रिश्तों की संवेदनशीलता और ज़िम्मेदारी है प्रेम का वास्तविक अर्थ
आज वैलेंटाइन डे पर विशेष
आज के आधुनिक समाज में रिश्तों और संबंधों में भी पहले की अपेक्षा आपसी समझ व खुलापन आने लगा है। हालांकि हर बदलाव की हवा पश्चिम जगत से चलनी शुरू होती है, यह परम्परा यानी ‘वेलेंटाइन डे’ मनाना भी वहीं से शुरु हुआ। अब भारत में भी शहरी क्षेत्रों में प्राय: हर जगह इस दिन को महत्व दिया जाने लगा है। प्रेम, दोस्ती ये शब्द भावनात्मक दृढ़ संबंधों का अटूट रिश्ता है। कोई खून का रिश्ता नहीं, यह न जात-पात देखता और न ही उंच-नीच, या छोटा-बड़ा देखता। बस हृदय और मनोमस्तिष्क की उत्ताल भावनाओं ने ज़ोर मारा नहीं की दो पक्षों के बीच प्रेम का अटूट रिश्ता कायम हो जाता है। यह रिश्ता इतना मज़बूत होता है कि अच्छे अच्छे खून के रिश्तों में दरार पड़ जाती है, पर इन रिश्तों में नहीं।
प्रेम की भावना का यह संबंध महान संबंधों में जाना जाता है। इसकी परिभाषा नहीं होती। इसमें स्वार्थ, दुश्मनी, निजी इच्छाओं का न होना ही प्रेम है। हर लड़का या लड़की यह चाहते हैं कि उनका कोई ऐसा सच्चा दोस्त हो जो उनकी भावनाओं को समझे, सुख दु:ख के समय में साथ निभाये। ऐसे दोस्तों की इच्छा कमोवेश सभी को होती है, और होनी भी चाहिए। लड़का लड़के से दोस्ती करें और लड़की लड़की से दोस्ती करें तो सामान्यत: सफल होते हैं। लेकिन यदि वह दोस्ती लड़के और लड़की में हो तो मैत्री को प्यार में बदलते देर नहीं लगती। वे पल दो पल के आकर्षण से प्रभावित होकर समझने लगते है कि हम दोनों बने ही एक दूजे के लिये हैं। फिर कई बार मर्यादा का उल्लंघन शुरू हो जाता है।
कई प्रत्येक मैत्री या प्यार या संबंध का स्वरुप बदलकर समस्या का रूप ले लेता है। इसके अपवाद भी है। दोस्ती करना जितना आसान है उसको निभाना उतना ही कठिन। लड़का-लडकी दोस्ती करें लेकिन अपने पारंपरिक मर्यादाओं की सीमाओं में बंधकर मित्रता को मित्रता ही रहने दे। वे आपस में एक दूसरे के अच्छे सहयोगी सिद्ध हों, दोस्ती और प्यार दो अलग-अलग बात हैं।
दोस्ती में जहां सहयोग और अनेकाधिकार होता है, वहीं प्रेम में समर्पित होने की भावना और एकाधिकार अधिक होता है। दोस्ती में जहां दोनों के लिये भविष्य निर्माण की कल्पनायें होती हैं, वही प्रेम में परिवार निर्माण की। किशोरावस्था में बहकाव भटकाव अधिक होता है। नई पीढ़ी का नव निर्माण करने में अभिभावकों को सख्ती और नरमी दोनों से काम लेना पड़ता है। इस अवस्था में अभिभावक उनके बागी होने या फिर उनके बिगड़ने की चिंता से पहले ही सचेत रहकर सतर्क कदम उठायें। आज के समय में कुछ व्यक्ति जहां एक ओर अपने आपको आधुनिक समझते हैं, वही दूसरी ओर लड़के-लडकी की दोस्ती की बात आते ही संकीर्ण मानसिकता का लबादा ओढ लेते हैं।
अभिभावकद स्वयं भी तो बच्चों के अच्छे दोस्त साबित हो सकते हैं। जिन्हें घर में प्यार नहीं मिलता, वे उसे बाहर खोजते हैं। घर में यदि उन्हें एक अच्छा दोस्त मिलेगा तो सीमाओं में रहना वह स्वयं ही सीख जायेंगे। अपनी प्रत्येक बात माता-पिता से कहने को उत्सुक रहेंगे। उनका कहना भी स्वेच्छा एवं खुशी से मानेंगे। इसके अतिरिक्त युवा लड़के-लड़कियों का भी यह दायित्व होता है कि वे बाहर अगर दोस्ती करते हैं तो वे दोस्ती को सिर्फ दोस्ती के रूप में निभाये ताकि इन संबंधों पर किसी की उंगली न उठ सके।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपनी दोस्ती के विषय में अपने परिवार जनों को पूरी तरह अवगत रखा जाए। इस तरह की दोस्ती उचित भी है और सार्थक भी। प्रत्येक किशोर मन एक अच्छा साथी, हमसफर दोस्त बनाना चाहता है। अच्छे मित्र आपके कैरियर निर्माण में सहयोगी सिद्ध होते हैं। (एजेंसी)



