क्या चाहता है भाजपा का पक्का मतदाता ?

पहले केवल राजनीतिक विश्लेषकों की कयासबाज़ी तक ही सीमित थी, लेकिन अब खुल कर सामने आ गई है। भाजपा के कोर वोटर कह रहे हैं कि मोदी से अब कुछ भी संभल नहीं रहा है। मोदी जी बुरी तरह से फंस गये हैं। उन्हें इस्तीफा देकर अपनी गद्दी योगी को सौंप देनी चाहिए। मैं जनवरी के दूसरे पखवाड़े से लेकर फरवरी की आज की तारीख तक मैं खुद ऐसे बीसियों लोगों को यह बात कहते हुए सुन चुका हूं। इन लोगों में ट्रेन में यात्रा कर रहे वोटर हैं, टैक्सी चलाने वाले ड्राइवर हैं, दिल्ली और गाज़ियाबाद के अपार्टमेंटों में गार्ड बन कर खड़े हुए पकी उम्र के लोग हैं, लखनऊ और दिल्ली के बाज़ारों में शॉपिंग करते हुए मिल जाने वाले खुशहाल नागरिक हैं। इनमें से ज्यादातर लोग मुझे पहचान लेते हैं, उन्होंने टीवी और सोशल मीडिया में मेरा चेहरा देख रखा है। खास बात यह है जब मैंने पिछले महीने भर में बहुत से लोगों को इस लहज़े में बात करते हुए सुना तो उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और दिल्ली में सक्रिय अपने पत्रकार मित्रों से अनुरोध किया कि वे भी पता लगाएं कि क्या वास्तव में भाजपा के कोर वोटरों में इस तरह की सुगबुगाहट है। जब उन मित्रों ने भी अपनी रिपोर्ट दी कि वास्तव में ऐसा ही लग रहा है तो मैंने सोचा कि मैं अपने पाठकों के साथ यह बात साझा करने का समय आ गया है।
भाजपा के मुख्य जनाधार से मेरा मतलब है ब्राह्मण, बनिया, ठाकुर, भूमिहार, कायस्थ और पटेल यानी ऊंची जातियां यानि जनरल कैटेगरी के वोटर। ये वोटर दिल से मानते हैं कि उनके वोटों से ही मोदी सरकार बनी है और भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का इंजन उन्हीं के वोटों के ईंधन से चल रहा है। भाजपा को बाकी जो वोट मिलते हैं, वे आते-जाते रहते हैं लेकिन भाजपा हारे या जीते, जनरल कैटेगरी के तकरीबन 80 प्रतिशत वोटर पिछले 11 साल से कमल के निशान पर ही बटन दबा रहे हैं। भाजपा के वोटरों का यह प्रभावशाली समूह साफ और ऊंची आवाज़ में कहते हुए सुनाई देगा कि मोदी के इधर यूजीसी की इक्विटी नियमावली का संकट है, उधर जनरल नरवणे की पुस्तक में खुली उनकी कायरता की पोल है। आगे ट्रम्प के साथ की जा रही ट्रेड डील से निकलने वाली आफतें हैं और पीछे एप्स्टीन फाइलों में हरदीप पुरी के ज़रिये फंसी उनकी सरकार है। इधर-उधर की बातें बहुत हुई हैं, पर प्रधानमंत्री की आवाज़ इन पर नहीं सुनी गई है। 
इससे पांच बातें स्पष्ट होती हैं। पहली, मोदी की यह फंसी हुई हालत खुद उनकी और उनके रणनीतिकारों की गलतियों की देन है। यूजीसी की इक्विटी नियमावली इसलिए जारी की गई कि मोदी राहुल को उन्हीं की पिच पर पटकना चाहते थे। ओबीसी, दलित और आदिवासी की पिच पर। सामाजिक न्याय की पिच पर लेकिन दांव मारते-मारते खुद फिसल गए। अभी तक उठ नहीं पाये हैं। एप्स्टीन और हरदीप पुरी का संबंध हर किसी के दिमाग को मथ रहा है। लोग पूछ रहे हैं कि जो एप्स्टीन 2008 में ही यौन