जलवायु संकट बदलनी होगी विकास की परिभाषा
भारत में मौसम का बदलता मिज़ाज और वैशाख के महीने में जेठ जैसी तपिश का अहसास होना अब केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि एक गहरे पारिस्थितिक संकट की चेतावनी है। अक्सर भीषण गर्मी और लू के लिए अल नीनो या वैश्विक जलवायु परिवर्तन को दोष देकर हम अपनी ज़िम्मेदारी से बचते रहे हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह संकट काफी हद तक मानव-निर्मित है। आज हम जिस भीषण गर्मी का सामना कर रहे हैं, वह वैश्विक वायुमंडलीय बदलावों और स्थानीय स्तर पर पर्यावरण के प्रति बरती गई नीतिगत लापरवाही का एक मिला-जुला परिणाम है। जब हम अपनी विकास योजनाओं के नाम पर हज़ारों हेक्टेयर प्राथमिक जंगलों, पहाड़ियों और जल निकायों को नष्ट करते हैं, तो हम अनजाने में उन प्राकृतिक ‘कूलिंग एजेंटों’ को खत्म कर देते हैं जो इस तपिश के खिलाफ हमारी एकमात्र सुरक्षा थे। बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में, जहां तापमान अब नियमित रूप से 48 डिग्री सेल्सियस के स्तर को छूने लगा है, यह स्पष्ट है कि हमारी विकास की भूख ने धरती के प्राकृतिक थर्मोस्टेट को बिगाड़ दिया है।
इस मानव-निर्मित गर्मी की सबसे प्रत्यक्ष और क्रूर मार उन मज़दूरों और सड़क किनारे काम करने वाले श्रमिकों पर पड़ती है जो इस ढांचे का निर्माण कर रहे हैं। भारत के करोड़ों निर्माण श्रमिक, रेहड़ी-पटरी वाले और गिग-इकोनॉमी के कर्मचारी इस गर्मी को केवल एक आंकड़े के रूप में नहीं, बल्कि एक शारीरिक हमले के रूप में महसूस करते हैं। आंकड़ों के अनुसार गर्मी के कारण भारत को 2030 तक अपने कुल कामकाजी घंटों का 5.8 प्रतिशत हिस्सा खोना पड़ सकता है, जो लगभग 3.4 करोड़ पूर्णकालिक नौकरियों के समान है। बांदा जैसे शहरों में कंक्रीट और कोलतार की सड़कें गर्मी को सोखकर रात में भी उसे वापस छोड़ती हैं, जिससे ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव पैदा होता है और स्थानीय तापमान ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में 5 से 7 डिग्री सेल्सियस तक अधिक बना रहता है। नीतिगत स्तर पर मज़दूरों के लिए ‘छाया का अधिकार’ या लू के दौरान काम के घंटों में बदलाव जैसे नियम केवल कागज़ों तक सीमित हैं, जो हमारे विकास के उस अंधेपन को दर्शाते हैं जहां श्रम को एक जैविक इकाई के बजाय केवल एक मशीन समझा जाता है।
गर्मी का यह घातक रूप हमारी कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ रहा है। ‘थर्मल शॉक’ के कारण गेहूं जैसी प्रमुख फसलों के दाने सूख रहे हैं, जिससे पैदावार में 15 से 25 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की जा रही है। मिट्टी की नमी खत्म होने से उपजाऊ ज़मीन अब मरुस्थल में बदल रही है, फिर भी हमारी नीतियां सूखे क्षेत्रों में अधिक पानी चाहने वाली फसलों को बढ़ावा दे रही हैं। इसी तरह जंगलों के विखंडन और अवैध खनन ने वन्य जीवों के लिए भोजन का संकट पैदा कर दिया है। छतरपुर और पन्ना टाइगर रिज़र्व के आसपास के इलाकों में खनन के कारण प्राकृतिक जल स्रोत सूख चुके हैं, जिसके परिणामस्वरूप जंगली जानवरों का बस्तियों की ओर आना 40 प्रतिशत तक बढ़ गया है। यह केवल मानव-पशु संघर्ष नहीं है, बल्कि उस पारिस्थितिक सुरक्षा चक्र का टूटना है जो इंसानों और जानवरों को एक साथ सुरक्षित रखता था।
वर्तमान ‘हीट एक्शन प्लान’ (एचएपी) की सबसे बड़ी विफलता यह है कि वे केवल शहरों में मौतों को रोकने पर केंद्रित हैं जबकि ज़मीन, जल और मिट्टी के गिरते स्वास्थ्य की अनदेखी करते हैं। अब समय आ गया है कि नीतिगत स्तर पर ‘वन हेल्थ’ के दृष्टिकोण को अपनाया जाए, जहां मिट्टी की नमी, पशुधन का स्वास्थ्य और वन्य जीवों का संरक्षण एक ही इकाई के रूप में देखा जाए। हमें केवल वृक्षारोपण की रस्म अदायगी से ऊपर उठकर बुंदेलखंड के चंदेलकालीन तालाबों जैसे पारम्परिक जल-प्रबंधन तंत्र को पुनर्जीवित करना होगा। ये तालाब केवल पानी का स्रोत नहीं थे, बल्कि वे स्थानीय पारिस्थितिकी को ठंडा रखने के विकेंद्रीकृत साधन थे। नीति निर्माताओं को यह समझना होगा कि राजमार्गों के लिए काटे गए पेड़ केवल लकड़ी नहीं थे, बल्कि वे उस सूक्ष्म-जलवायु का हिस्सा थे जो फसलों को झुलसने से बचाती थी।
हमें विकास की अपनी परिभाषा को बदलना होगा। बुंदेलखंड में पत्थर खनन के लिए काटी गई हर पहाड़ी और उत्तराखंड में कंक्रीट के विस्तार के लिए नष्ट की गई हरियाली हमारे भविष्य की ठंडी हवाओं को रोक रही है। आर्थिक लाभ की तुलना में गर्मी के कारण होने वाला स्वास्थ्य और कृषि का नुकसान कहीं अधिक है। भविष्य की नीतियों की सफलता अब इस जवाबदेही पर टिकी है कि हम बुनियादी ढांचे के निर्माण में ‘ग्रीन इंजीनियरिंग’ को कितनी प्राथमिकता देते हैं और पर्यावरण नियमों की अनदेखी को कब बंद करते हैं। हमें यह स्वीकार करना होगा कि पर्यावरण का संरक्षण अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न हिस्सा है। तभी हम इस मानव-निर्मित भट्टी से बाहर निकल पाएंगे और आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसी धरती दे पाएंगे जो केवल झुलसती नहीं, बल्कि जीवन भी प्रदान करती है।



