कहानी- भेड़िया
(क्रम जोड़ने के लिए पिछला रविवारीय अंक देखें)
सुबह से ही घर में काफी चहल-पहल थी। शायद कहीं टूर पर जाने का प्रोग्राम बन चुका था। राजेश के चमचों की उपस्थिति देखकर तो यही कहा जा सकता था। बाद में पता चला कि उसे मुख्यमंत्री जी का बुलावा आया है और वह दो-चार दिन के लिए शहर से बाहर रहेगा। सारी तामझाम के बाद उसका काफिला रवाना हुआ। जाने से पहले उसने कांता के कमरे में प्रवेश करते हुए कहा कि वह दो-चार दिन के लिए बाहर जा रहा है। उसकी अनुपस्थिति में शेरु का ध्यान रखना। उसको समय पर खिलाया-पिलाया करना। उसके रख-रखाव में किसी भी प्रकार की कमी नहीं रहनी चाहिए।
कांता के मन में आया कि पलटकर जवाब देना चाहिए और यह पूछना चाहिए कि एक हिंसक पशु की इतनी ज्यादा चिंता करने के बजाय उसे अपने बेटा-बेटी की भी तो सुध लेनी चाहिए। उसे इस बात की तनिक भी चिंता नहीं है कि वे कहां है और कब घर लौटेगें? लेकिन नहीं, केवल उसे तो सिर्फ फिक्र है बस शेरु की। मन में उमड़ते-घुमड़ते सवाल होंठों तक आकर रुक जाते। वह हिम्मत नहीं जुटा पायी थी कि पलटकर जवाब दे दे। इससे पहले भी उसने इस बात का जिक्र किया था तो उसने टका सा जवाब देते हुए कहा था कि बेचारे अभी बच्चे हैं, उम्र के कच्चे हैं। यही तो दिन है उनके खाने-खेलने के। एक मंत्री के बेटा-बेटी को किस तरह से रहना...घूमना...फिरना चाहिए, तुम देहाती औरत क्या समझोगी। आ जाएंगे, जहां भी गए होंगे, तुम्हें चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं है। उसकी सपाटबयानी सुनकर हक्का-बक्का रह गई थी वह चुप रहने के अलावा और कर भी क्या सकती थी बेचारी। एक आंधी सी गुजरने लगी थी उसके भीतर।
शेरु के लिए एक आदमी अलग से तैनात कर रखा था राजेश ने। वह ही उसे नहलाता-धुलाता, खिलाता-पिलाता और घुमाने ले जाता। घुट्टा शेरु कभी बकरी पर हमला कर देता तो कभी मुर्गियों के बाड़े में घुस कर दो-चार मुर्गियां चट कर जाता। उसकी इस हरकतों से परेशान होकर उसके गले में एक मोटी सी जंजीर बांध दी गई थी। जीभ लपलपता शेरु जब दड़बे से बाहर लाया जाता, तो संभाले नहीं संभलता था। वह उसे खींचकर संभालने की कोशिश करता, लेकिन शेरु उसे घसीटता हुआ दूर तक चला जाता था। कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि उसने जंजीर तोड़कर भाग जाने की कोशिश भी की थी।
एक सुबह शेरु के अटैंडेंट ने उसे बाहर घुमाने के लिए दड़बे के बाहर निकाला। गुर्राहट के साथ, जीभ लपलपाता शेरु जैसे ही दरवाजे की चौखट से बाहर निकला, पूरी ताकत के साथ उसने चेन छुड़ा ली और जंगल की ओर भाग खड़ा हुआ। अटैंडेंट चिल्लाता रहा, उसे पुकारता रहा लेकिन उसने पलट कर नहीं देखा। जब शेरु उसकी पकड़ से बाहर हो गया तो उसने कांता से अपना दुखड़ा रोते हुए उसके भाग जाने की सूचना दी। कांता जानती थी कि राजेश लौटने के बाद पहले शेरु के बारे में ही पूछताछ करेगा। जब उसे यह सुनने को मिलेगा कि उसका प्रिय पात्र शेरु भाग गया है, तो उस पर कितना जुल्म ढाया जाएगा, जिसकी कल्पना मात्र से उसके शरीर में सिहरन होने लगी थी। दिल बैठने लगा था। उसने अटैंडेंट को आज्ञा दी कि वह उसकी खोजबीन में तत्काल निकल जाए।
