पाकिस्तान की अखंडता पर सवाल

पाकिस्तान के सबसे बड़े प्रांत बलोचिस्तान में जिस तरह के हालात बन चुके हैं, उनसे यह स्पष्ट होने लगा है कि इस बड़े प्रांत को अब पाकिस्तान अपने साथ रखने में असमर्थ होता जा रहा है। वहां युद्ध जैसे हालात पैदा हो गए हैं। गत दिवस पाकिस्तान के महत्त्वपूर्ण शहर तथा पश्चिमी पंजाब की राजधानी लाहौर में सम्बोधित करते हुए बलोचिस्तान के एक पूर्व मुख्यमंत्री अख़्तर मैंगल ने स्पष्ट रूप में यह घोषणा की कि अब बलोचिस्तान का पाकिस्तान से अलग होना ही एकमात्र हल है। ये दोनों अब किसी तरह भी इकट्ठे नहीं रह सकते। उन्होंने यह भी कहा कि बलोचिस्तान पाकिस्तान के साथ पड़ोसी देश के रूप में तो शांतिपूर्ण ढंग के साथ रह सकता है परन्तु उसका प्रांत बन कर रहना इसे स्वीकार नहीं है। इसके साथ ही अख़्तर मैंगल ने पाकिस्तान की राष्ट्रीय असैम्बली से भी त्याग-पत्र देने की घोषणा कर दी है।
मिल रहे ताज़ा समाचारों के अनुसार इस ब़गावत को दबाने के लिए पाकिस्तान ने टैंकों और तोपों के साथ वहां के कई क्षेत्रों पर हमला कर दिया है। ब़गावत दबाने के लिए ड्रोन का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। कई क्षेत्रों में हवाई हमले भी जारी हैं। वहीं ज्यादातर क्षेत्रों में कर्फ्यू लगा दिया गया है और सेना ने बलोचिस्तान लिबरेशन आर्मी को दबाने के लिए ज्यादातर क्षेत्रों में तलाशी अभियान चलाया है। वहां के महिमवाल क्षेत्र से आए समाचारों के अनुसार दर्जनों की घरों को बमबारी से तबाह कर दिया गया है और मुसतंग पंजगुर के बड़े क्षेत्र के साथ-साथ अन्य बड़े क्षेत्रों में भी पाकिस्तान की सेना का कहर जारी है। कुछ दिन पहले प्राप्त समाचारों के अनुसार अब तक सैकड़ों ही पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के जवान मारे जा चुके हैं, जबकि प्रशासन ने यह दावा किया है कि उन्होंने सैकड़ों की संख्या में बलोचिस्तान के विद्रोहियों को मार दिया है। ये विद्रोही भी सुरक्षा चौकियों और सैन्य छावनियों को अपना निशाना बना रहे हैं।
कुछ दिन पहले वहां के बड़े अलगाववादी नेता मीरयार बलोच ने बलोचिस्तान लिबरेशन चार्टर जारी किया, जिसे उसने बलोचिस्तान का संविधान करार दिया। इस प्रकाशित हुए दस्तावेज़ में बलोचिस्तान के प्रत्येक व्यक्ति को अधिकारों की गारंटी दी गई है और यह भी कहा गया है कि धर्म और राजनीति अलग-अलग हैं। इस संविधान के अनुसार कट्टरपंथी विचारधारा को पूरी तरह रद्द करते हुए सभी अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित बनाई गई है। यह भी कहा गया है कि विश्व बलोचिस्तान को धर्म-निरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य का दर्जा दे। इस दस्तावेज़ को 11 भाषाओं में जारी किया गया है, जिनमें बलोची, ब्रह्मी, हिन्दी, मराठी, गुजराती, पंजाबी, अंग्रेज़ी, पशतो, फारसी, अरबी और उर्दू भाषाएं भी शामिल हैं। इसलिए पाकिस्तान प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चिन्ता यह बन गई है कि अब यह लड़ाई सिर्फ कबीलाई सरदारों के हाथ में नहीं है, अपितु इसमें डाक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और वकील तक बड़ी संख्या में शामिल हो गए हैं। इससे बड़ी बात यह कही जा सकती है कि इस आन्दोलन में महिलाएं भी बड़ी संख्या में शामिल हो गई हैं। इनका नेतृत्व महरंग बलोच जैसी शिक्षित लड़कियां कर रही हैं। यहीं बस नहीं, ज्यादातर जागरूक महिलाएं फिदायीन हमलों में भी शामिल हो गई हैं।
