इज़रायल के आयरन डोम से बेहतर होगा भारत का सुदर्शन चक्र
बीते सप्ताह उत्तरी चीन के शानक्सी प्रांत स्थित ताइयुआन सैटेलाइट लॉन्च सेंटर से चीन ने अपने रॉकेट के जरिए पाकिस्तान निर्मित रिमोट सेंसिंग, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सैटेलाइट को प्रक्षेपित कर कक्षा में सफलता पूर्वक स्थापित कर दिया। अंतरिक्ष में ऐसे उपग्रह भेजना सामान्य बात है लेकिन इस साधारण उपग्रह प्रक्षेपण ने हमें याद दिलाया कि कैसे पाकिस्तान एयर स्पेस डिफेंस कमांड के संगठनात्मक ढांचे के निर्माण और उसको सुसंगत तरीके से लागू करने में हमसे आगे निकल गया और अब वह उस स्पेस-आधारित रिमोट सेंसिंग क्षमता को भी मजबूत करने में तत्परता दिखा रहा है, जिसका इस्तेमाल भारतीय सेना की गतिविधियों और क्षमता पर निगाह रखने में करेगा। सवाल यह है कि चीनी मदद से पाकिस्तान की इस तूफानी बढ़त के जवाब में हमारे महत्वाकांक्षी मिशन सुदर्शन चक्र का निर्माण घोषणा के बाद शुरुआती स्तर तक और सुस्त क्यों है? जिस परियोजना का लक्ष्य 2035 तक पूर्ण रूप से स्वदेशी और ऐसा एकीकृत एयर डिफेंस सिस्टम तैयार करना हो जो ढाल भी हो और तलवार भी, साथ ही प्रतिरोधक या डिटरेंस के भी काम आये।
जो ‘आयरन डोम’ से बहुत आगे की चीज है, जिसमें अमरीका के गोल्डन डोम और रूस के तुंद्रा सिस्टम दोनों की मिली जुली खासियत होगी और चीन व पाकिस्तान की सीमा पर हवाई खतरों को रोकने में गेम चेंजर साबित होगा, जिसका एक हिस्सा स्पेस बेस्ड सर्विलांस फेज-3 अंतरिक्ष से दुश्मन की हर हरकत पर नज़र रखने के लिए जमीनी रडार के साथ एकीकृत करके एक मजबूत सुरक्षा कवच बनेगा और जिसके बिना हम अंतरिक्षीय युद्ध में एक तरह से दृष्टिहीन बने रहेंगे। जिस मिशन सुदर्शन चक्र को भारत के अपने हाईटेक एयर डिफेंस अंब्रेला के तौर पर देखा जा रहा है, जो दुश्मन की मिसाइलों, ड्रोन और एयरक्राफ्ट को गंभीर खतरा पैदा करने से पहले ही खत्म कर देगा, ऐसे महत्वपूर्ण मिशन के प्रति इतना ढीलापन क्यों? आखिर इसके लिये कई तरह के रडारों की स्थापना और 52 से ज्यादा उपग्रहों के प्रक्षेपण के साथ स्वदेशी वायु रक्षा प्रणाली कुशा एवं रूसी एयर डिफेंस सिस्टम एस-400 के साथ इसका इंट्रीग्रेशन के अलावा कुछ अन्य तकनीकी व्यवस्था और प्रबंध करने की प्रगति धीमी क्यों है? 52 उपग्रहों में एक भी लांच क्यों नहीं हुआ, आखिर हमारे स्पेस इकोसिस्टम को सक्त्रिय करने के लिए क्या करना होगा?
