असफल फिल्मों के सफल गीतकार असद भोपाली 

फाज़ली ब्रदर्स फिल्म ‘दुनिया’ बना रहे थे, दो गाने लिखे जा चुके थे और उनकी शूटिंग भी हो चुकी थी, लेकिन फिल्म बीच में ही छोड़कर गीतकार आरज़ू लखनवी नव-निर्मित देश पाकिस्तान पलायन कर गये। यह 1949 की बात है। ़फाज़ली भाइयों को अपनी फिल्म पूरी करने के लिए नये गीतकार की तलाश थी। उन्होंने अपनी इच्छा अपने व्यापारी दोस्त सुगम कपाड़िया से व्यक्त की, जिनके भोपाल में भी अनेक सिनेमाघर थे। सुगम ने ़फाज़ली भाइयों से कहा कि भोपाल में काफी अच्छे शायर मौजूद हैं, उनमें से किसी एक का चयन किया जा सकता है। लिहाज़ा नया गीतकार खोजने के लिए सुगम ने 5 मई 1948 को अपने भोपाल टाकीज़ में एक मुशायरे का आयोजन किया। एक 28 वर्षीय शायर ने जब पढ़ा- ‘इतना तो बता जाओ खफा होने से पहले/वो क्या करें जो तुम से खफा हो नहीं सकते,’ तो ़फाज़ली भाइयों के होश उड़ गये, उनकी तलाश मुकम्मल हो चुकी थी। यह शायर असद भोपाली थे। उन्हें बॉम्बे (अब मुंबई) आकर फिल्मों में गीत लिखने का ऑफर दिया गया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया और वह 18 मई 1949 को बॉम्बे आ गये। 
असद भोपाली ने ़फाज़ली ब्रदर्स की फिल्म ‘दुनिया’ के लिए दो गीत लिखे- ‘रोना है चुपके चुपके’ (जिसे मुहम्मद रफी ने गाया) और ‘अरमान लुटे, दिल टूट गया’ (जिसे सुरैय्या ने अपनी आवाज़ दी थी)। इसके अगले वर्ष उन्होंने कई फिल्मों के लिए गीत लिखे, जिन्हें लता मंगेशकर व शमशाद बेगम ने गाया था। लेकिन असद भोपाली को बड़ा ब्रेक बीआर चोपड़ा की फिल्म ‘अफसाना’ (1951) से मिला, जिसके लिए उन्होंने पांच गाने लिखे और उनके फिल्मी सफर ने गति पकड़ ली; वह स्थापित गीतकार बन गये। हालांकि गुलज़ार व सैबल चैटर्जी द्वारा संपादित ‘एनसाइकलोपीडिया ऑ़फ हिंदी सिनेमा’ में असद भोपाली को उन चंद व्यक्तियों की सूची में शामिल किया गया है, जिन्होंने हिंदी की फिल्मों में बतौर गीतकार ज़बरदस्त योगदान दिया है, फिर असद भोपाली के कलम से बेशुमार कालजयी गीत भी निकले हैं, जो आज तक लोगों की ज़बान पर हैं, जैसे ‘वो जब याद आये, बहुत याद आये’, ‘हंसता हुआ नूरानी चेहरा’ आदि, लेकिन वह कभी भी फिल्मोद्योग में वह मकाम हासिल नहीं कर सके जहां साहिर लुधियानवी, मजरुह सुल्तानपुरी, राजेंद्र कृष्ण, शैलेंद्र, शकील बदायुनी व हसरत जयपुरी पहुंचे। इसकी वजह को एक घटना से समझा जा सकता है। 
निर्माता सर्वजीत 1974 में एक फिल्म ‘फ्री लव’ बना रहे थे, जिसका संगीत लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जोड़ी दे रही थी। इस फिल्म में एक गीत की सिचुएशन ऐसी थी कि नायिका योगिता बाली को शराब के नशे में चूर होकर पार्टी में अपनी मन:स्थिति को व्यक्त करना था। इस सिचुएशन के लिए असद भोपाली ने एक ़गज़ल लिखी, जिससे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल सहमत न थे। उन्होंने