परमाणु शस्त्रीकरण : बारूद के ढेर पर दुनिया
क्या दुनिया बारूद के ढेर पर खड़ी हो गई है? क्या तमाम विज्ञान की तरक्की तबाही का सामान जुटाने के लिए है? अब तो दुनिया के ताकतवर देशों ने कथित सामरिक संतुलन की आड़ में परमाणु हथियारों समेत इतना गोला-बारूद का इतना ज़खीरा जुटा लिया है, जो दुनिया का तीन बार खात्मा करने के लिए पर्याप्त है। यह समूची मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। आखिर इंसान तरक्की के नाम पर हथियारों और विनाश की दौड़ क्यों लगा रहा है? क्या दुनिया का भविष्य परमाणु हथियारों के साए में गिरवी रखा जा रहा है? ऐसे सभ्यता, संस्कृति, मानवता, शांति और सहयोग की बातें बड़े-बड़े अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर बेमानी लगती हैं।
वर्तमान में वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और संघर्षों के कारण परमाणु युद्ध का खतरा शीत युद्ध के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में॒ इजरायल-ईरान तनाव और चीन-अमेरिका के बीच सामंती होड़ ने दुनिया को एक खतरनाक मोड़ पर ला खड़ा कर दिया है। रूस द्वारा अपनी रणनीतिक परमाणु शक्ति को उच्च सतर्कता पर रखना और पश्चिमी देशों को परमाणु धमकी देना इस खतरे का मुख्य कारण है।
उधर इज़रायल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष जैसे 2026 में डिमोना परमाणु केंद्र के पास मिसाइल हमले ने सीधे परमाणु टकराव की आशंकाओं को जन्म दिया है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीच्यूट की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार एक परमाणु हथियारों की नई खतरनाक होड़ शुरू हो गई है, क्योंकि पारम्परिक शस्त्र नियंत्रण संधियां कमज़ोर हो रही हैं।
दुनिया में परमाणु हथियारों के फैलाव और आधुनिकीकरण में खतरनाक हद तक बढ़ौतरी हो सकती है तथा इसके लिए विभिन्न देशों द्वारा नई रणनीति बनाई जा रही है। अमरीका और रूस के बीच 50 वर्ष पूर्व परमाणु हथियारों के परिसीमन और उन्हें समाप्त करने सम्बन्धी की गई संधि, जिसे ‘न्यू स्ट्रैटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी’ नाम से पुकारा जाता है, 2021 में 5 वर्ष के लिए बढ़ाने के बाद अब 5 फरवरी को समाप्त हो चुकी है तथा इसे आगे बढ़ाने की दिशा में कोई बात नहीं की जा रही।
हालांकि, यह संधि किए जाने के बाद बहुत-से परमाणु हथियार समाप्त कर दिए गए थे, परन्तु अब नए हालात में अमरीका और रूस भी और परमाणु बम बनाना चाहते हैं। सऊदी अरब और तुर्की भी इसके लिए इच्छुक हैं तथा यूरोप में भी अब यह अहसास बढ़ रहा है कि उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए परमाणु हथियार बनाने चाहिएं। यह बात ध्यान देने योग्य है कि अमरीका अपनी लम्बी दूरी की मिसाइल परीक्षण प्रणाली पर अरबों डॉलर रुपये खर्च कर चुका है, परन्तु इसके बावजूद उसे स्थायी सुरक्षा प्राप्त नहीं हो सकी और अभी तक अमरीका हथियारों के निर्माण और फिर उन्हें समाप्त करने पर करदाताओं के 10 ट्रिलियन डॉलर खर्च कर चुका है। यह इतनी राशि है कि इससे गूगल, एप्पल और माइक्रोसॉफ्ट का ज्यादातर हिस्सा खरीदा जा सकता था।
इस समय स्थिति यह है कि डोनाल्ड ट्रम्प के शासन में अमरीका कोई संधि नहीं करना चाहता और यह बात तो रूस के अनुकूल ही है कि वह परमाणु हथियार बनाए, परन्तु इसमें नुकसान किसकी है? इसका नतीजा पूरी दुनिया को भुगतना पड़ेगा। दरअसल पिछली बार रूस ने जहां परमाणु हथियारों का परीक्षण किया था, उसके आसपास रहने वाले लोगों को वैसी ही समस्याओं से जूझना पड़ा था, जैसी समस्याओं और बीमारियों का सामना चेर्नोबिल परमाणु संयंत्र में लीकेज के समय लोगों को करना पड़ा था।
यदि कोई देश ऐसा करता है तो ऐसी ही समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। वर्तमान में 9 परमाणु हथियार वाले देशों के पास लगभग 12,187 वॉरहेड हैं। इन हथियारों का वितरण और वर्तमान स्थिति इस प्रकार है कि दुनिया के लगभग 90 प्रतिशत परमाणु हथियार केवल दो देशों—रूस लगभग 5,500 और अमरीका लगभग 5,000 हैं। अन्य देशों चीन, फ्रांस, ब्रिटेन, पाकिस्तान, भारत, इज़रायल और उत्तर कोरिया के पास शेष 10 प्रतिशत परमाणु हथियार हैं। चीन तेज़ी से अपने परमाणु हथियारों का ज़खीरा बढ़ा रहा है, जिसके 2030 तक 1,000 से अधिक हो जाने का अनुमान है। 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के पास लगभग 180 और पाकिस्तान के पास 170 परमाणु हथियार होने का अनुमान है। वैश्विक स्तर पर परमाणु हथियारों की कुल संख्या में कमी आ रही है क्योंकि रूस-अमरीका पुराने हथियार नष्ट कर रहे हैं, लेकिन परिचालन में तैनात हथियारों की संख्या बढ़ रही है।
परमाणु हथियारों से सम्पन्न लगभग सभी 9 देश अपने वर्तमान मौजूदा हथियारों को अपग्रेड करने के साथ-साथ इनमें नए एवं अधिक उन्नत संस्करण वाले हथियारों में वृद्धि कर रहे हैं।
इन हालात में ‘ग्लोबल न्यूक्लियर रूल बुक’ कमज़ोर हो रही है और उक्त संधि चुनौतियों का सामना कर रही है। सैन्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य-पूर्व तनाव सहित बढ़ते तनाव के कारण परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का खतरा पिछले एक दशक के दौरान इस समय काफी बढ़ गया है।
आज ए.आई. (कृत्रिम बुद्धिमता) के कारण भी तकनीकी खतरे बढ़ गए हैं और नए हथियारों के हाइपरसोनिक डिलीवरी सिस्टम के इंटीग्रेशन से सैन्य मामलों पर फैसले लेने के लिए उपलब्ध समय कम हो रहा है, जिससे अचानक या तेज़ी से परमाणु हमले का खतरा बढ़ रहा है। ऐसे में इस संधि का नवीकरण न किए जाने की स्थिति में दुनिया में परमाणु हथियारों का खतरा बढ़ रहा है।
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