एंटी और जेली
मुगल वन के बीचोंबीच एक बगीचा था। उसके माली ने हर तरह के पेड़ पौधे लगा रखे थे। बगीचा देखने आस पड़ोस के सभी जानवर आते। कोई गुलाब पर, तो कोई गेंदे पर, कोई डेजी पर, तो कोई कमल पर फिदा हुए बिना न रहता। पौधे पूरा दिन आपस में बातें करते थे। एक दिन गुलाब की झाड़ियों में अलग-अलग रंगों के बड़े-बड़े फूल खिले थे।
पूरा बगीचा फूलों और तितलियों से भरा था। सुंदर-सुंदर रंगबिरंगी तितलियां इधर उधर उड़ रहीं थीं।
एंटी तितली बहुत खुश थी। वह विभिन्न फूलों का रस पी कर मस्ती में उड़ती फिर रही थी।
‘वाह, कितनी सुंदर तितली है,’ किसी ने कहा। अपनी प्रशंसा सुन कर एंटी का सीना तन गया और वह मस्ती में इठलाती हुई कभी इधर तो कभी उधर गोते लगाने लगी। इतने में एंटी ने नीचे की ओर देखा। जेली चींटी कीचड़ में सना अनाज का एक दाना लेकर जा रहीं थी।
एंटी ने सोचा, ‘मैं कितनी महान हूं। सुंदर-सुंदर रंगबिरंगे फूलों का मीठा-मीठा रस पीती हूं। इस जेली को देखो। धूल से सने अनाज का दाना ले जा रही है।
एंटी जेली के निकट आई। एक सुंदर फूल पर बैठ कर जेली से कहा, ‘जेली, क्या ले जा रही हो?
‘अनाज का दाना ले जा रही हूं, एंटी,’ जेली बोली। एंटी ने पूछा, ‘इस अनाज के दाने का क्या करोगी?’
‘बहिन, बहुत मेहनत के बाद मुझे यह दाना मिला है।
इस से मेरा और मेरे बच्चों का पेट भरेगा,’ जेली बोली।
एंटी ने कहा, ‘जेली, सभी के मन को लुभाने वाले मेरे पंखों को देख। मैं तो आकाश में उड़ती हूं। रंगबिरंगे फूलों पर विचरती हूं। सुगंधित फूलों का रस पीती हूं जो किसी को भी नहीं मिलता।’
‘हां, तुम तो बहुत सुंदर हो,’ जेली बोली।
एंटी ने मुंह बना कर कहा, ‘तुझे देख कर घृणा हो रही है। एक तो तू मिट्टी में सनी है। यह दाना भी मिट्टी से सना है। इसे तू और तेरे बच्चे खाएंगे।
‘ऐसे मत कहो, एंटी। मिट्टी से घृणा मत करो। यह हम सब को पैदा करने वाली है। यह उन फूलों को भी उत्पन्न करने वाली है जिन का मीठामीठा रस तुम पीती हो,’ जेली ने समझाया।
एंटी बोली, ‘तुझ जैसी जमीन पर रेंगने वाली मुझे उपदेश देती है। मैं तो फूलों पर पलती हूं। जहां भी जाती हूं, फूलों का रस पीती हूं। तू अपने को देख। दाने दाने के लिए तरसती है। अपनी दशा देख।
‘मैं जिस स्थिति में हूंए खुश हूं लेकिन दूसरों की बुरी दशा देख कर हंसना ठीक नहीं,’ जेली ने शांत भाव से कहा।
‘अरे जा अपना काम कर। मुझे उपदेश मत दे। जाए अपने जैसे लोगों को पाठ पढ़ा,’ एंटी ने ऐसा कह, जेली की उपेक्षा कर दी।
उसी जगह पर कई बार एंटी और जेली मिलीं। एंटी इसी तरह से व्यंग्यपूर्ण बातें करती। जेली चुपचाप सहन कर लेती।
एक दिन तेज हवा का ऐसा झोंका आया कि फूलों पर मंडरराती एंटी गुलाब की एक कांटेदार टहनी से जा टकराई। उसके दोनों पंख कांटों से घायल हो गए और वह जमीन पर गिर पड़ी।
जमीन वर्षा के कारण गीली थी। एंटी की छोटी-छोटी टांगें कीचड़ में फंस गई। वह दर्द के कारण कराहने लगी।
किसी ने भी उस की दुख भरी आवाज नहीं सुनी। उसने अपनी सहेली तितलियों को आवाज दी पर किसी ने उसकी सहायता में दिलचस्पी नहीं ली।
उसी समय जेली अनाज का दाना लेकर जा रही थी। एंटी उसे देख कर, अपना मुंह छिपाने लगी।
जेली दाना फेंक कर तेजी से एंटी के पास आई। बोली, ‘एंटी, तुम इस हालत में हो। चिंता मत करो। मैं दुख में तुम्हारा साथ ज़रूर दूंगी।’
एंटी बोली, ‘जेली, मुझे आज पता चला कि तू कितनी महान है।’
जेली ने अपनी पूरी ताकत लगा कर एंटी की टांगों को कीचड़ से बाहर निकाला। फिर उसे एक सुरक्षित जगह पर ले गई।
जब तक एंटी के पंख ठीक नहीं हुए, तब तक जेली उसकी सेवा करती रही। उसके लिए खाना ढूंढ कर लाती रही। वह छोटे-छोटे फूलों को खींच कर लाती ताकि एंटी उसका रस चूस कर अपनी भूख मिटा सके।
जब एंटी ठीक हो गई, तब उसने जेली से कहा, ‘जेली, तुम महान हो। मैं ने घमंड के कारण जो कुछ कहा, उसके लिए मुझे क्षमा कर दो। तुम ने मुझे एक नया जीवन दिया है। जब भी तुम को मेरी आवश्यकता पड़े तो अवश्य याद कर लेना।’ यह कह कर एंटी ने जेली के सामने सिर झुकायाए फिर धीरे से उड़ गई।
(उर्वशी)