अपराधों को कबूल करके 13 महीने की जेल काट चुका था, और जो एक रजिस्टर्ड सेक्स ओफेंडर था, उससे हरदीप पुरी क्यों मिल रहे थे। एप्स्टीन ओबामा प्रशासन में किसी पद पर नहीं था। वह पुरी को मेक इन इंडिया या ग्रामीण भारत में इंटरनेट के विस्तार पर क्या राय दे सकता था, कमसिन लड़कियों को फंसा कर वेश्यावृत्ति का पेशा करवाने वाले से इंटरनैशनल पीस इंस्टीट्यूट का क्या संबंध हो सकता था। आखिर इस इंस्टीट्यूट का प्रतिनिधिमंडल एप्स्टीन से क्यों मिलने गया था, या कभी गया भी था या नहीं। हरदीप पुरी कहते हैं कि जैसे ही उन्हें उसकी असलियत पता चली, उन्होंने मेल मुलाकातें रोक दीं। जिस बात को हर कोई जानता था, उसे पुरी क्यों नहीं जानते थे। फिर ऐसे पुरी को मोदी ने अपना मंत्री क्यों बनाया। यह भी सोचने की बात है कि जो व्यापार संधि अभी औपचारिक रूप से होनी न केवल बाकी है, बल्कि उसमें काफी समय है, उसका जश्न पीयूष गोयल वगैरह ने पहले से क्यों मनाना शुरू कर दिया। यह झूठ क्यों बोला जा रहा है कि भारत का कृषि बाज़ार अमरीका के लिए इस संधि के ज़रिये नहीं खोला जा रहा है। 
दूसरी, इसमें राहुल गांधी द्वारा संसद के भीतर और बाहर लगातार किये जा रहे तरह-तरह के हमलों की भी प्रमुख भूमिका है। जनरल नरवणे की किताब के ज़रिये हमला करके राहुल ने मोदी की चीन नीति के धुर्रे उड़ा दिये। नरवणे की जो बात लोग भूल गये थे, वह सबको याद आ गयी है। हिंदी में अनुवाद हो कर लाखों-करोड़ों के पास पहुंच गई है। आम लोग बोल रहे हैं कि मोदी केवल पाकिस्तान के मुकाबले डींगें हांक सकते हैं, पर चीन के आगे वह फुस्स हो जाते हैं। नरवणे की किताब की भूमिका जनरल वी.पी. मलिक ने लिखी है जो कारगिल युद्ध के लिए मशहूर हैं। इस किताब की संस्तुति जनरल वी.के. सिंह ने की है जो मोदी की सरकार में दस साल मंत्री रह चुके हैं और इस समय इसी सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपाल हैं। क्या यह किताब लिखने के लिए मोदी नरवणे का कोर्ट मार्शल करवाएंगे, क्या उनके साथ जनरल मलिक और जनरल वी.के. सिंह का कोर्ट मार्शल भी होगा। इन सवालों का जवाब नहीं है। ज़ाहिर है कि अब सरकार की हिम्मत नहीं हो रही है कि इस मसले पर संसद में चर्चा करवा ले।
तीसरी, भाजपा के कोर वोटर मोदी से असंतुष्ट हैं, पर वे विपक्ष की किसी पार्टी या नेता की तरफ झुकने के बजाय भाजपा और हिंदुत्व की राजनीति के भीतर ही मोदी का विकल्प तलाश रहे हैं, लेकिन अगर उनकी इच्छा पूरा करने में संघ परिवार ने बहुत ज्यादा देर लगाई, तो वे भाजपा के बाहर भी अपना विकल्प तलाश सकते हैं। अगर ऐसी नौबत आई तो वह खतरे की घंटी नहीं बल्कि खतरे का घंटा होगा। 
चौथी, भाजपा के ये कोर वोटर जिस व्यक्ति से खास तौर से नाराज़ हैं, वह है अमित शाह। गृहमंत्री उनके गुस्से का निशाना हर बातचीत में बनते दिखाई दिये। कोर वोटर कह रहे हैं कि अमित शाह योगी को परेशान कर रहे हैं। उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाना चाहते हैं। वह खुद मोदी का उत्तराधिकारी बनना चाहते हैं। यानी, योगी बनाम अमित शाह का तल्ख समीकरण अब केवल राजनीतिक कयासबाज़ी के दायरे में ही नहीं रह गया है। 
