दुनिया का एकमात्र तैरवा कीबुल लामजाओ राष्ट्रीय उद्यान

मणिपुर की लोकटक झील के दक्षिण हिस्से में कीबुल लामजाओ राष्ट्रीय उद्यान है, जोकि दुनिया का एकमात्र तैरता हुआ राष्ट्रीय पार्क है। मणिपुर के बिष्णुपुर ज़िले में, इम्फाल से लगभग 50 किमी की दूरी पर यह पार्क 40 वर्ग किमी में फैला हुआ है और यह लुप्तप्राय संगाई हिरण (नृत्य करने वाला हिरण) का अंतिम प्राकृतिक घर है। साल 1977 में स्थापित यह पार्क अपनी विशिष्ट तैरती फुमदिस के लिए भी विख्यात है। फुमदिस सड़ी-गली वनस्पतियों, मिट्टी और जड़ों का तैरता हुआ समूह है। चूंकि यह झील के पानी के ऊपर तैरता है, जिसमें 450 से अधिक जलीय वनस्पतियों की प्रजातियां और जंगली सूअर, हॉग हिरण, बड़ी भारतीय सिवेट जैसे जीव पाये जाते हैं, इसलिए यह एक तरह से प्रकृति के नियमों के एकदम विपरीत है। यह उद्यान न केवल पर्यावरण के लिए महत्वपुर्ण है बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था (मत्स्य पालन, जल विद्युत) के लिए भी रीढ़ की हड्डी के समान है। नवम्बर से मार्च के बीच इस पार्क में प्रवासी पक्षी भी आते हैं, इसलिए यात्रा करने का यही सबसे अच्छा समय है।
कीबुल लामजाओ राष्ट्रीय उद्यान एक ऐसी जगह है, जहां प्रकृति ने अपने नियम नये सिरे से लिखे हैं, जिसकी वजह से नाजुक, तैरती हुई एक रियासत बन गई है। इस अलौकिक लैंडस्केप में मणिपुर का नृत्य करने वाला संगाई हिरण घूमता है, जिसके कदम तैरती घास के मैदान पर उतने ही आकर्षक हैं जितने की तेज़। एक ज़माना था जब यह माना जाता था कि संगाई को दुनिया ने खो दिया है, इसलिए उनके बचे रहने की कहानी दिलचस्प है, जो जीवन को इस तैरते संसार की विशिष्ट लय से जोड़ती है। फुमदिस की स्थिरता में हर मूवमेंट का महत्व है, हर कदम परीक्षा है- न सिर्फ हिरण के लिए बल्कि उस इकोसिस्टम के लिए भी, जो पृथ्वी पर कहीं और है ही नहीं। 
संगाई को 1954 तक यह मान लिया गया था कि वह लुप्त हो गया है, उसके शिकार व फुमदिस के पतन की वजह से। इसके लगभग दो दशक बाद तक संगाई जनता व प्रशासन की यादों से भी गायब होता चला गया। लेकिन 1974 व 1975 के बीच किये गये हवाई सर्वे के दौरान नया मोड़ आया। कीबुल लामजाओ के तैरते फुमदिस में लगभग 14 संगाई देखे गये, जिसकी वजह से इनके संरक्षण प्रयासों में नया जोश आया और 1995 तक इनकी संख्या बढ़कर 155 हो गई, जो 2016 में 260 तक पहुंची। तैरते फुमदिस पर संगाई की नज़ाकत भरी चाल ने ही इसे ‘नाचते हिरण’ का नाम दिया है। संगाई तैरते फुमदिस के अतिरिक्त कहीं भी स्वस्थ व जीवित नहीं रह सकता है। संगाई व फुमदिस का चोली दामन का साथ है। 
संगाई की खोज के बाद ही भारत सरकार व मणिपुर की सरकार ने वन्यजीवन संरक्षण कानून, 1972 के तहत 1977 में कीबुल लामजाओ को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया। यह कानूनी सुरक्षा ज़रूरी थी। संगाई केवल एक प्रजाति नहीं है बल्कि सांस्कृतिक जड़ों वाला पशु है, जिसने हज़ारों वर्षों के दौरान तैरते फुमदिस पर रहने के लिए खुद को ढाल लिया है और यह लैंडस्केप व मणिपुर के लोगों के बीच गहरे संबंध को प्रतिविम्बित करता है। फुमदिस वनस्पति, मिट्टी आदि की तैरती हुई मोटी परत है, जोकि जलीय पौधों व अन्य चीज़ों से मिलकर हज़ारों वर्षों में तैयार हुई है। यह संगाई व अन्य वन्यजीवों को चरने, प्रजनन व आवश्यक पौष्टिकता के अवसर प्रदान करती है। दिलचस्प यह है कि फुमदिस प्राकृतिक जल चक्र है यानी यह झील के तले तक डूब जाती है, पौष्टिक तत्व जज्ब करने के लिए और फिर ऊपर उठ जाती है। यह चक्र उसके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है, लेकिन अब इसके समक्ष इकोलॉजिकल चुनौतियां भी हैं। लोकटक हाइड्रोइलेक्ट्रिकल प्रोजेक्ट कृत्रिम रूप से पानी के स्तर को नियंत्रित करता है, जिससे फुमदिस चक्र बाधित होता है, तैरते इकोसिस्टम की स्थिरता को खतरा उत्पन्न करते हुए।
गौरतलब है कि कीबुल लामजाओ राष्ट्रीय उद्यान को परिभाषित करने वाला फीचर उसका तैरता इकोसिस्टम ही है, जो संगाई को जीवित रखने के लिए आवश्यक है। फुमदिस केवल वनस्पति का टुकड़ा नहीं है बल्कि जीवित स्ट्रक्चर है जो बहुत लम्बे समय के दौरान जलीय पौधों, मिट्टी आदि से बना है। आज यह एक मोटी परत है जिस पर बड़े जानवर भी रहते हैं। इस पर जो घास उगती है वह पूरे साल आवश्यक पौष्टिक तत्व प्रदान करती है। बहरहाल, एक नये अध्ययन ने मणिपुर के आइकोनिक हिरण के भविष्य को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं। क्लाइमेट चेंज की वजह से 2070 तक फुमदिस सिकुड़ जायेगा और जब फुमदिस नहीं होगा, तो संगाई का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जायेगा। हालांकि झील के अन्य क्षेत्रों से फुमदिस के टुकड़े दक्षिण के फुमदिस में जोड़ दिये जाते हैं, जिससे उसका क्षेत्रफल बढ़ जाता है, लेकिन फिर भी क्लाइमेट चेंज अपना रंग तो दिखा ही रहा है कि तापमान व बारिश में बदलाव आता जा रहा है। 
 -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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