डॉक्टरों की कमी, पढ़ाई का बुरा हाल और मरीज़ों का शोषण

मेडिकल की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ रही है और उनकी पढ़ाई के लिए उपलब्ध कॉलेज भी पिछले दस वर्षों में लगभग दुगने हो गए हैं। शानदार इमारत, आलीशान कमरे और अन्य निर्माण दिखाकर डॉक्टरी पढ़ने के इच्छुक विद्यार्थियों को मोटी फीस लेकर दाखिला दे दिया जाता है। बढ़िया टाइमटेबल बना दिया और अब जब वे कक्षा या लाइब्रेरी या लेबोरेटरी में गए तो वहां न तो शिक्षित और प्रशिक्षित शिक्षक मौजूद हैं और न ही लैब टेक्निशियन या विशेषज्ञ जो टेस्ट आदि करने की विधि सिखा सकें। यह विडम्बना नहीं बल्कि खिलवाड़ है कि मेडिकल की पढ़ाई के लिए सही शिक्षक न मिले तो प्रबंधकों ने किसी अन्य विषय में पीएचडी करने वालों को पढ़ाने के लिए नियुक्त कर दिया क्योंकि कहलाते तो वे भी डॉक्टर ही हैं। 
चिकित्सा शिक्षा में शिक्षकों की कमी को लेकर जनवरी 2026 में एक याचिका की सुनवाई के बाद माननीय उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि इन शिक्षण संस्थानों में जितने भी शिक्षकों के विशेषरूप से और प्रबंधन के पद खाली हैं, उन पर अगले चार महीनों में नियुक्ति हो जानी चाहिए। यह निश्चित है कि यह नहीं हो सकता क्योंकि जिस तरह की कच्छुआ चाल हमारे देश में है, यह असंभव है। उसके बाद और अधिक समय मांगा जाएगा जिसकी क्रम वर्षों तक चलता रहेगा क्योंकि सरकार की कोशिशों में गंभीरता और पारदर्शिता नहीं है। उसका विश्वास असली नकली आंकड़ों के आधार पर जनता को भुलावे में रखना है वरना सोचिए कि इस बात में क्या तुक है कि पढ़ाने वाले हैं नहीं और पढ़ने वालों को दाखिला दे दिया। हर साल मेडिकल में दाखिलों की सीट बढ़ रही हैं और आने वाले वर्षों में जनसंख्या के अनुपात में डॉक्टरों की संख्या भी बढ़ेगी। प्रश्न यह है कि क्या कॉलेजों और शिक्षकों की ज़रूरत की पूर्ति की व्यवस्था की जा रही है? जी नहीं, इन दोनों के बीच कोई सामंजस्य नहीं है। फैकल्टी की कमी खास तौर से नए खुले सरकारी कॉलेजों में कुछ प्रदेशों में जैसे तेलंगाना, मध्य प्रदेश आदि में पचास फीसदी तक है। ज़रूरी सुविधाओं की बात करें तो वह भी नहीं हैं। इस कारण विद्यमान शिक्षकों पर अतिरिक्त बोझ पड़ने से पढ़ाई की गुणवत्ता कम हो रही है तो कुछ मामलों में अनक्वालिफाइड तथा नॉन मेडिकल फैकल्टी विद्यार्थियों का भविष्य तबाह कर रही है। जब ये बाहर आकर मरीज़ों का इलाज करेंगे तो क्या होगा यह सोच कर भी डर लगता है। 
एक समस्या और है जो यह है कि आरक्षण के आधार पर दाखिले के लिए क्वालीफाइंग मार्क्स इस हद तक कम कर दिए जाते हैं कि आश्चर्य होता है। यहां भी पास होने के लिए पर्याप्त अंक सामान्य वर्ग की तुलना में बहुत कम हैं। जाति आधारित आरक्षण के कारण दाखिला देने में कोई बुराई नहीं है लेकिन इसके लिए न्यूनतम अंकों की अनिवार्यता समाप्त करना घातक है। 
