यूएई का ओपेक से अलगाव : वैश्विक ऊर्जा राजनीति में संरचनात्मक बदलाव का संकेत
मौजूदा ईरान तथा इज़रायल-अमरीका युद्ध अर्थशास्त्र के मेटा प्रभाव के कारण द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से दुनिया की इकॉनमी को रिसेट करने का फिर से एक बड़ा कारण बन गया है। दुनिया फिर से नई आपूर्ति शृंखला का निर्माण कर रही है। होर्मुज नाकाबंदी और उसके बाद ओमान की खाड़ी की नाकाबंदी के कारण ऐसे बदलाव स्वाभाविक दिख रहे हैं। आज इस युद्ध के कारण वैश्विक ऊर्जा बाज़ार एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा है। संयुक्त अरब अमीरात द्वारा आर्गेनाइज़ेशन आफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीस (ओपेक) और ओपेक प्लस से बाहर निकलने का निर्णय केवल एक संस्थागत बदलाव नहीं बल्कि वैश्विक तेल राजनीति और आर्थिक शक्ति संतुलन में एक गहरा संकेत है। यह कदम उस समय आया है जब ऊर्जा बाज़ार पहले से ही भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति बाधाओं और बदलते आर्थिक समीकरणों के दबाव में है। ओपेक की स्थापना 1960 में इराक, ईरान, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला द्वारा की गई थी, जिसका उद्देश्य तेल उत्पादक देशों के बीच समन्वय स्थापित कर वैश्विक कीमतों को स्थिर रखना था। समय के साथ यह संगठन 13 देशों तक विस्तारित हुआ और वैश्विक तेल बाज़ार में एक प्रभावशाली कार्टेल के रूप में उभरा। इस संगठन में सऊदी अरब की भूमिका सबसे प्रभावशाली रही है, जिसने उत्पादन और मूल्य निर्धारण में नेतृत्व किया।
हालांकि, 2016 के बाद वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य में बड़ा बदलाव आया। अमरीकी शेल ऑयल उत्पादन में वृद्धि से तेल की कीमतें गिर गईं जिसके जवाब में ओपेक ने रूस सहित अन्य देशों के साथ मिलकर ओपेक प्लस का गठन किया। रूस, जो 2022 में विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक था, इस गठबंधन का प्रमुख स्तंभ बनकर उभरा। ओपेक और ओपेक प्लस मिलकर वैश्विक उत्पादन का लगभग आधे से अधिक हिस्सा नियंत्रित करते हैं, जिससे उनकी बाज़ार पर पकड़ अत्यंत मज़बूत रही है। पिछले कुछ वर्षों में विशेषकर कोविड-19 महामारी के बाद ओपेक प्लस ने उत्पादन कटौती को एक प्रमुख नीति उपकरण और रणनीतिक औज़ार के रूप में इस्तेमाल किया। समय-समय पर तेल उत्पादन की अतिरिक्त कटौती का निर्णय लिया, जिससे बाज़ार में कीमतों को स्थिर रखने का प्रयास किया गया। यह स्पष्ट करता है कि ओपेक प्लस केवल एक संगठन नहीं, बल्कि वैश्विक तेल बाज़ार को नियंत्रित करने वाला एक रणनीतिक तंत्र बन चुका था।
ऐसे परिदृश्य में यूएई का इस गठबंधन से बाहर निकलने के कई कारण समझ में आते हैं । इसका सबसे बड़ा कारण यूएई के खुद के उत्पादन स्वतंत्रता और क्षमता का पूर्ण इस्तेमाल करने की इच्छा है। यूएई अपनी बढ़ती उत्पादन क्षमता का पूर्ण उपयोग करना चाहता है, लेकिन ओपेक प्लस के कोटा सिस्टम ने उसे सीमित कर रखा था। इसके अतिरिक्त सऊदी अरब के साथ नीति संबंधी मतभेद और क्षेत्रीय भू-राजनीतिक तनाव भी इस निर्णय के पीछे प्रमुख कारक हैं। यूएई ने इस बाबत सऊदी अरब से कई बार कहा भी था, लेकिन उसकी बातों का कोई परिणाम नहीं निकला। होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी तनाव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ऊर्जा