चौथी, उन्हें एक तैयारशुदा, बना-बनाया विकल्प योगी के रूप में मिलता दिखाई दे रहा है। अभी कुछ दिन पहले योगी ने उत्तर प्रदेश का बजट पेश किया। उससे पहले उनके समर्थक बुद्धिजीवियों ने सोशल मीडिया पर और मीडिया के अन्य मंचों पर यह प्रचार किया कि योगी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था में काफी सुधार हुआ है। सवाल यह नहीं है कि यह दावा सही था या गलत, सवाल यह है कि इस दावे के पीछे का राजनीतिक डिज़ाइन कौन-सा था। राजनीतिक डिज़ाइन यह था कि योगी को केवल मुसलमान विरोधी लफ़्फाज़ी तक ही सीमित नहीं समझा जाना चाहिए। इसका मतलब जल्दबाज़ी में यह भी मत निकालिए कि योगी निकट भविष्य में मोदी की जगह बैठा दिये जाएंगे। उस घड़ी के आने में अभी समय है। दरअसल, भाजपा के कोर वोटरों ने योगी को अपनी पसंद बना लिया है। मोदी से वे निराश हो चुके हैं लेकिन हिंदुत्व का राजनीतिक नेतृत्व इस मामले को लेकर दुविधा में है। वोटर कुछ भी कहते रहें, कोई भी संदेश देते रहें, कैसे भी इशारे उनकी तरफ से आते रहें, संघ की पहली पसंद आज भी मोदी ही हैं। योगी भी संघ की पसंद हैं। दरअसल, संघ के समर्थन से ही वह इस मुकाम तक पहुंच पाये हैं। पर फिलहाल वह दूसरे नंबर पर हैं। आप पूछ सकते हैं कि क्या संघ परिवार भाजपा के कोर वोटरों का संदेश सुन नहीं पा रहा है। मेरा ख्याल है कि सुन पा रहा है, लेकिन संघ परिवार जल्दबाज़ी में इतना बड़ा फैसला करने की गलती नहीं करेगा। बड़ी मुश्किल से, लम्बे इंतज़ार के बाद केंद्र की सत्ता मिली है, वह ऐसी कोई हरकत नहीं करना चाहता जिससे सत्ता हाथ से निकल जाए। दूसरी बात यह है कि इस समय योगी के पास संघ परिवार के भीतर समर्थकों का थोड़ा टोटा हो गया है। इस समय मोदी के पास संघ परिवार में समर्थक ज्यादा हैं। जब तक सह-सरकार्यवाह के रूप में डा. कृष्णगोपाल संघ के भाजपा और संघ के बीच समन्वय के इंचार्ज थे, योगी के पास संघ में एक मज़बूत समर्थक था। समझा जाता है कि कृष्णगोपाल जी ने भी योगी को सिन्हा के ऊपर प्राथमिकता देकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठवाने में मुख्य भूमिका निभाई थी। इस समय कृष्णगोपाल केवल सह-सरकार्यवाह रह गये हैं। समन्यवय का काम अरुण कुमार के पास है। समझा यह भी जाता है कि अरुण कुमार, दत्तात्रेय होसबोले और मोहन भागवत का शीर्ष आलाकमान अभी मोदी पर ही अपना दांव लगाने के पक्ष में है। वैसे भी मोदी के शासनकाल में संघ के चेहरे पर बड़ी-बड़ी सम्पत्तियों की जो चमक आयी है, उसने भी पलड़ा मोदी की तरफ झुका दिया है।  

लेखक अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में प्ऱोफेसर और भारतीय भाषाओं के अभिलेखागारीय अनुसंधान कार्यक्रम के निदेशक हैं।

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