शिवरात्रि का अर्थ दिव्य चेतना की शरण में जाना
जब हम स्कूल में थे, प्रतिदिन अध्यापक को कुछ भेंट देने की परम्परा थी। घर में जो भी मिठाई बनती थी, हम उनके साथ साझा करते थे। इसलिए अधिक मिठाई नहीं खा सकते थे। वह ताज़ा मिठाई एक डिब्बे में सम्भाल कर रख लेते थे और पहले रखी हुई मिठाई बच्चों को बांट देते।
बच्चे हंसते और कहते कि अध्यापक हमें ‘एंटीक’ मिठाई देती हैं। जो मिठाई हम उन्हें देते थे, वे हमारे घर की ही होती थी, लेकिन जब वे हमारे पास वापस आती थी, तो उसमें से एक अलग सी बदबू होती थी। हम उन्हें अपनी जेब में रख लेते थे और बाद में चुपचाप फेंक देते थे।
हम अपनी भावनाओं के साथ भी ऐसा ही करते हैं। हम पुरानी भावनाओं को ढोते रहते हैं और आज उपजने वाली नई भावनाओं और विचारों पर ध्यान नहीं देते। हम उन्हें पुराने व बासी संस्कारों से मिला देते हैं—कल का गुस्सा, सालों पुरानी चोट, जन्मों से रखी उम्मीदें। मन नई चीज़ नहीं देखता, वह पुराने से चिपका रहता है।
यहां अनमोल शिव सूत्र मन को मुक्त करने के लिए गहन ज्ञान देते हैं। जैसे पतंग उड़ाने और उसे धरती से संभालने के लिए एक पतले धागे की ज़रूरत होती है। वह धागा धरती पर ही रहता है, जबकि पतंग आसमान में ऊंची उड़ान भरती है। वह धागा ‘सूत्र’ है। इसी तरह, हमारे जीवन को ऊंचा उठाने और उसे अनंत तक फैलाने के लिए क्या चाहिए? एक सूत्र जो धरती और आकाश, मानवता और दिव्यता के बीच एक सेतु बन जाए। जिस सूत्र को हम पकड़ रहते हैं, वही हमारे जीवन की दिशा और गुणवत्ता निर्धारित करता है।
एक सूत्र है—‘नर्तक आत्मा’, जिसका अर्थ है कि आत्मा ही नर्तक या अभिनेता है। इसका क्या अर्थ है?
आत्मा एक नाटक में अभिनेता या नर्तक की तरह है। नर्तक या अभिनेता ‘नवरस’—भावनाओं के नौ रूपों को व्यक्त करने के लिए विभिन्न भावों का उपयोग करता है। क्या आपने देखा है कि नर्तक भावनाओं को कैसे व्यक्त करता है? वह उन्हें पूरी कला, कौशल और निपुणता के साथ व्यक्त करता है। यदि वह क्रोध दिखाना चाहता है, तो आंखें लाल हो जाती हैं। अगर वह दु:ख दिखाना चाहता है तो पूरा शरीर शामिल हो जाता है। फिर भी नर्तक आज के भाव को कल की प्रस्तुति में नहीं दोहराता। एक पल में भाव बदल सकते हैं, भूमिका बदल सकती है, लेकिन नर्तक खुद अप्रभावित रहता है।
एक अच्छा नर्तक आसानी से भाव बदल सकता है। उसे एक भाव से दूसरे भाव में जाने में ज़्यादा समय नहीं लगता। वह एक पल में भूमिका और अभिव्यक्ति बदल सकता है। क्या यह सही नहीं? इसी तरह, जब आपको गुस्सा आता है, तो आपको सामान्य होने में कितना समय लगता है? फिर से हंसने में कितना समय लगता है? एक अच्छा नर्तक एक पल में भाव बदल देता है। यह सूत्र बहुत सूक्ष्म है। इसे खुले मन से देखने की ज़रूरत है।
‘नर्तक की आत्मा’ —आत्मा एक नर्तक की तरह होती है। एक अच्छा नर्तक कल के भाव को आज नहीं दोहराता। कल उसने कल के भाव ज़ाहिर किए थे और आज वह नए भाव ज़ाहिर करता है।
इसी तरह आत्मा खुद को एक लीला के रूप में ज़ाहिर करती है। गुस्सा आता है और चला जाता है, प्यार पैदा होता है और खत्म हो जाता है, डर पैदा होता है और गायब हो जाता है। अगर आप ध्यान से देखें तो कोई भी भाव, इच्छा या चिंता हमेशा नहीं रहती। समय के साथ चिंताएं बदलती हैं और नई चिंताएं उनकी जगह ले लेती हैं। थोड़ी-सी जागरूकता से वैराग्य अपने-आप पैदा हो जाता है।
जब हम यह समझ जाते हैं, तो समय से हमारी उम्मीदें भी खत्म हो जाती हैं। हम अपने ज़ख्मों को भरने के लिए समय का इंतज़ार नहीं करते। हम जागते हैं और ज़िन्दगी को एक नाटक की तरह देखते हैं, और सब कुछ तुरंत विलीन हो जाता है। इसे कालातीत होना कहते हैं। इसीलिए भगवान शिव को ‘महाकाल’ कहा जाता है—जो समय से परे हैं, आत्मा का स्वरूप हैं।
इस रूप को साल के कुछ खास दिनों में, जैसे महाशिवरात्रि की रात को आसानी से महसूस किया जा सकता है। कहा जाता है कि शिवरात्रि की रात को किया गया ध्यान साल के किसी भी अन्य समय की तुलना में सौ गुना ज़्यादा प्रभावशाली होता है। इन दिनों ध्यान करने से एक गहरा अनुभव होता है और अस्तित्व के साथ एक गहरा जुड़ाव महसूस होता है।
शिव सूत्र जो आत्म-साक्षात्कार देते हैं, वे कालातीत हैं। यह पूछना कि वे आज भी प्रासंगिक हैं या नहीं, यह पूछने जैसा है कि क्या तकनीक के इस युग में सांस लेना प्रासंगिक है। सांस के बिना कोई जीवन नहीं है। वे हमें याद दिलाते हैं कि हम जहां भी सच्चाई, सुंदरता और शुभता देखें, उसे थामे रहें। उस थोड़ी-सी नकारात्मकता से न चिपकें जिसे मन बढ़ा-चढ़ाकर देखता है। शिवरात्रि का अर्थ दिव्य चेतना की शरण में जाना, शिव तत्व में विश्राम करना है।



