नए मार्ग पर भारत-बांग्लादेश

बांग्लादेश के हुए ताज़ा चुनावों में 20 वर्ष की अवधि के बाद तारिक रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश नैशनलिस्ट पार्टी को भारी समर्थन मिला है।  2008 से 2024 तक श़ेख हसीना के नेतृत्व में अवामी लीग ने देश का प्रशासन चलाया था। चाहे उस समय उन्हें कड़े प्रशासक के रूप में जाना जाता था, परन्तु उनके विरुद्ध देश में उठी ब़गावत का कारण भी उनकी तानाशाही नीतियों को माना जाता रहा है।  परन्तु श़ेख हसीना अपने पड़ोसी देश भारत के महत्त्व को जानती थी। भारत ने ही उसके पिता श़ेख मुजीबर रहमान द्वारा शुरू की पाकिस्तान से आज़ादी की लड़ाई में बड़ी सहायता की थी परन्तु इसके साथ-साथ वहां लगातार जमात-ए-इस्लामी जैसी कट्टरवादी पार्टी का भी प्रभाव बना रहा है।
श़ेख हसीना की प्रशासनिक शक्ति का एक पहलू यह भी था कि उन्होंने अपने समय में आतंकवादी संगठनों के साथ जुड़ी पार्टियों को खुल कर खेलने नहीं दिया, जबकि ़खालिदा ज़िया की बांग्लादेश नैशनलिस्ट पार्टी ने वर्ष 2001 से 2006 तक देश का शासन चलाया था। उस समय वह जमात-ए-इस्लामी की सहयोगी पार्टी थी। उस समय आतंकवादी संगठनों को खुल कर खेलने की इजाज़त दी गई थी। इसी कारण उस अवधि में भारत और बांग्लादेश के संबंधों में भारी तनाव बना रहा था। मौजूदा चुनावों में अवामी लीग पर प्रतिबन्ध लगाया गया था। इसलिए इन चुनावों को पूरी तरह से इस कारण उचित नहीं कहा जा सकता, क्योंकि एक बेहद प्रभावशाली रही पार्टी को इन चुनावों में भाग नहीं लेने दिया गया। ़खालिदा ज़िया का बेटा तारिक रहमान विगत 17 वर्षों से इंग्लैंड में स्वयं बनाई निर्वासन की स्थिति में रहा है। इस बार उसकी पार्टी ने कट्टरवादी जमात-ए-इस्लामी के साथ समझौता नहीं किया, जबकि पिछले 18 महीने मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के होते हुए यह संगठन और इससे संबंधित छोटी-बड़ी पार्टियों ने उत्पात मचाये रखा। इस समय में व्यापक स्तर पर हिंसा फैली। अल्पसंख्यक और विशेष रूप से हिन्दुओं को वहां लगातार निशाना बनाया जाता रहा। ज्यादातर अल्पसंख्यक लोगों की हत्या कर दी गई और हज़ारों ही हिंसक घटनाएं घटित हुईं, जिन पर मोहम्मद यूनुस की सरकार काबू पाने में विफल रही।
इसी ही समय में उसने चीन और पाकिस्तान के साथ अधिक दोस्ती बढ़ाई और एक तरह से भारत को अनदेखा किया, परन्तु तारिक रहमान के गत दिवस सामने आए बयानों से यह ज़रूर प्रतीत हो रहा है कि वह अपने शासन में साम्प्रदायिक तत्वों को हावी नहीं होने देंगे और कट्टरवाद को अपने से दूर रखने का यत्न करेंगे। श़ेख हसीना के 15 वर्ष के शासन में उन्होंने राजनीतिक हलचल को नियंत्रण में रखा और सख्ती से अल्पसंख्यक समुदायों की सहायता की और आर्थिक मोर्चे पर भी देश को आगे बढ़ाया, परन्तु उनकी सरकार जाने के बाद पिछले डेढ़ वर्ष की गड़बड़ के समय भारत के साथ बांग्लादेश के संबंध बिगड़े रहे परन्तु तारिक रहमान को इस बात का एहसास ज़रूर है कि भारत न सिर्फ उनका पड़ोसी है, अपितु दोनों देशों की 4000 किलोमीटर लम्बी सीमाएं साझी हैं। विगत अवधि में भारत बांग्लादेश का बड़ा सहयोगी ही नहीं बना रहा, अपितु दोनों देशों का आपसी व्यापार भी अन्य देशों से कहीं अधिक था। दोनों देशों की नदियां तक साझी हैं।
चाहे विगत अवधि में चीन ने बांग्लादेश की सहायता के लिए अपना हाथ बढ़ाए रखा और पाकिस्तान ने भी पुन: बांग्लादेश के भीतर अपना प्रभाव बनाने का यत्न किया परन्तु अब तारिक रहमान इस समूची स्थिति से कैसे निपटते हैं, यह ज़रूर देखने वाली बात होगी। श़ेख हसीना के भारत में आश्रय को लेकर बांग्लादेश का प्रशासन पहले भी और अब भी उन्हें बांग्लादेश को सौंपने की बात करता है परन्तु इस समय भारत के लिए ऐसा करना बेहद कठिन प्रतीत होता है। आगामी समय में दोनों देश एक-दूसरे के साथ किस तरह से विचरण करते हैं, यह दोनों की मामलों के प्रति अपनाई परिपक्व सोच ही होगी, जिसे क्रियात्मक रूप में लाना दोनों देशों के लिए बड़ा महत्त्वपूर्ण होगा। 

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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