नागरिकों को स्वस्थ बनाये रखने की जितनी ज़िम्मेदारी स्वयम् की है उतनी ही स्वास्थ्य की देखभाल करने के लिए आवश्यक प्रबंध करने के लिए सरकार की है। बड़े शहरों में तो फिर भी गनीमत है लेकिन गांव देहात और दूरदराज के क्षेत्रों में आवश्यक सुविधाएं नदारद हैं। इन इलाकों में अगर कानूनन सर्विस करने की मजबूरी न हो तो कोई भी डॉक्टर यहां न आये। इसका कारण एकमात्र यह नहीं है कि वे आना नहीं चाहते बल्कि यह है कि वहां स्वास्थ्य केंद्रों में इलाज करने, टेस्ट करने की सुविधाएं और आधुनिक उपकरण नहीं हैं। लोगों की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि बड़े शहरों में बीमारी का इलाज करा सकें। यह सरकारी नीतियों की विफलता ही है कि ग्रामीण क्षेत्रों में झोलाछाप डॉक्टरों का बोलबाला है। केवल जन स्वास्थ्य केंद्र, आयुष्मान भारत और योग संस्थान की बदौलत लोगों की स्वास्थ्य रक्षा नहीं हो सकती। निजी अस्पतालों में मरीज़ों और उनके तीमारदारों की सच्ची कहानियां और सरकार की बेरुखी इस बात का प्रमाण हैं कि मेडिकल की पढ़ाई की व्यवस्था और गुणवत्ता प्रश्नों के घेरे में है और सरकार अपनी नाकामी छिपाने के लिए कोई भी दावा कर सकती है और उस पर यकीन करना युवा पीढ़ी के लिए घातक साबित होगा। 
चिकित्सा व्यवसाय का नकारात्मक पक्ष : मेधावी विद्यार्थी एमबीबीएस करने के बाद सरकारी या निजी अस्पतालों में तुरंत नौकरी पा जाते हैं और जो सफल नहीं रहते, वे अपना क्लीनिक खोल लेते हैं। उनकी योग्यता के बारे में मरीज़ों को संदेह रहता है, लेकिन वे इतना तो समझ ही जाते हैं कि इस व्यवसाय में दूसरे खेल खेलकर आसानी से रुपया कमाया जा सकता है। यह धंधा बड़े और नामी अस्पतालों में भी होता है और मुफ्त की कमाई का साधन है। एक उदाहरण से समझिए। आपको मामूली सर्दी, खांसी, बुखार, जुकाम, थकावट, बदनदर्द है तो डॉक्टर ढेरों दवाइयां, एंटीबायोटिक देने के साथ तरह-तरह के टैस्ट करने की हिदायत देते हैं जिन पर सौ दो सौ नहीं, दस,बीस, पचास हज़ार रुपये तक खर्चा आता है। सच यह है 90-95 प्रतिशत टैस्टों में कोई गंभीर बीमारी नहीं निकलती। एक और कलाकारी यह है कि सभी लेबोरेटरी अनेक डॉक्टरों के सम्पर्क या साझेदारी से चलती हैं। यही हाल दवाओं का है, डॉक्टर मरीज़ से पहले दवा कम्पनियों के प्रतिनिधियों से सौदा करने को प्राथमिकता देते हैं। अधिकतर दवाएं एक जैसी ही होती हैं लेकिन डॉक्टर साहब एक विशेष किस्म की दवा के लिए पर्ची बनाकर देते हैं। 
मंतव्य यह नहीं है कि ये टैस्ट निराधार हैं बल्कि जानलेवा बीमारियों का पता इन्हीं से चलता है लेकिन काबिल डॉक्टर जांच तब ही कराता है जब मरीज़ की बीमारी का इतिहास, अब तक की गई चिकित्सा का विवरण और शरीर के अंगों की स्वयं की गई प्राथमिक जांच और चिकित्सा के बाद भी हालत में कोई सुधार न हो! डॉक्टरों का रवैया मरीज़ को डराने का होता है। अपनी योग्यता पर भरोसा नहीं होता फिर भी वे मोटी कमाई करते हैं। शुरुआत एक से होती है जो अनेक में बदल जाती है जो विभिन्न स्पेशलिस्ट कहे जाते हैं। एक साधारण बीमारी की रुपरेखा गंभीर और घातक बीमारियों की आशंका में बदल दी जाती है। ऐसा कोई कानून भी नहीं है जो गैरज़रूरी टैस्ट और इलाज करने वाले डॉक्टर को कटघरे में खड़ा कर सके। कोई जवाबदेही नहीं और अब तो मेडिकल नेग्लीजेंस को भी डॉक्टर के विवेक की दलील से सही ठहरा दिया जाता है। अब शरीर है तो वह किसी भी कारण से अस्वस्थ तो होगा ही लेकिन इस कारण प्राणी का शोषण किया जाना तो अपराध ही माना जाएगा, जरा सोचिए।

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