डा. दीवान सिंह कालेपानी, माहिलपुर तथा आदिवासी
गत शताब्दी के 50वें दशक में खालसा कालेज माहिलपुल में पढ़ते समय मैंने डा. दीवान सिंह कालेपानी की ‘वगदे पानी’ पुस्तक की कुछ कविताएं अपने पाठ्यक्रम में पढ़ी तो पता चला कि उन्हें जापानियों ने यातनाएं देकर शहीद किया था। 1953 में रोज़ी-रोटी के संबंध में दिल्ली पहुंचा तो वहां के कॉफी हाउस में उनके परिवार के साथ ऐसी जान-पहचान हुई कि मैं आज भी उनके पारिवारिक सदस्य की तरह हूं।
उनके पारिवारिक सदस्यों महिन्दर सिंह ढिल्लों, सुदर्शन तथा इंद्रा बल द्वारा बेहत स्नेह मिला और इतना अधिक कि मैं 1973 में स्वयं भी अंडमान तथा निकोबार द्वीपों के काले पानी अपनी आंखों से देखे।
गत माह शीर्ष पंजाबी संस्थाएं भाई वीर सिंह सदन (नई दिल्ली), भाषा विभाग पंजाब (पटियाला) तथा पंजाबी साहित्य अकादमी (लुधियाना) द्वारा आत्मजीत के नाटक ‘किश्तियां विच्च जहाज़’ के पाठ्यक्रम ने मुझे अपने विद्यार्थी जीवन का माहिलपुर ही नहीं, 1973 के अंडमानी आदिवासी भी याद करवा दिए हैं।
मैंने अंडमान की यह नस्ल के सभ्यता के मेल में आकर खत्म होने के संबंध में जाना। ऐसे अपराधी जिन्हें काले पानी में उम्र कैद की सज़ा मिली थी, यहां भेजे गए थे। अच्छे आचरण वाले अपराधियों को जंगल की कुछ ज़मीन कृषि के लिए दी जाती थी। उन्होंने जंगल के मालिकों को आसानी से हाशिये पर धकेलना शुरू कर दिया था। तपेदिक, हैज़ा और मलेरिया के रोगाणु भी ये सभ्यक अपराधी वहां ले गए थे। सभ्यक संसार की आदिवासियों को यह सबसे घातक देन थी। डा. दीवान सिंह ने इनकी रक्षा की थी।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार ब्रिटिश सरकार की इस नीति में संशोधन करना चाहती थी। सरकार चाहती थी कि यह नस्ल किसी तरह खत्म होने से बची रहे। अंडमान तथा निकोबार के ये कबीले एक-चौथाई रह गए थे। इनमें से जारवा नामक आदिवासियों के रहने के लिए सरकार ने पगडंडी के दोनों ओर पक्के घर बनाए हुए थे। मुझे आश्चर्य हुआ कि ये लोग घरों से बाहर झौपड़ी बनाए बैठे थे, जिनमें चाय के देगे, कुछ ठंडे तथा कुछ गर्म, सदा तैयार रहते थे। झोपड़ियों के बाहर छोटी-छोटी मछलियां ऐसे सूखने के लिए रखी गई थीं, जैसे मेनलैंड के मिर्च पैदा करने वाले किसान मिर्चें सुखाते हैं।
1973 तक यहां बसाये गए चौबीस लोग कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा थे। बीये नामक व्यक्ति का परिवार सबसे बड़ा था। दो बेटियां, छह नाती-नातिन, बेटा अभी कुंवारा था। कबीले का राजा नि:संतान था। उसकी रानी मर चुकी थी। वह जिरके की बेटी को अपनी बना कर उसका पालन-पोषण कर रहा था। सरकार चाहती थी कि वह जिरके का विवाह बीये की नातिन सुरमयी से करवा दे, परन्तु सुरमयी नहीं मान रही थी। जिरका उसके पिता की उम्र का था।
मैं रात को लालटेन की रौशनी में आदिवासी जीवन के बारे में पुस्तक पढ़ रहा था तो मैंने देखा कि लालटेन की रौशनी में तीन-चार छिपकलियां टिड्डियों का शिकार कर रही थीं। मुझे वह रौशनी बुरी लगी जो एक बड़े जन्तु द्वारा छोटे जन्तु को खाने में सहायक हो रही थी। मैंने लालटेन बुझा दी।
लालटेन बुझाने की देर थी कि एक टटहिना छत से सामने रखे पानी के जग में गिर गया। पानी पर तैरते टटहिने की रौशनी मुझे भरे तालाब में उगे कमल के फूल की तरह प्रतीत हुई। उस खामोश, सुनसान तथा उदास चौगिरदे में जुगनू की रौशनी ने मुझे सुला दिया। सुबह उठा तो दूर उछलते समुद्र में वह किश्ती दिखाई दी, जिसने मुझे वापस पोर्ट ब्लेयर लेकर जाना था।
अंतिका
1973 में पोर्ट ब्लेयर पहुंचने पर शिव कुमार बटालवी के निधन के समाचार नें मुझे और भी उदास कर दिया था। इस सफर का अंत अच्छा नहीं थी। मुझे काले पानी बैठे हुए शिव के निम्नलिखित शब्द याद आ गए :
असां तां जोबन रुत्ते मरना,
जोबन रुत्ते जो वी मरदा,
फुल्ल बने जां तारा।
मैंने खिड़की से बाहर देखा तो आकाश में तारे चमक रहे थे।

