लक्ष्य केवल उम्र बढ़ाना नहीं, स्वस्थ जीवन होना चाहिए
यह चर्चा अक्सर होती है कि क्या मनुष्य उम्र को नियंत्रित कर सकता है और जहां तक संभव हो मृत्यु को टाल सकता है। खबर है कि रूस के वैज्ञानिक ऐसे तरीके खोज रहे हैं कि 150-200 वर्ष तक जिया जा सकता है।
मृत्यु ही जीवन को मूल्य देती है : आज जब रूस, अमरीका, जापान और कई अन्य देशों में वैज्ञानिक उम्र बढ़ाने, बुढ़ापा देर से आने और कोशिकाओं की मरम्मत करने पर काम कर रहे हैं, तब यह केवल विज्ञान का विषय नहीं रह जाता। दर्शन, नैतिकता, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संतुलन का प्रश्न भी बन जाता है। जन्म और मृत्यु प्राकृतिक चक्र है जिसमें शरीर एक माध्यम है। बात सही भी है, लेकिन हमेशा से यही खोज का विषय रहा है कि क्या विज्ञान इसमें कुछ नहीं कर सकता। भारतीय दर्शन से लेकर यूनानी चिंतन तक में मृत्यु को अंत नहीं बल्कि व्यवस्था का हिस्सा माना गया है। यदि मनुष्य इस चक्र को बदलने लगे तो क्या यह प्रकृति के काम में हस्तक्षेप माना जाएगा?
शरीर को रोग मुक्त बनाए रखने की कला ही अधिक समय तक जीवित रहना संभव बना सकती है। मृत्यु पर वश न हो, पर स्वस्थ रह कर जीवन जीना अपने हाथ में है। वैज्ञानिक इसी बात पर शोध कर रहे हैं कि कैसे इंसान मृत्यु पर विजय तो नहीं पा सकता, लेकिन उसे एक स्वाभाविक प्रक्रिया बना सकता है। इसका अर्थ यह है कि यदि विज्ञान कैंसर, अल्ज़ाइमर, हृदय रोग या वृद्धावस्था से जुड़ी पीड़ा कम करता है, तो यह मानव कल्याण है। कुछ शोधों का उद्देश्य है—जैसे कोशिकाओं की हानि पहुंचने की गति धीमी करना, मस्तिष्क को नुकसान से बचाना, रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ाकर शरीर को युवा बनाए रखना तथा उम्र से जुड़ी बीमारियों को टालना।
उद्देश्य यह है कि सिर्फ लम्बी उम्र नहीं, बल्कि सक्रिय उम,जहां 80 वर्ष का व्यक्ति भी 50 जैसा स्वस्थ रह सके। कुछ लोगों का मानना है कि यदि मृत्यु देर से होती है और मनुष्य स्वस्थ बना रहता है तो खान-पान के संकट से लेकर रोज़गार और सब से बड़ी बात यह है कि पीढ़ियों का टकराव एक भीषण समस्या बन जाएगी। इसी के साथ यदि राजनीतिक या आर्थिक रूप से शक्तिशाली लोग दशकों तक जीवित और प्रभावशाली रहें, तो नई पीढ़ी के लिए अवसर सीमित हो सकते हैं। प्रश्न यह भी है कि यदि मृत्यु बहुत दूर चली जाए, तो क्या जीवन के उद्देश्य बदल जाएंगे? भारतीय परम्परा में ‘दीर्घायु’ की कामना है—लंबा जीवन तब तक मूल्यवान है जब तक वह संतुलित, उपयोगी और नैतिक हो।