निर्माता से कहा कि इस सिचुएशन में अगर ़गज़ल गायी जायेगी तो फिल्म डूब जायेगी, लेकिन सर्वजीत को ़गज़ल इतनी पसंद आयी थी कि उन्होंने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल पर उसे संगीतबद्ध करने का दबाव बनाया। निर्माता के आग्रह को संगीतकार जोड़ी ठुकराने की स्थिति में नहीं थी, लिहाज़ा लता मंगेशकर की आवाज़ में ़गज़ल को रिकॉर्ड किया गया, जोकि यह थी- ‘हम कशमकश-ए-़गम से गुज़र क्यों नहीं जाते/मरना तो बहरहाल है मर क्यों नहीं जाते।’ यह ़गज़ल तो कालजयी बन गई, लता मंगेशकर के सर्वश्रेष्ठ गीतों की फेहरिस्त में शामिल है और आज तक लोगों की ज़बान पर भी है, लेकिन फिल्म डूब गई, कोई उसका नामलेवा भी नहीं है। दूसरे शब्दों में ़गज़ल सफल हो गई, फिल्म नहीं चली। 
असद भोपाली ने 100 से अधिक फिल्मों में गीत लिखे, लेकिन उनके साथ अधिकतर यही हुआ कि उनके गीत तो हमेशा कामयाब रहे मगर फिल्में अक्सर सफल न हो सकीं, बी-ग्रेड होने की वजह से, इसलिए उन्हें कभी साहिर या मजरुह की श्रेणी में नहीं रखा गया। आप गौर कीजिये- ‘ए मेरे दिले-नादां’, ‘हम तुम से जुदा होके मर जायेंगे रो रो के’, ‘वो जब याद आये बहुत याद आये’, ‘सौ बार जन्म लेंगे, सौ बार फना होंगे’, ‘दिल का सूना सा तराना ढूंढेगा’ आदि कालजयी गीत तो आप आज भी सुनते हैं, लेकिन क्या आपको मालूम है कि इन गीतों का किन फिल्मों से संबंध है? शायद नहीं। असद भोपाली के साथ यही त्रासदी रही। अन्य स्थापित गीतकारों की तुलना में उन्हें हाई-एंड फिल्मों में लिखने का अवसर कम ही मिला, लेकिन लो-ग्रेड फिल्मों में भी उन्होंने अपने कलम की छाप ज़बरदस्त छोड़ी। उनके अधिकतर गीतों को उषा खन्ना ने अपने संगीत से सजाया। 
बहरहाल, जब 1989 में असद भोपाली ने म्यूजिकल हिट ‘मैंने प्यार किया’ के लिए गीत लिखे तो वह इस फिल्म की कामयाबी का कुछ खास आनंद न उठा सके; क्योंकि उन्हें फालिज का भयंकर अटैक पड़ा और उनका परिवार उन्हें वापस भोपाल ले गया। इस फिल्म के गीत ‘दिल दीवाना’ के लिए असद भोपाली को फिल्मफेयर अवार्ड से सम्मानित किया गया, लेकिन अपनी बीमारी की वजह से वह स्वयं इस पुरस्कार को न ले सके। असद भोपाली का जन्म असदुल्लाह खान के रूप में 10 जुलाई 1921 को भोपाल में हुआ था, जहां उनके पिता मुंशी अहमद खान अरबी व फारसी के अध्यापक थे। असद भोपाली का निधन भोपाल में ही 9 जून 1990 को हुआ। असद भोपाली ने दो बार शादी की, उनके पुत्र ़गालिब असद भोपाली भी लेखक व गीतकार हैं, जिन्होंने ‘भिन्डी बाज़ार’, ‘मुंबई मिरर’ आदि फिल्में लिखी हैं। असद भोपाली के छोटे भाई कमर जमाली भी शायर हैं। मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी ने 1995 में असद भोपाली के काव्य संकलन ‘रोशनी, धूप, चांदनी’ को प्रकाशित किया। 
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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