कहानी-प्रतिशोध
(क्रम जोड़ने के लिए पिछला रविवारीय अंक देखें)
सुबोध का नाम सुनते ही माया का गुस्से से कांप जाना डा. महेश समझ नहीं पाये। वे मन ही मन सोचने लगे कि आखिर सुबोध के नाम सुनते ही इसका पारा सातवें आसमान पर क्यों चढ़ गया? ज़रूर कोई न कोई बात है। मुझे इस रहस्य पर से परदा उठाना ही होगा।
यही सोचकर डा. महेश शांत स्वर में बोले- ‘मै ंजानता हूं कि तुम्हारे हृदय में कुछ ऐसी बातें दबी हैं जो तुम्हारे हृदय को कठोर बना देती है। तुम अपने सीने में कोई ऐसे दर्द को को दबा रखी है जो तुम्हें पत्थर दिल बना दिया है। इस सुकोमल सुंदरी का हृदय इतना कठोर क्यों हो गया? कुछ न कुछ राज ज़रूर है? अपने सीने में छुपाये दर्द को बाहर निकाल फेंकों और अपनी नयी ज़िंदगी की शुरूआत करो। मुझे बताओ अपना दर्द। शायद मैं तुम्हारे दर्द को कुछ कम कर सकूं।’
माया बिना कुछ बोले डॉक्टर को एकटक देखती रही। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।
डा. महेश उसके बहते आंसू को पोंछते हुए बोले- ‘मुझे अपना ही समझो। अपने अतीत की बातें बताकर अपने मन को हल्का करो। इससे तुम्हारे मन को ज़रूर सुकून मिलेगा।’
‘डाक्टर! मैं इतनी कठोर नहीं थी। किसी का दर्द नहीं देख सकती थी। मेरे हृदय में भी दया-करूणा का भाव उमड़ता था, लेकिन...।’ और उसके शब्द अधूरे रह गये। उसकी आंखों से फिर आंसू की बूंदें टपकने लगी। डा. महेश उसके बहते आंसू को पोछते हुए बोले- ‘लेकिन क्या?’
‘सुबोध मुझे अपना मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा। उसने मुझे धोखा दिया। वह मेरे जज्बातों से खेला।’ वह बोली।
‘मैं तुम्हारे कहने का मतलब समझ नहीं पाया।’ डा. महेश बोले।
‘सुबोध मेरे साथ ही पढ़ता था। वह मेरा दोस्त होने के साथ-साथ मेरे हर दुख-सुख में साथ निभाता था। फिर धीरे-धीरे यह दोस्ती प्यार में कब बदल गयी कुछ पता ही नहीं चला। उसका अपनापन इस रिश्ते को और अटूट बना दिया। और एक दिन वह सारी हदें को पार कर गया। मैं उसे अपना सब कुछ सौंप चुकी थी। फिर एक दिन वह अचानक मेरी ज़िंदगी से गायब हो गया। उसके आने की प्रतीक्षा में अपनी पलकें बिछाये बैठी रही, लेकिन वह लौटकर नहीं आया। मैं उसके बच्चे की मां बनने वाली थी। परिवार वालों ने इस बच्चे को गिरा देने को कहा, लेकिन मैं अपने प्यार की निशानी को खोना नहीं चाहती थी। मैंने निश्चय कर लिया कि इस बच्चे को जन्म दूंगी। चाहे जो हो जाये। उसने मेरे विश्वास को तोड़ा था। अपने किये वादे को भूल गया। कभी उसने मेरी ओर मुड़कर नहीं देखा। मैं उसे जितना भुलाना चाहती थी वह उतना ही याद आता था। भीतर ही भीतर घुटने लगी। मुझे इंसानों से घृणा होने लगी। मैं प्रतिशोध की अग्नि में जलने लगी। मेरा कोमल हृदय कठोर हो गया। मैने निश्चय कर लिया कि अब किसी पर दया नहीं करूंगी। हर किसी को तड़पाऊंगी, ताकि मेरे दिल में धधकती अग्नि का ठंडक मिल सके।’ इतना कहकर वह अपने रूमाल से चेहरा को छुपाकर रोने लगी।
डा. महेश उसकी बातें सुनकर सन्न रह गये और फिर बोले- ‘सचमुच तुम्हारे साथ गलत हुआ, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हर इंसान तुम्हारा गुनाहगार है। गलती कोई करे और सजा हर किसी को दो। यह कहां का इंसाफ है? यह ठीक बात नहीं है। फिर तुमने कैसे सोच लिया कि सुबोध ने तुम्हें धोखा दिया है? इन सबके पीछे शायद उसकी कोई मजबूरी रही होगी। इंसान समय और परिस्थिति का दास होता है। समय और परिस्थिति इंसान से क्या कुछ नहीं करवा देती? तुम्हें एक बार उसके सच को जानने का प्रयास करना चाहिए था। अब सुबोध का एक बच्ची के अलावा इस दुनिया में है ही कौन?’
‘क्या?’ वह चौंककर बोली।
‘हां, यही सच है। एक बार उससे मिलकर उसके मुंह से सच जान लो। चलो एक बार उससे मिल लो।’ डा. महेश बोले।
‘नहीं, नहीं! मैं उसकी शक्ल भी देखना नहीं चाहती।’ माया बोली।
‘इन सबके पीछे ज़रूर उसकी कोई मजबूरी रही होगी। एक बार मेरी खातिर उससे मिल लो।’ डा. महेश के काफी समझाने के बाद वह उससे मिलने को तैयार हुई।
वार्ड में प्रवेश करते ही उसकी आंखें उसके बेड पर बैठी एक बच्ची से जा टकरायी। उसके पांव वही ठिठक गये।
‘आगे बढ़ो और वास्तविकता को जानो।’ डा. महेश बोले।
माया उसके बेड के पास जाकर खड़ी हो गयी और उसे अपलक नेत्रों से देखने लगी।
(क्रमश:)