उम्र बढ़ना नहीं, अस्वस्थ बुढ़ापा समस्या है : मनुष्य सदियों से अधिक जीने की कामना करता आया है। कभी तपस्या से, कभी आयुर्वेद से, कभी विज्ञान से और अब आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी से। दुनिया भर में उम्र बढ़ाने, बुढ़ापा धीमा करने और जीवन को लम्बा करने पर शोध हो रहा है। परन्तु असली प्रश्न यह नहीं कि मनुष्य कितने वर्ष जी सकता है, बल्कि यह है कि वह कैसे जी रहा है। यदि जीवन केवल सांसों की संख्या बनकर रह जाए, यदि बढ़ती उम्र के साथ शरीर अशक्त, मन अकेला, जेब खाली और समाज उपेक्षित कर दे, तो ऐसी लंबी आयु वरदान नहीं, कई बार बोझ बन जाती है।
सच यही है कि लम्बी उम्र से अधिक महत्वपूर्ण स्वस्थ, शिक्षित, सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन है। प्रकृति ने उम्र बढ़ने पर कोई पाबंदी नहीं लगाई। चिकित्सा विज्ञान भी अब जीवनकाल बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, लेकिन यदि समाज शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था नहीं करेगा, तो बढ़ती उम्र एक गंभीर मानवीय संकट बन सकती है।
एक व्यक्ति जिसने जीवन भर परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए योगदान दिया, यदि वही बुज़ुर्ग इलाज के लिए दर-दर भटके, पेंशन या आर्थिक सुरक्षा से वंचित हो, परिवार पर बोझ समझा जाए, मानसिक अवसाद और अकेलेपन में जिये तो यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि सामाजिक विफलता है। ऐसी स्थिति सचमुच जीत-जी मृत्यु जैसी है। यदि व्यक्ति को कम उम्र से ही यह सिखाया जाए कि स्वास्थ्य कैसे बनाए रखें, भोजन कैसा हो, व्यायाम क्यों ज़रूरी है, मानसिक संतुलन कैसे रखें और सबसे ज़रूरी यह कि अपनी कमाई की व्यवस्था ऐसी करें कि कभी किसी से कुछ मांगने की नौबत न आये। यदि इसका ध्यान जवानी में ही रख लिया गया तो बुढ़ापा अचानक आने वाली विपत्ति नहीं, बल्कि तैयारी के साथ आने वाला जीवन चरण बन सकता है। जब बुज़ुर्ग व्यक्ति अपनी जमा पूंजी दवाओं, ऑपरेशन और अस्पतालों में खो देता है, तब बीमारी केवल शरीर नहीं तोड़ती, पूरा परिवार आर्थिक और मानसिक रूप से टूट जाता है। इसलिए यदि स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ और किफायती नहीं होंगी, तो बढ़ती उम्र सामाजिक संकट बन जाएगी जो अंतत: सरकार के लिए एक चुनौती बन जाएगी।
लम्बी उम्र बनाम उपयोगी उम्र : लक्ष्य केवल उम्र बढ़ाना नहीं बल्कि सेहतमंद जीवन होना चाहिए। व्यक्ति अधिक समय तक चलता-फिरता रहे, मानसिक रूप से सक्रिय रहे, आर्थिक रूप से सुरक्षित रहे और सामाजिक रूप से उसका आदर सम्मान कायम रहे, क्योंकि बिस्तर पर पड़े 20 अतिरिक्त वर्ष किसी उपलब्धि का प्रमाण नहीं। सबसे बड़ा प्रश्न है कि यदि विज्ञान हमें 100-150 या 200 वर्ष जीने की क्षमता दे दे, लेकिन समाज हमें 60-70 के बाद अप्रासंगिक मान ले तो इसका क्या उत्तर है? अंतिम सत्य यही है कि लम्बी उम्र प्रकृति दे सकती है, स्वस्थ उम्र विज्ञान दे सकता है, लेकिन सम्मानजनक उम्र केवल परिवार और समाज दे सकता है। जिस दिन हम यह समझ जाएंगे, उस दिन बुढ़ापा बोझ नहीं, अपितु अनुभव, गरिमा और सभ्यता की पहचान बनेगा।