चाहे अब की लड़ाई बलोच ब़ागी 25 वर्ष से लड़ रहे हैं परन्तु पिछले 4-5 वर्ष से इसने सामूहिक सार्वजनिक भावनाओं की तर्जमानी करनी शुरू कर दी है और वहां बहुसंख्यक लोग ब़गावती रवैया धारण करके बाहर निकल आए हैं। जहां तक बलोचिस्तान के इतिहास का संबंध है 1947 में इसे अंग्रेज़ों ने अलग देश के रूप में मान्यता देने की घोषणा की थी। कारण यह था कि ब्रिटिश शासन के समय भी यहां बलोचिस्तान में आज़ाद शासन ही चलता रहा है। यहां की रियासतों का दर्जा हैदराबाद या  पटियाला की रियासत जैसा नहीं था, अपितु इन रियासतों को आज़ाद रियासतें ही माना गया था। 4 अगस्त, 1947 को मोहम्मद अली जिन्ना, माऊंटबेटन और कलात (आधुनिक बलोचिस्तान का बड़ा हिस्सा) रियासत के प्रमुख मीर अहमद यार ़खान के बीच यह सहमति बनी थी कि ब्रिटिश इंडिया के आज़ाद होने के अगले ही दिन कलात को भी आज़ाद देश घोषित किया जाएगा। 15 अगस्त, 1947 को ऐसा ही फरमान जारी किया गया था परन्तु फरवरी, 1948 के आते-आते उस समय के पाकिस्तान के गवर्नर जनरल मोहम्मद अली जिन्ना ने जबरन मीर अहमद यार ़खान पर दबाव डाल कर उससे बलोचिस्तान के पाकिस्तान में विलय करने की घोषणा करवा ली थी परन्तु इस घोषणा के बावजूद मीर अहमद यार ़खान के भाई प्रिंस अब्दुल करीम ़खान ने वहां अलहिदगी के विद्रोह की कमान सम्भाल ली थी और वह अ़फगानिस्तान में भाग गया था। इस ब़गावत को पाकिस्तान सरकार ने सख्ती से दबा दिया था। दूसरी ब़गावत वर्ष 1959 में उठी जो पाकिस्तान की सरकार के देश को ‘वन यूनिट’ घोषित करने से हुई थी। बलोचिस्तानियों का आरोप था कि इस तरह उनकी पहचान खत्म हो जाएगी। वहां ़खान के बेटों और अन्य पारिवारिक सदस्यों को फांसी दे दी गई थी, जिससे यह ब़गावत भी ठंडी पड़ गई थी। तीसरी ब़गावत 1963-69 तक लगातार जारी रही। यह पाकिस्तान सरकार द्वारा बलोचिस्तान में नए सैन्य अड्डे बनाने और प्राकृतिक स्रोतों पर अधिकार स्थापित करने के रोष स्वरूप उभरी थी। उस समय जनरल याहिया ़खान को ‘वन यूनिट’ की नीति वापस लेनी पड़ी थी। चौथी ब़गावत 1973-77 तक चलती रही। उस समय के प्रधानमंत्री ज़ुल्फिकार अली भुट्टो  ने वहां की निर्वाचित प्रांतीय सरकार को बर्खास्त कर दिया था। 1977 में भुट्टो का तख़्ता पलटने के बाद यह लहर खत्म हो गई थी।
पांचवीं बार ब़गावत वर्ष 2000 में शुरू हुई जो अभी तक जारी है। पहले इसका नेतृत्व नवाब अकबर ़खान बुगती करता रहा परन्तु अब इसका नेतृत्व अल्ला नज़र बलोच कर रहा है, जो बड़ी संख्या में जनता को अपने साथ लेकर चलने में सफल होता जा रहा है। यह बलोचिस्तान लिबरेशन फ्रंट का नेता है, जिसने इस आन्दोलन को पूरी बलोच जनता तक पहुंचा दिया है। इसके अतिरिक्त अनेक अन्य संगठन भी हिंसक रूप में पाकिस्तान के विरोध में उठ खड़े हुए हैं। पैदा हुए ऐसे हालात में पाकिस्तान की स्थिति पूरी तरह दयनीय बनती दिखाई देने लगी है। नि:संदेह बलोचिस्तान की अलग होने के लिए शुरू हुई इस ब़गावत ने पाकिस्तान को जड़ों तक हिला कर रख दिया है, जिस कारण इसकी अखंडता पर बड़ा प्रश्न-चिन्ह लगा हुआ दिखाई देता है।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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