होने जा रहे इन नियमों के तहत अब एआई से तैयार किए गए फोटो व वीडियो पर लेबल लगाना अनिवार्य होगा। इसके साथ ही फेक कंटेंट को हटाने की समय सीमा 36 घंटे से घटाकर तीन घंटे कर दी गई है। नए प्रावधानों के तहत एआई कंटेंट में स्थायी मेटाडेटा और डिजिटल पहचान चिन्ह जोड़ने की अनिवार्यता भी तय की गई है, ताकि ऐसे कंटेंट की पहचान आसानी से की जा सके। यह बदलाव डिजिटल पारदर्शिता और नागरिक सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारतीय कंपनियों के लिए साइबर सुरक्षा अब सबसे बड़ी चुनौती है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल, जैसे कि चैटजीपीटी की मदद से नकली आधार और पैन कार्ड बनाए जा सकते हैं। इस रिपोर्ट ने एआई के संभावित दुरुपयोग की क्षमता के बारे में नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। एक नए सर्वे में 51 प्रतिशत बिजनेस लीडर्स ने इसे प्राथमिक जोखिम माना। ‘फिक्की-ईवाय रिस्क सर्वे 2026’ की रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ है। इसमें डिजिटल युग के बढ़ते खतरों पर चिंता जताई गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि तकनीकी जोखिम अब सीधे कंपनी के कामकाज से जुड़ गए हैं।
सर्वे के अनुसार, 61 प्रतिशत लोग साइबर हमलों से डरे हुए हैं। डेटा चोरी और धोखाधड़ी को 57 प्रतिशत ने बड़ा जोखिम माना। लगभग 47 प्रतिशत कंपनियां इन आधुनिक खतरों से निपटने में नाकाम हैं। साइबर हमलों से कंपनियों की प्रतिष्ठा व वित्त पर असर पड़ता है। डिजिटल बदलाव कंपनियों की प्रतिस्पर्धी स्थिति को प्रभावित कर रहे हैं। यह सर्वे 137 सीईओ और सीनियर डिसीजन-मेकर्स पर आधारित है। इसमें 21 प्रतिशत प्रतिभागी टेक्नोलॉजी सेक्टर से थे। प्रोफेशनल सर्विसेज दूसरे नंबर पर। साइबर अटैक अब सिर्फ आईटी मुद्दा नहीं। यह ऑपरेशनल कंटिन्यूटी से जुड़ा है। 61 प्रतिशत लीडर्स मानते हैं कि साइबर हमले वित्तीय और रेपुटेशनल खतरा हैं। तेज टेक्नोलॉजिकल बदलावों को 61 प्रतिशत कंपनियां प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करने वाला मान रहे हैं।
सर्वे के अनुसार, आज के दौर में एआई एक ‘दोधारी तलवार’ बन गया है। करीब 60 प्रतिशत विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी पिछड़ापन घातक है। सही समय पर नई तकनीक न अपनाना नुकसानदेह हो सकता है। वहीं, 54 प्रतिशत लोग एआई के एथिकल और गवर्नेंस संबंधी जोखिमों से चिंतित हैं। इन जोखिमों का प्रबंधन अभी भी प्रभावी ढंग से नहीं हो रहा है। ग्लोबल साइबरपीस समिट 2026 में भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र के अनुसार 2024-2025 के दौरान दर्ज साइबर हमलों में एआई व ऑटोमेशन का व्यापक इस्तेमाल देखने को मिला है। अब साइबर अपराधी किसी छोटे गैंग की तरह नहीं, बल्कि कंपनियों की तरह संगठित ढांचे में काम कर रहे हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका, मध्य-पूर्व व भारत के कुछ हिस्सों से संचालित ये नेटवर्क अलग-अलग विभागों में बंटे हुए हैं। इन गिरोहों के पास भर्ती करने वाली टीम, वेतन और प्रमोशन देखने वाले लोग और यहां तक कि रिसर्च एंड डेवलपमेंट यूनिट भी होती है। ये टीमें टेक्नोलॉजी की कमियों और इंसानी व्यवहार की कमजोरियों को खोजकर उनका फायदा उठाती हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में साइबर अपराध से दुनिया को लगभग 10.8 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान होने का अनुमान था, जो इस साल करीब 12 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। कई अंतर्राष्ट्रीय थिंक टैंकों का दावा है कि अब लगभग 80 प्रतिशत साइबर हमलों में किसी न किसी रूप में एआई की भूमिका है। एआई का इस्तेमाल अब डीपफेक तकनीक में भी हो रहा है। डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों में अपराधी किसी प्रसिद्ध पुलिस अधिकारी का चेहरा और आवाज नकली तरीके से दिखाकर पीड़ित को डराते हैं जिससे वह खुद को असली अधिकारी से बात करते हुए समझता है।
वैसे भी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की संख्या और कंटेंट की मात्रा इतनी अधिक है कि केवल नियमों के सहारे नियंत्रण करना आसान नहीं होगा। इसके लिए तकनीकी निगरानी तंत्र को मजबूत करना, प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही तय करना और उल्लंघन की स्थिति में त्वरित दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करना आवश्यक है। क्योंकि यदि नियमों का पालन ढीला रहा, तो इनका उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
इसके साथ ही नागरिकों में डिजिटल साक्षरता बढ़ाना भी उतना ही ज़रूरी है। लोगों को यह समझना होगा कि हर वायरल वीडियो या तस्वीर सत्य नहीं होती। जागरूक उपयोगकर्ता ही फेक कंटेंट की श्रृंखला को तोड़ सकता है। सरकार, सोशल मीडिया कंपनियों और शैक्षणिक संस्थानों को मिलकर इस दिशा में काम करना होगा। भ्रमजाल फैलने से रोकने के लिए सरकार और समाज दोनों के साझा प्रयासों की दरकार है। साझे प्रयासों से ही एआई का सकारात्मक लाभ हम उठा सकते हैं। वरना हमारी सुविधा के लिए बनी तकनीक हमारे लिए बड़ा सिरदर्द बन सकती है।