आपूर्ति अब केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामरिक मुद्दा भी है। यूएई के इस कदम का वैश्विक सप्लाई चेन पर सीधा प्रभाव पड़ेगा। सबसे पहले ओपेक की सामूहिक शक्ति कमज़ोर होगी, जिससे उत्पादन अनुशासन में गिरावट आ सकती है। दूसरा, यूएई अब स्वतंत्र रूप से उत्पादन बढ़ा सकता है, जिससे बाज़ार में अतिरिक्त आपूर्ति आएगी। हालांकि, अल्पकाल में भू-राजनीतिक तनाव के कारण कीमतें ऊंची रह सकती हैं, लेकिन दीर्घकाल में अधिक उत्पादन कीमतों को नीचे ला सकता है। इससे तेल बाज़ार में प्रतिद्वंदिता के साथ साथ अस्थिरता बढ़ने की संभावना है।
यह बदलाव वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है। ओपेक की कमज़ोर होती पकड़ यह संकेत देती है कि ऊर्जा बाज़ार धीरे-धीरे कार्टेल आधारित नियंत्रण से मुक्त बाज़ार की ओर बढ़ रहा है। इसके साथ ही डॉलर आधारित तेल व्यापार को भी चुनौती मिल सकती है, क्योंकि यूएई जैसे देश अब अधिक लचीले व्यापार मॉडल अपनाने की दिशा में बढ़ सकते हैं और आज यूएई तो कल ओपेक प्लस के कई और देश इस बारे में सोच सकते हैं। भारत के संदर्भ में यह स्थिति मिश्रित प्रभाव लेकर आती है। एक ओर यदि यूएई उत्पादन बढ़ाता है, तो भारत को सस्ता तेल मिलने की संभावना है, जिससे महंगाई और चालू खाते के घाटे पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। दूसरी ओर, मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और आपूर्ति मार्ग में बाधा भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए जोखिम भी पैदा कर सकते हैं। भारत, जो अपनी लगभग 85 प्रतिशत तेल ज़रूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, ऐसे परिवर्तनों के प्रति अत्यंत संवेदनशील है।
इसके अतिरिक्त यह घटनाक्रम भारत के लिए एक रणनीतिक अवसर भी प्रस्तुत करता है। भारत और यूएई के बीच ऊर्जा सहयोगए दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते और स्थानीय मुद्रा में व्यापार जैसे विकल्प अब अधिक व्यवहारिक हो सकते हैं। इससे न केवल ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में भारत की स्थिति भी सुदृढ़ हो सकती है।
हालांकि, इस पूरे परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या यह ओपेक के कमज़ोर होने की शुरुआत है। पहले भी कतर, इक्वाडोर और अंगोला जैसे देश संगठन छोड़ चुके हैं। यूएई का बाहर निकलना इस प्रवृत्ति को और मज़बूत कर सकता है। यदि अन्य देश भी इसी दिशा में कदम उठाते हैं, तो वैश्विक तेल बाज़ार पूरी तरह से पुनर्गठित हो सकता है।
अंतत: यूएई का यह निर्णय केवल एक सदस्य देश का बाहर निकलना नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा राजनीति में एक संरचनात्मक बदलाव का संकेत है। ट्रम्प पहले से यह सब चाहते थे, आज यह हो गया, इस मौजूदा युद्ध में अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, यह उनकी एक सफलता में गिना जायेगा। आगामी वर्षों में यह तय करेगा कि क्या तेल बाज़ार पर कार्टेल का नियंत्रण बना रहेगा या फिर यह अधिक प्रतिस्पर्धी और अस्थिर लेकिन स्वतंत्र प्रणाली में परिवर्तित होगा। भारत जैसे देशों के लिए यह समय सतर्कता और रणनीतिक अवसर दोनों का है। जहां सही नीति निर्णय देश को लाभ की स्थिति में ला सकते हैं, वहीं चूक गंभीर आर्थिक चुनौतियां भी पैदा कर सकती है। (एजेंसी)