मिशन सुदर्शन चक्र का आधार है स्पेस एयर डिफेंस कमांड। यह थियेटर कमांड कब तक तैयार होगा? सवाल और चिंताएं वाजिब हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि सरकार और सेना आसन्न चुनौतियों, खतरों और अपने दायित्वों से आगाह नहीं या वह फिर हाथ पर हाथ धरे बैठी है। 15 अगस्त 2025 को दूरदर्शी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ ने भारतीय सुरक्षा चिंतन में एक बड़े मोड़ का संकेत दिया। लक्ष्य है ऐसा बहु-स्तरीय, स्वदेशी, एकीकृत वायु एवं मिसाइल-रक्षा तंत्र खड़ा करना जो न केवल सैन्य ठिकानों बल्कि रणनीतिक परिसंपत्तियों, नागरिक बुनियादी ढांचे और राष्ट्रीय कमांड-नेटवर्क को भी सुरक्षित कर सके। इस महान मिशन पर उठने वाले सवालों के जवाब से पहले समझना ज़रूरी है ‘सुदर्शन चक्र’ एक अकेला सिस्टम नहीं, ‘सिस्टम ऑफ सिस्टम्स’ है। इसमें लंबी दूरी की सतह-से-वायु मिसाइलें, रडार-नेटवर्क, कमान-एवं-नियंत्रण, काउंटर-यूएएस, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष-आधारित निगरानी और संभवत: भविष्य में स्पेस-कमांड तथा साइबर-कमांड जैसी संस्थागत संरचनाएं परत दर परत शामिल होंगी। सो मिशन सुदर्शन चक्र के भीतर विभिन्न कार्यक्रम हैं। इन कार्यक्रमों के कार्य निष्पादन में सरकारी कंपनियां, विभिन्न मंत्रालय, निजी अंतरिक्ष क्षेत्र शामिल है, जिनकी अपनी तकनीकी, औद्योगिक और नौकरशाही जैसी तमाम स्वाभाविक बाधाएं हैं।
इसीलिये मिशन की घोषणा के बाद ‘विधिवत आरंभ’ न दिखना असामान्य नहीं है। बड़ी रक्षा-परियोजनाएं अक्सर पहले नीति, फिर स्वीकृति, तब परीक्षण, उसके बाद उत्पादन और अंतत: संयुक्त तैनाती के चरणों में ही आगे बढ़ती हैं। 52 निगरानी उपग्रहों में से 21 इसरो और 31 निजी कंपनियां विकसित करने की मंजूरी है। पूरी श्रृंखला 2029 तक लांच करने का लक्ष्य है। अब 52 उपग्रहों को एक के बाद एक रवाना किया जा सके ऐसा नहीं है। उपग्रहों के पेलोड, कक्षा, ग्राउंड-सेगमेंट, डेटा-प्रोसेसिंग और सैन्य-इंटीग्रेशन की पूरी श्रृंखला व्यवहारिक रूप से सघन तालमेल मांगती है, इसलिये इसमें भी विलंब स्वाभाविक है। वैसे भी इसरो का कार्यक्रम अति व्यस्त है। प्रोजेक्ट कुशा को डीआरडीओ लंबी दूरी के स्वदेशी सतह-से-वायु मिसाइल डिफेंस सिस्टम के रूप में विकसित कर रहा है। यह भविष्य में एस-400 जैसी विदेशी प्रणाली पर निर्भरता घटाएगा पर यह अभी विकास की नवजात अवस्था में ही है। वैसे भी स्वदेशी प्रणाली का अर्थ तुरंत विदेशी प्रणाली का विकल्प नहीं होता, शुरुआती वर्षों में यह उसके पूरक के रूप में ही काम करेगी। यह निर्भरता कम होने में समय लगेगा साथ ही इनके इंटीग्रेशन में भी। एस-400 के साथ इंटीग्रेशन तकनीकी संवेदनशील और बहु-स्तरीय प्रक्रिया होगी।
साल 2026 से 2030 के बीच सीमित इंटीग्रेशन को बढ़ाने की ओर कार्य चल रहा है, लेकिन पूर्ण, निर्बाध और अलग-अलग देशों से खरीदे सिस्टम के साथ इंटीग्रेशन का जटिल काम 2030 के आगे भी जा सकता है। यही बात भिन्न तरह के रडारों की स्थापना के बारे में भी सच है। मिशन के तहत पूरे देश में रडारों का एक ऐसा जाल बनाना है, जो इतना घना हो कि इसकी नज़र में आये कोई भी दुश्मन मिसाइल या ड्रोन निकल न सके। आज देश के पास इसके लिये आवश्यक कुछ संस्थागत ढांचे पहले से मौजूद हैं, जैसे डिफेंस स्पेस एजेंसी, एकीकृत सैन्य कार्यबल, वगैरह लेकिन ‘पूर्ण विकसित’ स्पेस कमांड अभी एक अवधारणा से आगे बढ़कर भिन्न ऑपरेशनल कमांड नहीं बना है तो महज इसलिये कि इन सभी का उचित संयोजन नहीं हो सका है जो बहुत देर की बात नहीं है। यही बात साइबर कमांड पर भी लागू होती है।
वैसे सुदर्शन चक्र परियोजना की सबसे बड़ी सीमा तकनीक नहीं, समय और औद्योगिक स्केल है। हमने रक्षा उत्पादन और निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि की है, लेकिन बड़े ‘सिस्टम ऑफ सिस्टम्स’ जैसे कार्यक्रमों में गुणवत्ता, मानकीकरण और समय-पालन कहीं अधिक कठिन होता है। समस्या यह है कि भारत की रक्षा-उद्योग प्रणाली अभी भी कार्यक्रम प्रबंधन के लिहाज से संक्रमण में है। डीआरडीओ, इसरो, वायुसेना, आएडीएस, निजी अंतरिक्ष कंपनियां और बीईएल जैसी एजेंसियां अगर अलग-अलग गति से चलेंगी तो देरी स्वाभाविक है। कुशा परियोजना, काउंटर ड्रोन, रडार घनत्व, स्पेस बेस्ड सर्विलांस और कमांड-इंटीग्रेशन ये सब साथ में चलेंगे निरंतर वित्त पोषण, स्वदेशी विकास की तीव्र समय सीमा, तीनों सेनाओं का गहन एकीकरण और निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी भरपूर होगी तो ‘सुदर्शन चक्र’ देर सवेर अवश्य आकार लेगा।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



