बजट सत्र के दूसरे चरण में आमजन के मुद्दों पर चर्चा हो
भारत के बजट सत्र का प्रथम चरण सम्पन्न हुआ। धरने हुए, प्रदर्शन हुए, संसद के अंदर भी संसदीय मर्यादाओं की धज्जियां उड़ाई गईं। संसद में काम के घंटे चाहे आधे-अधूरे रहे, बहुत-सा समय विरोध और वाकआउट में चला गया पर जनता का पैसा बर्बाद हो गया। यह सरकारी आंकड़े हैं कि संसद के एक घंटे का खर्च 75 लाख रुपये है। सदस्यों को प्रतिदिन की मीटिंग के लिए पच्चीस सौ रुपये भत्ता मिलता है और अपने संसदीय क्षेत्र में अवकाश के दिनों में जाने आने के लिए वायुयान की सुविधा भी रहती है तथा अन्य कई तरह के भत्ते, सुविधाएं सांसदों को मिलती है। जनता अपने प्रतिनिधि चुनकर संसद में भेजती है। जनता यह आशा रखती है कि वहां पर आमजन के कष्टों, कठिनाइयों तथा आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखा जाएगा, परन्तु ऐसा देखने को नहीं मिलता। सत्तापक्ष और विपक्ष आरोप प्रत्यारोप में लगे रहते हैं।
भारत सरकार ने संसद में यह जानकारी दी है कि सड़क के गड्ढों में पांच साल में पूरे देश में 9438 लोगों की जान गई है, जिसमें से केवल पंजाब में 414 हैं। जो राष्ट्रीय राजमार्ग है उनका प्रबंधन, उसकी संभाल भारत सरकार का काम है। राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण बड़े-बड़े टोल पलाज़ा बनाता है और लोगों से मोटी रकम वसूलता है, परन्तु आज तक यह तय नहीं हो सका कि जो लोग राष्ट्रीय राजमार्ग के गड्ढों में या टूटी-फूटी सड़कों के कारण मौत के मुंह में चले गए, उनके परिवारों को क्या राहत दी गई या दी जाएगी। विधानसभाओं और संसद में आम जन की चिंता बिल्कुल नहीं होती।
सड़कों के बीचों बीच बने गड्ढे, बेसहारा जानवरों का कहर, कुत्तों द्वारा काटे जाने वाले लाखों लोग किसी की चिंता का विषय नहीं। सभी जागरूक नागरिक जानते होंगे कि पिछले वर्ष 37 लाख से ज्यादा लोगों को कुत्तों ने काटा। आज तक सरकारों में यह हिम्मत नहीं यह बताने की कि इनमें से कितने लोगों का इलाज सरकारी खर्च से हुआ। पिछले दिनों भारत के सुप्रीम कोर्ट ने कुत्तों से राहत दिलवाने के लिए कुछ आदेश दिए, पर देशवासी प्रतीक्षा करते रहे कि भारत सरकार संसद में या विरोधी पक्ष संसद में इस विषय पर कोई चिंता करेगा। जनता को कोई समाधान देगा, पर कोई चर्चा ही नहीं हुई। आज की सारी राजनीति सड़कों पर धरने लगानेए पुतले जलाने और अब नई बात बैंड बाजा बजाने तक आ गई है। भारत की जनता तरस गई कि संसद से कोई आवाज़ आएगी कि महंगी रोटी कब आम आम आदमी की पहुंच तक जाएगी। सरकारें सोचती हैं कि शायद अस्सी करोड़ लोगों को मुफ्त राशन देने से गरीबी दूर हो गई, लेकिन सच यह है कि आज भी हिंदुस्तान के रेहड़ी वाले, छाबड़ी वाले, दैनिक मज़दूरी करने वाले, मजदूरी न मिले तो भूखे मरने वाले, फुटपाथ पर सोने वाले करोड़ों लोग हैं। क्या कभी किसी देश प्रदेश की सरकार ने मानव अधिकार आयोग ने लेबर कमिश्नर या मंत्री जी ने यह जानकारी ली कि पूरे देश में या उनके राज्य में कितने ऐसे लोग हैं जिनको परिवार का पालन पोषण करने के लिए बारह घंटे काम करके भी 300 रुपया प्रतिदिन नहीं मिलता। इस 300 रुपये के साथ उनका आटा नमक ही पूरा नहीं होता, लेकिन बढ़िया भोजन का आनंद लेने वाले संसद या विधानसभा में काम करें या न करें, पूरा भत्ता, टीए, डीए पाने वाले उनके जनप्रतिनिधियों को उनकी चिंता नहीं अन्यथा अगर संसद में कोई विरोध ही करना होता तो इस बात पर करते कि सब कर्मचारियों को सरकारी, गैर-सरकारी आउटसोर्सिंग में पिसने वाले इतना वेतन तो पा लें जिससे वे अपने परिवार की रोटी ससम्मान चला सकें। अगर कोई सरकार अच्छा काम करे तो विरोधियों ने उसकी प्रशंसा करनी नहीं होती और उस सुविधा को जन जन तक पहुंचाने में सहयोग भी नहीं करना होता। सरकारों को भी यह देखना होगा कि वे स्वास्थ्य कार्ड तो जारी कर देंगे पर क्या अस्पतालों में उनको पूरी सुविधा मिल रही है और विशेषकर अस्पतालों के प्रबंधकों, डाक्टरों को भी यी प्रण लेना होगा कि जो रोगी सरकारी कार्ड के आधार पर उपचार के लिए आए उसको उपचार दिया जाए और सरकार को भी चाहिए कि सभी अस्पतालों को समय पर मरीज़ों पर खर्च किए धन का भुगतान करे अन्यथा यह भी आयुष्मान की तरह किसी खटाई में पड़ जाएगा।
अब बजट सत्र का प्रथम चरण पूर्ण हो गया यद्यपि उसमें से हमें मिला कुछ नहीं। संसदीय कार्य मंत्री रिजीजू का यह वक्तव्य एकदम सत्य है कि सरकार विरोधी पक्ष को अपने-अपने क्षेत्र की कठिनाइयां, आवश्यकताएं रखने का अवसर देना चाहती है। अगर वातावरण सौहार्दपूर्ण नहीं बनता तो बजट तो पास हो ही जाएगा, क्योंकि सरकार के पास पूरा बहुमत है। अब जो मतदाता हैं उन्हें अपने-अपने जनप्रतिनिधि, सांसद, विधायक से कहना है कि संसद या विधानसभा में जाकर एक दूसरी पार्टी की बिना वजह आलोचना करने में समय न गंवाएं, बल्कि जनता को कुछ राहत देने के लिए, उनका जीवन स्तर ऊंचा उठाने के लिए काम करें। देश यह आशा रखता है कि बजट सत्र का दूसरे चरण में पूरा समय काम होगा और सांसद में विरोधी और सत्ता पक्ष आपस में नहीं उलझेंगे।



