नारी शक्ति का स्वागत करें ​​​​​​​

कितने-कितने बरस ऐसे ही गुज़र गए जब स्त्री ने न तो अपनी क्षमता को पहचाना न पुरुष समाज ने उसकी दशा को दिशा देने की कोशिश की। स्त्री की निर्भरता बढ़ती चली गई और इसने उसके मन को भी धुंधला कर दिया। वह समझने लगी कि अगर उसकी कोई जगह है तो यही है कि वह घर-परिवार के मामलों में कुछ न कहे। घर के काम करती रहे और आज्ञा को स्वीकार करती रहे। सवाल बहुत थे जवाब बहुत कम, लेकिन एक बदलाव तो आना ही था। जैसा कि राक्सन गे कहती हैं- मैं यह कहने की कोशिश नहीं कर रही कि मेरे पास सारे जवाब हैं, न यह कि मैं सही हूं। मैं सिर्फ कोशिश कर रही हूं। खुद पर भरोसा करने की। इस दुनिया में कुछ अच्छा कर सकने की। यहीं से ‘अनुकूलता’ के पार जाने की कोशिश होती है। देश की नारी ने राष्ट्र निर्माण में अमूल्य योगदान दिया है। आज देश के हर सैक्टर में नारी शक्ति मिसाल बन रही है। साईंस और टैक्नोलॉजी से लेकर सशस्त्र बलों तक, खेल, संगीत, कला के क्षेत्र में महिलाएं अपनी सशक्त पहचान बना रही हैं।
उनकी निडरता, साहस, संघर्ष की अनेक कहानियां हमारे आस-पास के समाज में मौजूद हैं, जो एक उदाहरण बन सकता है। हाल ही में तमिलनाडु के सथानकुलम कस्टोडियल मौत मामले में 6 वर्ष बाद मदुरै की अदालत ने 9 पुलिस कर्मियों को दोषी ठहराया और उन्हों फांसी की सज़ाई सुनाई। यह फैसला न्याय व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। उभर कर आया हैड कांस्टेबल रेवती (43) का नाम। उनकी सच्चाई के प्रति गहरी आस्था और बहादुरी ने इस केस को मुकाम तक पहुंचाने में अपनी निर्णायक भूमिका निभाई। इस दो बेटियों की मां ने मिल रही धमकियों की परवाह नहीं की। सच का साथ दिया और न्याय का मार्ग प्रशस्त किया। जून 2020 मामला है। थूथुकुडी ज़िले के सथानकुलम पुलिस स्टेशन की घटना। जयराज व उनके बेटे जेबेनिक्स को इसलिए हिरासत में लिया क्योंकि उन्होंने मोबाइल शॉप तय समय से ज्यादा देर तक खुली रखी थी। रेवती ने बताया कि सब-इंस्पैक्टर बालाकृष्णन ने कहा- तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई स्टेशन के अंदर हंगामा करने की। पुलिस कर्मियों ने जयराज और बेनिक्स को खूब पीटा। कुछ दिन बाद उन दोनों की मौत हो गई। सच को दबाने की कोशिश की गई। रेवती ने न्यायिक मजिस्ट्रेट से कहा-आप अगर मेरे बच्चों और नौकरी की गारंटी दें तो मैं सच-सच बताऊंगी। रेवती को धमकियां दी गईं, फब्तियां कसी गईं। उसकी हिम्मत ने बता दिया कि उस रात थाने में दोनों की मौत की ज़िम्मेदारी किसकी थी। उसकी गवाही ने न्याय का पक्ष मज़बूत किया।
सूसन सौरेंग कहती है-इस दुनिया में आज जो भी दिन-प्रतिदिन घट रहा है। उसे देखते हुए एक मनुष्य के रूप में हमारी संवेदनशीलता का कैसा रूप-साज बन रहा है? क्या बोस्निया, रवोडा,, फिलिस्तीन, अफगानिस्तान और इराक हमारे लिए महज कुछ शब्द हैं? दूसरों की पीड़ा के हमारे लिए क्या मायने रहे हैं? भारत में देश के प्रधानमंत्री महसूस करते हैं कि कोई भी समाज तभी प्रगति करता है, जब माताओं-बहनों को आगे बढ़ने के ज्यादा से ज्यादा अवसर मिलते हैं। इसी सोच के साथ बीते ग्यारह वर्षों में महिला सशक्तिकरण के लिए एक अनुकूल माहौल तैयार करने पर ज़ोर दिया गया। इसके लिए निरन्तर प्रयास किए जा रहे हैं। शिक्षा तक बढ़ती पहुंच, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, वित्तीय समावेशन में बढ़ोतरी और बुनियादी सुविधाओं तक बेहतर पहुंच ने महिलाओं की भागीदारी मज़बूत की है। 

#नारी शक्ति का स्वागत करें ​​​​​​​