समाज को ‘अनसोशल’ बना रहा ‘सोशल मीडिया’
‘सोशल’ शब्द का अर्थ है—लोगों से जुड़ना, संवाद करना, अनुभव साझा करना और रिश्तों को जीवंत बनाए रखना। लेकिन जब यही शब्द मीडिया के साथ जुड़ कर ‘सोशल मीडिया’ बन जाता है तो उसका अर्थ धीरे-धीरे बदलता हुआ दिखाई देता है। आज जो माध्यम लोगों को जोड़ने के लिए बनाया गया था, वही कई बार लोगों को भीतर से अलग-थलग भी कर रहा है। यह विरोधाभास केवल एक तकनीकी समस्या नहीं है, बल्कि एक गहरी सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चुनौती है, जो आज जितनी प्रासंगिक है, उतनी ही आने वाले दशकों में भी बनी रहेगी। सवाल यह नहीं है कि सोशल मीडिया अच्छा है या बुरा, बल्कि यह है कि इसका प्रभाव हमारे सामाजिक व्यवहार, हमारे रिश्तों और हमारी मानवीय संवेदनाओं पर कैसा पड़ रहा है।
आज का मनुष्य पहले की तुलना में अधिक जुड़ा हुआ दिखता है, लेकिन भीतर से कहीं अधिक अकेला भी होता जा रहा है। हज़ारों ‘फॉलोअर्स’ और सैकड़ों ‘लाइक्स’ के बीच भी एक सच्चे संवाद की कमी महसूस होती है। यह एक ऐसा समय है जहां बातचीत अधिक है, लेकिन संवाद कम है। सम्पर्क अधिक है, लेकिन संबंध कम हैं। सोशल मीडिया ने हमारे संवाद के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। पहले जब लोगों के बीच बातचीत आमने-सामने होती थी, उसमें भावनाओं का आदान-प्रदान होता था, वहीं अब शब्दों और इमोजी के ज़रिए वह संवाद सिमट गया है। इस बदलाव ने हमारी अभिव्यक्ति को आसान ज़रूर बनाया है, लेकिन उसकी गहराई को कहीं न कहीं कम भी कर दिया है। जब हम किसी के चेहरे के भाव, उसकी आवाज़ का उतार-चढ़ाव और उसकी उपस्थिति को महसूस नहीं कर पाते, तो संवाद एक सीमित रूप ले लेता है।
इस स्थिति का सबसे बड़ा असर हमारे रिश्तों पर पड़ा है। रिश्ते केवल सम्पर्क से नहीं, बल्कि समय, संवेदना और समझ से बनते हैं। सोशल मीडिया ने सम्पर्क को तो आसान बना दिया है, लेकिन समय और ध्यान को खंडित कर दिया है। आज लोग एक ही समय में कई लोगों से जुड़े रहते हैं, लेकिन किसी एक के साथ पूरी तरह उपस्थित नहीं होते। यह आधा-अधूरा जुड़ाव रिश्तों को कमज़ोर बनाता है। जब बातचीत केवल औपचारिक या दिखावटी रह जाती है तो उसमें वह आत्मीयता नहीं बचती जो किसी रिश्ते को गहराई देती है। यह स्थिति धीरे-धीरे लोगों को भीतर से ‘अनसोशल’ (गैर-समाजी) बना देती है, जहां वे वास्तविक संबंधों से दूर होते जाते हैं और आभासी दुनिया में ही संतुष्टि खोजने लगते हैं।
सोशल मीडिया का एक और महत्वपूर्ण प्रभाव हमारी सोच और व्यवहार पर पड़ता है। यह माध्यम केवल जानकारी साझा करने का प्लेटफॉर्म नहीं रह गया है, बल्कि यह हमारी धारणाओं और विचारों को भी प्रभावित करता है। एल्गोरिद्म आधारित सामग्री हमें वही दिखाती है, जो हम पहले से पसंद करते हैं या जिससे हम सहमत होते हैं। इससे हमारी सोच का दायरा सीमित हो सकता है। हम धीरे-धीरे एक ऐसे ‘डिजिटल घेरे’ में कैद हो जाते हैं, जहां हमें केवल वही विचार दिखाई देते हैं, जो हमारे अपने विचारों से मेल खाते हैं। इससे न केवल हमारी आलोचनात्मक सोच कमज़ोर होती है, बल्कि समाज में संवाद और असहमति की स्वस्थ परम्परा भी प्रभावित होती है। जब लोग केवल अपने जैसे विचारों के बीच रहते हैं, तो वे अलग विचारों को स्वीकार करने में असहज हो जाते हैं और यही असहजता सामाजिक दूरी को और बढ़ा देती है।
इसके साथ ही सोशल मीडिया ने तुलना की एक नई संस्कृति को जन्म दिया है। लोग अपने जीवन के सबसे अच्छे और आकर्षक पहलुओं को साझा करते हैं, जिससे देखने वाले के मन में यह धारणा बनती है कि दूसरों का जीवन उससे बेहतर है। यह लगातार तुलना व्यक्ति के आत्मविश्वास और संतोष को प्रभावित करती है। उसे अपने जीवन में कमी महसूस होने लगती है। यह भावना उसे भीतर से असंतुष्ट और अकेला बना सकती है। इस तरह सोशल मीडिया न केवल सामाजिक दूरी बढ़ाता है, बल्कि व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर भी प्रभाव डालता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि सोशल मीडिया ने समय के उपयोग को पूरी तरह बदल दिया है। पहले जहां लोग अपने खाली समय में परिवार, मित्रों या समुदाय के साथ समय बिताते थे, वहीं अब वही समय स्क्रीन पर बीतने लगा है। यह बदलाव धीरे-धीरे हमारी प्राथमिकताओं को प्रभावित करता है। जब आभासी दुनिया वास्तविक दुनिया की जगह लेने लगती है, तो हमारे सामाजिक कौशल भी प्रभावित होते हैं। फिर भी यह कहना उचित नहीं होगा कि सोशल मीडिया केवल नकारात्मक प्रभाव डालता है। इसने लोगों को अपनी आवाज़ उठाने का मंच दिया है, दूरवर्ती लोगों को जोड़ने का अवसर दिया है और कई सामाजिक आंदोलनों को गति दी है। समस्या माध्यम में नहीं, बल्कि उसके उपयोग में है। (एजेंसी)



