बड़े साहब की कुर्सी पर सफेद तौलिया क्यों होता है ?
‘दीदी, आप किसी सरकारी दफ्तर के अंदर कभी गई हैं?’
‘हां, बहुत बार। लेकिन यह सवाल अचानक क्यों?’
‘वहां आपने किसी बड़े अधिकारी के कमरे में कोई खास बात नोट की है?’
‘मुझे तो सब सामान्य सरकारी कमरे ही लगते हैं, कुछ विशेष तो नहीं।’
‘मेरा मतलब बड़े सरकारी अधिकारी की कुर्सी से है।’
‘वह तो सफेद तौलिये से ढकी रहती है और उस पर ही अधिकारी बैठता है।’
‘मैं यही जानना चाहता हूं कि बड़े साहब की कुर्सी पर सफेद तौलिया क्यों होता है?’
‘यह लम्बे समय से चली आ रही एक प्रशासनिक परम्परा है, जिसकी जड़ें ब्रिटिशकाल तक जाती हैं।’
‘लेकिन यह परम्परा क्यों है?’
‘दरअसल, सफेद तौलिये की शुरुआत पूर्णत: व्यवहारिक कारणों से हुई। उस समय दफ्तरों में एयर कंडीशनिंग जैसी सुविधाएं नहीं थीं और भारत के गर्म वातावरण में अधिकारी पसीने से तर दफ्तर पहुंचते थे। यात्रा भी घोड़ागाड़ी से, रेल से या पैदल ही होती थी। ऐसे में कुर्सी पर रखा सफेद तौलिया हाइजीन का साधन बन गया। अधिकारी तौलिये से अपना चेहरा व हाथ साफ कर सकते थे और साथ ही तौलिया कुर्सी को पसीने, धूल व बालों में लगे तेल से बचाता था। फर्नीचर को साफ रखना भी ज़रूरी था क्योंकि उस समय लकड़ी की कुर्सियां महंगी होती थीं। ऐसे में तौलिया एक आसान व सस्ता उपाय था, जिसे रोज़ बदला व धोया जा सकता था।’
‘लेकिन यह प्रैक्टिकल ज़रूरत, ‘स्टेटस सिंबल’ में कैसे बदल गई?’
‘ब्रिटिश काल में नौकरशाही में पद व प्रतिष्ठा को दिखाने के अनेक प्रतीक प्रयोग किये जाते थे- किसका कमरा कितना बड़ा है, किसकी कुर्सी कैसी है, कौन दरवाज़े के कितने करीब बैठा है और साथ ही सफेद तौलिया भी वरिष्ठता का प्रतीक बन गया कि सीनियर अधिकारी की कुर्सी पर साफ-सुथरा सफेद तौलिया रखा जाता और आम कर्मचारियों व पब्लिक की कुर्सियां बिना कपड़े के होतीं। इस तरह सफेद तौलिया सुविधा के साथ स्टेटस सिंबल भी बन गया।’
‘सफेद तौलिया तो आज भी दफ्तरों की शान बना हुआ है, जबकि डिजिटल युग में काम करने के सभी तौर तरीके बदल गये हैं और तौलिये का रंग सफेद ही क्यों?’
‘नौकरशाह अपनी आदतें कहां बदलते हैं, खासकर जब बात स्टेटस सिंबल की हो। सफेद रंग सादगी, साफ-सफाई व औपचारिकता का प्रतीक है। सफेद पर गंदगी भी तुरंत नज़र आ जाती है।’
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर

