पॉपकॉर्न के बिना फिल्म लगती है अधूरी

एक समय था जब मैं अपने दोस्तों के साथ सिनेमाघर में जाता तो इंटरवल के दौरान समोसा या मूंगफली का आनंद लेते हुए फिल्म पर आलोचकों की तरह चर्चा किया करता था, लेकिन जब पॉपकॉर्न आया तो शुरू में मैं उसे खरीदने में संकोच करता था, लेकिन फिर पॉपकॉर्न का टब शेयर करना परम्परा बन गया। अब तो पॉपकॉर्न खरीदना फिल्म देखने का अटूट हिस्सा बन गया है। अगर मैं पॉपकॉर्न खा भी चुका हूं तो भी पॉपकॉर्न खरीदता हूं क्योंकि बिना उसके फिल्म अधूरी प्रतीत होती है हालांकि क्लासिक नमकीन पॉपकॉर्न का अब भी कोई मुकाबला नहीं है, लेकिन आज हर किसी के लिए पॉपकॉर्न के अलग-अलग फ्लेवर हैं। पॉपकॉर्न अब केवल स्नैक नहीं रह गया है बल्कि सिनेमा का प्रतीक बन गया है- यह फिल्म का इतना आवश्यक हिस्सा हो गया है कि बड़ा पर्दा विशेष महसूस होने लगा है। 
पॉपकॉर्न ने सिनेमा में स्टार की तरह प्रवेश नहीं किया था बल्कि उसने बहुत खामोशी के साथ सिनेप्रेमियों के दिल में अपनी जगह बना ली और आखिरकार अब इसे खरीदना सिनेमा का टिकट खरीदने जितना ही लाज़िमी हो गया है। कहने का अर्थ यह है कि पॉपकॉर्न जहां फिल्म अनुभव का अभिन्न अंग बन गया है वहीं थिएटरों के लिए आर्थिक इंजन है और दर्शकों के लिए एक एहसास। इसलिए यह आश्चर्य नहीं है कि 2024 में भारतीय पॉपकॉर्न बाज़ार का साइज़ 366.6 मिलियन डॉलर था। सिनेपोलिस थिएटरों में 2025 में 5 मिलियन पॉपकॉर्न टब बिके, जबकि 2022 में इनोक्स थिएटरों में 863 टन पॉपकॉर्न बिका था। 
हमेशा से स्थिति ऐसी नहीं थी। मल्टीप्लेक्स बूम ने मूवी आउटिंग के दौरान पॉपकॉर्न की स्नैक के रूप में बुनियाद रखी। इससे पहले सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघरों में इंटरवल का स्नैक समोसा, आलू चिप्स व कांच की बोतलों में सॉफ्ट ड्रिंक हुआ करता था। दक्षिण भारत के सिनेमाघरों में क्षेत्रीय स्नैक्स जैसे मुरुक्का, मुत्ता बोंदा आदि को प्राथमिकता दी जाती थी। उत्तर भारत के सिनेमाघरों के बाहर छोले भटूरे व छोले कुलचे के भी ठेले लगते थे। आखिरकार हर जगह इंटरवल स्नैक का निर्विवाद राजा पॉपकॉर्न बन गया। 
दरअसल, मल्टीप्लेक्सों ने सिर्फ फिल्में ही नहीं बल्कि पॉपकॉर्न बेचने की भी कला सीख ली यानी पॉपकॉर्न के संदर्भ में असल परिवर्तन मल्टीप्लेक्स के कारण आया। टिकट राजस्व जब बहुत अधिक वितरकों के साथ शेयर होने लगा तो थिएटर लाभ के लिए अन्य स्रोतों को देखने लगे। अपने कम रॉ मटेरियल खर्च और उच्च अनुमानित मूल्य की वजह से पॉपकॉर्न इस आर्थिक समीकरण का केंद्रीय बिंदु बन गया। बकट बड़ी होने लगीं। मक्खन अधिक इस्तेमाल होने लगा। फ्लेवर की संख्या में वृद्धि होने लगी- चीज़, कैरामल, गौर्मेट, स्पाइसी आदि। ज्यादा खर्च कराने के लिए कॉम्बो आने लगे पॉपकॉर्न के साथ सॉफ्ट ड्रिंक। जो कभी सस्ती मक्का की खीलें हुआ करती थीं वह प्रीमियम महंगे पॉपकॉर्न में तब्दील हो गईं। वह मूवी स्नैक ही क्या जिसे शेयर न किया जा सके। इस विचार ने भी पॉपकॉर्न के महत्व में इज़ाफा किया। अक्सर पॉपकॉर्न फिल्म से महंगा पड़ता है, लेकिन इसके बिना ऐसा लगता है जैसे फिल्म देखी ही न हो। 
पॉपकॉर्न का घरों से थिएटरों तक का सफर भी बहुत ़गज़ब का रहा है। शताब्दियों पहले अमरीका के देशज समुदायों ने खोजा कि मक्का के दाने गर्म करने पर वह खिल उठते हैं। इन खिले हुए दानों को घरों में ही खाया जाता था यानी उनका कोई कमर्शियल मूल्य नहीं था, लेकिन फिर आहिस्ता-आहिस्ता सब कुछ बदलने लगा। 19वीं शताब्दी के आखिर तक पॉपकॉर्न मशीनें अमरीका के मेलों व सड़कों पर प्रवेश कर गई थीं और इस सस्ते स्नैक से लोग अपना पेट भर रहे थे। 20वीं शताब्दी के शुरू में पॉपकॉर्न ने सिनेमाघरों में प्रवेश करना शुरू किया- वह हॉलीवुड के शुरुआती वर्ष थे और महामंदी की वजह से लोगों की पॉपकॉर्न में दिलचस्पी बढ़ती गई। दरअसल, महामंदी (1929-1939) के दौरान आर्थिक निर्णय के कारण पॉपकॉर्न की ख्याति में वृद्धि हुई। पॉपकॉर्न का एक बैग इतना सस्ता था कि गरीब परिवार भी उसे खरीद कर महसूस करता था जैसे वह लग्ज़री स्नैक का आनंद ले रहा हो। मूवी थिएटर इस कोशिश में थे कि प्रवेश संख्या व राजस्व बढ़े, इसलिए उन्होंने पॉपकॉर्न को स्नैक के रूप में प्रस्तुत करना शुरू किया। स्ट्रीट वेंडर्स पहले थिएटरों के बाहर पॉपकॉर्न बेचते थे, लेकिन जब मांग बढ़ने लगी तो सिनेमा मालिक मशीन लॉबी के अंदर ले आये, पॉपकॉर्न को मुख्य रियायत के रूप में बदलते हुए और इस प्रकार सिनेमा संस्कृति में पॉपकॉर्न की जगह स्थायी हो गई।  आज अमरीका में यह हाल है कि खास फिल्मों के लिए पॉपकॉर्न की थीम बकेट्स के लिए मूवी थिएटर चेन एक साल पहले ही योजना बनाने लगती हैं। पॉपकॉर्न बकेट्स को फिल्मों के किरदारों जैसा डिज़ाइन किया जाता है। पॉपकॉर्न फोल्डर भी फिल्मों को ध्यान में रखकर तैयार किये जाते हैं।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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