दो दिन की खोज-खबर के बाद भी शेरु पकड़ा नहीं गया था। राजेश घर लौट रहा है, इस बात की खबर उसे मिल गई थी। यदि इस बीच शेरु पकड़ा नहीं गया तो वह क्या जवाब देगी? इस चिंता में उसका दिल बैठा जा रहा था। उसने अपने नौकरों को आज्ञा दी के वे अपने साथ जाल साथ लेकर जायें। साथ ही उसने सक्त हिदायत भी दी कि उसे हर हाल में पकड़कर ले आना है।
बाहर गेट पर हो-हल्ला सुनकर वह बाहर निकली, उसने देखा। रस्सी के जाल में बंधा शेरु, जिसे एक लट्ठ के सहारे दो आदमी टांगकर अन्दर आ रहे है और उनके पीछे पच्चीसों लोगों की भीड़ भी चली आ रही है। शेरु मिल गया, यह जानकर उसने राहत की सांस ली लेकिन अटैंडेंट को देखते ही सारा माजरा उसकी समझ में आ गया कि शेरु ने उस पर भयानक तरीके से हमला किया होगा जिससे उसके कपड़े जगह-जगह से फटे हुए थे और खून रिसकर उसके पूरे कपड़ों में फैल रहा था। वह बुरी तरह से जख्मी हो गया था और थर-थर कांप भी रहा था। उसे तत्काल मैडीकल ऐड दिए जाने की ज़रुरत है। अगर समय पर ऐसा नहीं किया गया तो उस बेचारे की जान भी जा सकती है। उसने आगे बढ़कर मैडीकल कॉलेज के डॉक्टर को फोन किया और तत्काल एम्बुलेंस भेजने का अनुरोध किया।
जाल में फंसा शेरु पूरी ताकत के साथ जोर लगाकर आजाद होना चाहता था। पूरी जोर अजमाईश के साथ वह बुरी-बुरी आवाज निकालते हुए जोरों से गुर्रा रहा था। कोई भी आदमी उसके पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। शायद कोई ऐसा कर पाता तो निश्चित ही वह उसके चिथड़े मचा देता।
कांता के मन में खलबली मची थी कि ऐसी विकट परिस्थिति में उसे क्या करना चाहिए? एक मन हुआ कि इसे तत्काल गोली मार दी जानी चाहिए। यदि वह ऐसा कर सकी तो निश्चित ही एक भेड़िए से छुटकारा पाया जा सकता है, जो उसकी जान का दुश्मन बना बैठा है। परिणाम से भी वह वाकिफ थी कि इसका अन्जाम क्या हो सकता है। उसका मन घड़ी के पेण्डुलम की तरह दोलायमान हो रहा था- वह निर्णय नहीं ले पा रही थी कि उसे क्या करना चाहिए।
दोलायमान होते मन को उसने किसी तरह काबू में किया और निर्णय लिया कि शेरु के अभी तत्काल गोली मार देनी चाहिए।
निर्णय लेने के साथ ही उसने अपने कमरे में टंगी रिवाल्वर उठा लायी और धड़कते दिल से फायर कर दिया। एक के बाद एक उसने तीन गोलियां उसके जिस्म में उतार दी। गोली लगने के साथ ही वह जाल सहित काफी ऊपर तक उछला, जोरों से गुर्राया और निर्जीव होकर धरती पर आ गिरा।
उसके धरती पर गिरने के साथ ही राजेश ने प्रवेश किया। आंगन में जमा भीड़ देखकर सारा माजरा उसकी समझ में आ गया था कि उसका शेरु मारा गया है। कभी वह आंखें तरेर कर अपने मरे हुए शेरु को देखता तो कभी साक्षात दुर्गा बनी कांता को। देर तक घूरते रहने के बाद वह भारी कदमों से चलता हुआ बंगले में घुस गया। कांता के मन में अपरिमेय संतोष उतर आया था कि उसने अपने जीवन को नरक बना देने वाले एक भेड़िए को तो मार गिराया है और अब उसे यह देखना है कि दूसरा भेड़िया उसके साथ किस तरह का व्यवहार करता है? (सुमन सागर)
(समाप्त)



