हिमालय की चोटियों का बदल रहा स्वरूप

हिमालय के बहुत बड़े क्षेत्रों में उत्तराखंड की नदी घाटियों से लेकर एवरेस्ट पर्वत के नीचे की ढलानों तक बर्फ की सीमा ऊपर की ओर सिकुड़ती जा रही है। ऐसा वैज्ञानिकों का अवलोकन है। संसार की सबसे ऊंची पर्वत श्रृंखला पर यह जलवायु परिवर्तन में तेज़ी आने का यह एकदम स्पष्ट और सर्वाधिक दिखायी देने वाला संकेत है। जाड़े के इस मौसम में भारत के हिमालय क्षेत्र में हिमपात सामान्य से कम रही है, जिससे यह चिंता बढ़ गई है कि बर्फ की चोटियां पतली हो जायेंगी, बर्फ जल्दी पिघलने लगेगी और जल सुरक्षा पर दीर्घकालीन प्रभाव पड़ेगा। उत्तराखंड में लम्बी सूखी स्थितियों का असर निरंतरता के साथ पूरे कुमाऊं हिमालय में दिखायी दे रहा है। चूंकि कुछ खास बारिश या हिमपात नहीं हुआ है, इसलिए कैलाश मानसरोवर के मार्ग पर हिमालय की अनेक चोटियां असामान्य तौर पर सूखी और बड़े स्तर पर बर्फ रहित दिखायी दे रही हैं। 
एक अन्य समस्या और है। दशकों से हिमालय में जंगल की आग एक निश्चित पैटर्न का पालन करती आ रही थी। बसंत के अंत में व गर्मियों के आरंभ में जब तापमान बढ़ने लगता था तो बिखरी हुई सूखी पत्तियां सुलगने लगती थीं और हिमालय के जंगलों में आग लग जाती थी। इसके विपरीत जाड़ों में बर्फ व नमी की वजह से जंगल आग से सुरक्षित रहते थे। पिछले कुछ वर्षों से यह पैटर्न टूट गया है। इस जाड़े के मौसम में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश व जम्मू-कश्मीर के जंगल इतनी तीव्रता व आवृति से जल रहे हैं कि वन अधिकारियों व वैज्ञानिकों का कहना है कि अब यह अपवाद नहीं है बल्कि बदलते पारिस्थितिक स्वरूप का संकेत है। जंगल की आग प्राकृतिक चक्र है, लेकिन जलवायु परिवर्तन इस चक्र को सिकोड़ और तीव्र कर रही है।  
दरअसल, सिर्फ  जंगल ही नहीं जल रहे हैं। चिंता का विषय यह भी है कि सूखे जाड़ों की वजह से कश्मीर घाटी व पीर पंजाल रेंज में मकानों में भी आग लग रही है। अधिकारियों के अनुसार इन जाड़ों के पिछले कुछ माह के दौरान अकेले श्रीनगर में 700 से अधिक मकानों में आग लगने की घटनाएं हुई हैं। जम्मू-कश्मीर के अग्नि व आपात सेवा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि उनके पास लगभग रोज़ाना आग लगने संबंधी फोन आ रहे हैं और सबसे खराब स्थिति श्रीनगर के भीड़-भरे पुराने शहर में है, जहां अगर एक घर में आग लगती है तो तेज़ी से दूसरे सटे हुए मकानों में फैल जाती है। 10 जनवरी, 2026 को नोहट्टा में कम से कम 7 मकानों में आग लगी। यह सब अति सूखे की वजह से हो रहा है। दिसम्बर में बारिश नहीं पड़ी और जनवरी भी तकरीबन सूखा ही जा रहा है। जंगलों के निचले हिस्सों में नमी का स्तर बहुत कम है। उत्तराखंड की तरह हिमाचल प्रदेश में भी पिछले साल अक्टूबर के पहले सप्ताह से बारिश नहीं हुई है और सेब की काश्त वाली पट्टी जैसे कुल्लू, मनाली, मंडी, शिमला व चंबा में बर्फ़बारी न के बराबर हुई है। नतीजतन जंगलों में आग लग रही है। कश्मीर में भी बर्फबारी सामान्य से 40 प्रतिशत कम हुई है और घाटी, पीर पंजाल रेंज, उरी, बंदीपोरा, निशात व पुंछ में आग भड़की हैं। दिसम्बर में अनंतनाग में आग बुझाते हुए एक वन गार्ड की मौत हुई और 12 जनवरी को पुंछ में जंगल की आग की वजह से नियंत्रण रेखा के पास लैंडमाइन विस्फोट हुए। कैलाश मानसरोवर मार्ग पर हिमालय की अनेक चोटियां असामान्य रूप से सूखी व बर्फ रहित दिखायी दे रही हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार हिमपात न होने की वजह से यह पहाड़ अब सफेद की जगह ‘लगभग काला’ है। 
दरअसल, हिमालय के अधिकतर हिस्सों में मौसमी स्नोलाइन ऊपर की तरफ  शिफ्ट हुई है। अधिक तापमान व कम बर्फ की वजह से पहाड़ों पर चट्टानें अधिक दिखायी दे रही हैं, जबकि पहले पहाड़ जाड़ों व बसंत में बर्फ से ढके रहते थे। सैटेलाइट-आधारित शोध से जो डाटा उपलब्ध हुआ है, उससे मालूम हुआ है कि 1990 से 2022 तक गोरी गंगा वाटरशेड की स्नेलाइन लगभग औसतन 520 मीटर ऊपर उठी है। वनस्पति (596 मीटर) व पेड़ों (680 मीटर) की सीमाएं भी ऊपर की ओर बढ़ी हैं, जिसका कारण जलवायु परिवर्तन है। माउंट एवेरेस्ट क्षेत्र में भी स्नोलाइन 2024-25 के जाड़ों में दो माह के भीतर 490 फीट ऊपर गई। यही कुछ पूरे हिमालय क्षेत्र में देखने को मिल रहा है। नेपाल के त्रिभुवन विश्वविद्यालय के 2025 के अध्ययन से मालूम होता है कि 1988 से 2024 हिमालय में स्नो कवर बहुत तेज़ी से कम हुआ और स्नोलाइन लगभग 2.2 मीटर प्रति वर्ष के हिसाब से ऊपर उठी है। 
अब अगर हिमालय में ही बर्फ कम होती चली जाएगी तो निश्चित रूप से हिमालय से निकलने वाली नदियों जैसे गंगा आदि में पानी का स्तर घट जायेगा और मैदानी क्षेत्रों में जल सुरक्षा पर संकट के बादल छा जायेंगे। वैश्विक तपिश को अब नियंत्रित न किया गया तो बहुत देर हो जायेगी।      -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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