विश्वास प्रस्ताव
पिछले महीने 24 अप्रैल को पंजाब सरकार को ऐसा झटका लगा था, जिसके प्रभाव से उभर पाना बेहद कठिन प्रतीत होता था। संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के 10 सदस्य थे, जिनमें से 7 सदस्यों ने पार्टी से अलग होने की घोषणा ही नहीं की थी, अपितु उन्होंने भाजपा का दामन भी थाम लिया था। तकनीकी रूप से पार्टी द्वारा उनके विरुद्ध कोई कदम उठा पाना इसलिए कठिन था क्योंकि संविधान के अनुसार उनकी संख्या दो-तिहाई थी, जिस कारण उनके समक्ष किसी अन्य पार्टी में विलय की कोई रुकावट नहीं थी, चाहे इस संबंध में कानूनी विवाद अभी भी बरकरार है।
उस समय जिस तरह का बयान पार्टी से बागी हुए और कभी पार्टी में प्रभावशाली नेता रहे राघव चड्ढा ने दिया था, उससे यह स्पष्ट ज़ाहिर था कि इन सांसदों का विगत लम्बी अवधि से पार्टी को छोड़ने का इरादा था, परन्तु पार्टी के लिए निराशाजनक बात यह भी थी कि बागी हुए राज्यसभा सांसदों ने आम आदमी पार्टी की कट्टर विरोधी भाजपा का दामन थाम लिया था। राघव चड्ढा विगत लम्बी अवधि से पार्टी से नाराज़ चले आ रहे थे। इसलिए राज्यसभा में उन्हें उप-नेता के दिए गए पद से हटाने का भी पार्टी द्वारा फैसला लिया गया था और उनके स्थान पर अन्य सदस्य को यह पद देने की घोषणा की गई थी। शायद पार्टी नेतृत्व को उस समय यह अहसास नहीं था कि उसके खिलाफ भीतर ही भीतर कोई साजिश रची जा रही है। भाजपा के लिए तो यह बात महत्त्वपूर्ण थी कि राज्यसभा में इन सांसदों के आने से उनकी शक्ति में और भी वृद्धि हो सकती है। इससे केन्द्र सरकार को और भी शक्ति मिलती है। आम आदमी पार्टी के लिए और विशेष रूप से पंजाब सरकार के लिए उस समय यह बड़ा झटका ज़रूर था, क्योंकि 7 में से 6 सदस्य पंजाब से चुन कर गए थे, जबकि पंजाब में आप सरकार के शुरुआती दौर में जब इनमें से कुछ एक को चुना गया था तो उस समय भी पार्टी नेतृत्व द्वारा किए गए इनके चयन पर उंगुलियां उठी थीं। यहां तक कहा गया था कि इन पदों के लिए सौदेबाज़ी हुई है, परन्तु इसके अतिरिक्त यह बात भी महत्त्वपूर्ण थी कि ऐसे व्यक्ति, जो पार्टी से संबंधित नहीं हैं, उनकी पार्टी के प्रति कितनी प्रतिबद्धता हो सकती है? उनके चयन में बहुत से और भी कारण शामिल हो सकते हैं, परन्तु प्रतिबद्धता की कमी होने के कारण इन पर विश्वास किया जाना उचित नहीं था, परन्तु जिस तरह उन्होंने इस विश्वास को तोड़ा उससे पार्टी के भीतर इस संबंध में निराशा पैदा होना स्वाभाविक था। विगत दिवस इस झटके से उभरने के लिए पंजाब सरकार और नेताओं द्वारा कई यत्न किए गए। जालन्धर में अपने विधायकों, अन्य पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की बैठक को भी इसी कवायद की एक कड़ी कहा जा सकता है। नि:संदेह इसके बाद यह आशंका भी बढ़ी थी कि आगामी समय में पार्टी के भीतर और इसके विधायकों में भी तोड़-फोड़ हो सकती है। इस संबंध में अफवाहों का बाज़ार भी लगातार गर्म रहा था।
पार्टी को इस स्थिति से उभारने के लिए शीघ्र ही विधानसभा का एक दिवसीय सत्र बुलाकर और उसमें विश्वास प्रस्ताव पारित करवाकर यह प्रभाव दिया गया है कि पार्टी पूरी मज़बूती से अपने पांवों पर खड़ी है और आगामी चुनावों के लिए भी पूरी तरह तैयार है। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने विश्वास प्रस्ताव पर सम्बोधित करते हुए स्पष्ट शब्दों में यह कहा है कि यह अफवाहें ही थीं कि आप सरकार का सफाया हो जाएगा और उसके विधायक पार्टी बदल लेंगे। लोगों के मन से यह भ्रम निकालने के लिए ही ऐसा प्रस्ताव पेश किया गया। विधानसभा में ‘आप’ के विधायक बड़ी संख्या में उपस्थित थे। इसलिए ऐसे समय में जब चुनाव को मात्र 10 महीने का समय रह गया है, विधायकों द्वारा पार्टी बदलना कठिन ही दिखाई देता है। फिर भी शेष समय में सत्तारूढ़ पार्टी को बेहद सतर्क रहना पड़ेगा, क्योंकि अन्य पार्टियों ने भी चुनावों को मुख्य रख कर मैदान में उतरने के लिए अपनी सक्रियता दिखानी शुरू कर दी है। उनसे भी सत्तारूढ़ पार्टी को निपटना पड़ेगा।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

