बांग्लादेश को किस दिशा में लेकर जाएंगे तारिक रहमान
जनरल ज़िया-उर-रहमान व खालिदा ज़िया के 60 वर्षीय बेटे तारिक रहमान 17 साल तक निर्वासन में रहने के बाद स्वदेश लौटे, चुनाव लड़ा और अब वह बांग्लादेश के नये प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। उनके बांग्लादेश नैशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) गठबंधन ने 12 फरवरी 2026 को जातीय संसद के लिए हुए 13वें आम चुनाव में बहुमत हासिल किया है। बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11 दलों के गठबंधन को कुल 70 सीटें हासिल हुई हैं, जिसमें 5 सीटें नेशनल सिटीजन पार्टी की हैं, जिसने जेन-जी आंदोलन में शेख हसीना का तख्ता पलटने में अहम भूमिका अदा की थी।
बांग्लादेश के एक सदन वाले राष्ट्रीय संसद को जातीय संघसद कहते हैं। इसमें 300 सदस्य सीधे जनता द्वारा चुनकर आते हैं, जबकि 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं, जो चुनाव के बाद पार्टियों में उनकी जीत के अनुपात में विभाजित कर दी जाती हैं।
इस बार के आम चुनाव में अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना की अवामी लीग पर प्रतिबंध था और जो पार्टियां- बीएनपी व जमात-ए-इस्लामी, जो वर्षों तक चुनावी दौड़ से बाहर रहीं या उन्हें बाहर रखा गया, सत्ता की मुख्य दावेदार बनकर उभरी। शेख हसीना ने 2009 के बाद से 15 साल तक निरन्तर राज किया और उनके शासनकाल में बांग्लादेश में स्थिरता व आर्थिक विकास देखने को मिला। लेकिन साथ ही उन पर तानाशाह होने के भी आरोप लगे, जिसकी वजह से उनके खिलाफ विद्रोह हुआ और 2024 में उन्हें अपनी जान बचाकर भारत में शरण लेनी पड़ी। यह केवल इतना नहीं था कि अलोकप्रिय हुए नेता को हिंसक विद्रोह में सत्ता से हटा दिया गया बल्कि छात्रों के आंदोलन में बांग्लादेश के बुनियादी इतिहास को भी मिटाने का प्रयास किया गया, जिसमें शेख हसीना के पिता व उनकी पार्टी अवामी लीग के संस्थापक बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान प्रमुख शख्सियत थे। जैसे ही अवामी लीग के लीडर व समर्थक अंडरग्राउंड हुए बीएनपी व जमात-ए-इस्लामी जैसी पार्टियां सत्ता के नये दावेदारों के रूप में उभरने लगीं, विशेषकर नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के नेतृत्व में।
हालांकि अब तारिक रहमान के नेतृत्व में बीएनपी गठबंधन का सत्ता में आना तय हो गया है, लेकिन बांग्लादेश के समक्ष चुनौतियों का अम्बार लगा हुआ है। सबसे पहले तो पिछले 18 माह में धीमे हुए आर्थिक विकास को पटरी पर लाने की आवश्यकता है ताकि बेरोज़गारी, महंगाई आदि समस्याओं का समाधान निकाला जा सके। इतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय पर जो हिंसक हमले हो रहे हैं, उन पर त्वरित प्रभाव से विराम लगाया जाये। बीएनपी से साम्प्रदायिक सौहार्द कायम करने व धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को प्रोत्साहित करने की उम्मीद की जा सकती है।
बहरहाल, तारिक रहमान के समक्ष भारत से संबंध सुधारने की भी चुनौती है, जो शेख हसीना को शरण देने की वजह से प्रभावित हुए हैं। गौरतलब है कि तारिक रहमान जब आत्म-निर्वासन से बांग्लादेश लौटे थे, तो नई दिल्ली ने अपने विदेश मंत्री एस जयशंकर को उनसे मुलाकात करने के लिए ढाका भेजा था। इसलिए भारत व बांग्लादेश के संबंध बेहतर होने की संभावना है। बांग्लादेश में मतदान के साथ ही जुलाई नेशनल चार्टर, जो 84-पॉइंट का सुधार पैकेज है, पर भी जनमतसंग्रह हुआ था। इस चार्टर को जनता ने अपनी सहमति दी है, लेकिन जनमतसंग्रह कहीं भी अच्छा विचार साबित नहीं हुआ है। भारत में 1975 के बाद से कोई जनमतसंग्रह नहीं हुआ है, पाकिस्तान ने आखिरी बार यह 2002 में कराया था। क्या इससे स्विस लोकतंत्र हम से अधिक ‘परफेक्ट’ हो जाता है? सिद्धांत में, शायद। व्यवहार में, हमें नतीजों के आधार पर समीक्षा करनी चाहिए।
आज़ाद भारत में प्रत्येक पुरुष व महिला को 1950 में ही मतदान का अधिकार मिल गया था। स्विट्ज़रलैंड में पुरुषों ने 1959 में महिलाओं को मतदान दिये जाने के जनमतसंग्रह को ठुकरा दिया था और इस गलती का सुधार इसके 12 साल बाद किया गया। यह सही है कि जनमतसंग्रह लोकतंत्र की जड़ों के बहुत करीब है, लेकिन विशेषज्ञों की राय से संचालित प्रतिनिधि लोकतंत्र के अपने लाभ हैं। साथ ही जनमत संग्रह अक्सर तब आयोजित किया जाता है, जब सरकारें कोई स्टैंड लेने से डरती हैं।
जनमतसंग्रह की सबसे बड़ी समस्या बहुसंख्यावाद है, जिससे से अल्पसंख्यकों के हित प्रभावित होते हैं। बांग्लादेश में ‘बेगमों की जंग’ पर तो विराम लग गया है कि खालिदा ज़िया का निधन हो चुका है और शेख हसीना देश में मौजूद नहीं हैं और ‘मानवता के विरुद्ध अपराधों’ के लिए अदालत उन्हें मौत की सज़ा सुना चुकी है। इसलिए बांग्लादेश में तारिक रहमान के साथ एक नये युग का आरंभ हो रहा है। वक्त ही बतायेगा कि वह अपने देश को किस दिशा में लेकर जायेंगे, जबकि उनसे उम्मीदें तो बहुत हैं।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



