बंगाल में मुख्यमंत्री शुभेंदु के लिए जनता की उम्मीदों को पूरा करना बड़ी चुनौती
पश्चिम बंगाल में पहली बार सत्ता में आई भाजपा के शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली, इसी के साथ बंगाल में इतिहास बन गया है। हालांकि अब शुभेंदु अधिकारी के सामने असली पांच चुनौतियां होंगी। बंगाल चुनाव में परिवर्तन का दावा कर सत्ता में आई भाजपा के पास अब परफॉर्मेंस का दबाव होगा। केंद्र और राज्य दोनों में एक ही राजनीतिक गठबंधन की सरकार होने से, इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारने, निवेश आकर्षित करने और रोज़गार पैदा करने का एक मौका है, लेकिन उम्मीदें बहुत ज्यादा हैं। खास बात है कि बंगाल में सबसे बड़ा मुद्दा कानून-व्यवस्था का है, इसे लागू करना सबसे बड़ी टेड़ी खीर होगा। जानकारों के अनुसार कुछ चुनौतियां ऐसी हैं जो तुरंत हल करने वाली हैं। कई चुनौतियां लंबे समय की हैं लेकिन सबसे पहली चुनौती है अपराधियों पर सख्त कार्रवाई करना और राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति को बहाल करना। इसमें पूरे सिंडिकेट को खत्म करना भी शामिल है। केन्द्र की जो परियोजनाएं अधूरी पड़ी हैं, उन्हें पूरा करना। और ऐसा माहौल बनाना जिससे राज्य की जो छवि बुरी तरह से खराब हो गई थी, वह सुधर सके और लोग सुरक्षित रूप से निवेश कर सकें।
पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक राजनीति एक ही दिशा में चलती रही है। पहले कांग्रेस और फिर वामपंथियों दशकों का शासन। इसके बाद भी जब जनता ने वामपंथियों से ऊब कर बदलाव भी चाहा तो उन्होंने ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को चुना, लेकिन यह बदलाव कोई बदलाव नहीं था बल्कि यह राजनीतिक मॉडल की नई पैकेजिंग थी जिसका चेहरा बदला हुआ था। बाकी तो राजनीतिक हिंसा वैसी ही थी, तुष्टीकरण वही था और सत्ता का दुरुपयोग भी उसी तरह चल रहा था।
बंगाल की दशकों की यात्रा में एक चीज जो लगातार बनी हुई थी वो थी यहां का एंटी-भाजपा कल्चर। भाजपा के बारे में धारणा ऐसी बन दी गई थी कि यह तो बस उत्तर भारत की पार्टी है जो ‘बांग्ला संस्कृति’ को नहीं समझती है। यह धारणा लोगों के दिल में इस तरह घर कर गई थी कि भाजपा का सत्ता में आना असंभव नहीं तो बहुत कठिन ज़रूर लगता था। इसीलिए यह जीत सामान्य नहीं है। यह उस मिट्टी में फूल खिलाने जैसा है जो इस फूल के अनुकूल नहीं मानी जाती थी। भाजपा की राजनीतिक यात्रा को अगर ध्यान से देखा जाए तो उसमें कुछ ऐसे पढ़ाव साफ दिखाई देते हैं जिन्होंने पार्टी की दिशा और दशा दोनों को बदल दिया। 1984 में महज 2 सीटों से शुरुआत और फिर 1999 में केन्द्र की सत्ता तक पहुंचना, भाजपा की इस यात्रा का बड़ा अध्याय था। इसके बाद 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में जब अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनी तो यह जीत पार्टी के इतिहास का एक निर्णायक मोड़ साबित हुई।
जानकारों के अनुसार बंगाल की जीत को भी किसी भी मायने में इससे कम नहीं समझा जाना चाहिए। यह केवल एक चुनावी सफलता भर नहीं है बल्कि पार्टी के वैचारिक विस्तार का संकेत है। दशकों तक जिस राज्य में भाजपा को स्वीकार्यता नहीं मिली, जहां उसकी राजनीतिक सोच को लगातार खारिज किया गया, अब वहीं पर उस विचार का जनसमर्थन में बदल जाना अपने आप में एक असाधारण घटना है। यह जीत भाजपा के लिए मील के पत्थर की तरह है। जब भविष्य में भाजपा के विराट विस्तार की कहानियां लिखी जाएंगी तो उसमें बंगाल की यह जीत एक महत्वपूर्ण अध्याय होगी। यह अध्याय भाजपा के स्वर्णिम काल का एक चमकता पन्ना बनेगा। पश्चिम बंगाल में भाजपा की यह जीत जितनी बड़ी और असाधारण है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारियां और चुनौतियां भी इसके साथ आई हैं। लंबे समय से एक अलग राजनीतिक संस्कृति में चल रहे इस राज्य को नई दिशा देना आसान काम नहीं होगा। यह जीत तो मुश्किल थी ही लेकिन भाजपा के लिए जीत के बाद असली परीक्षा अब शुरू होने जा रही है।
बंगाल में राजनीतिक हिंसा कोई नई बात नहीं है बल्कि यह वर्षों से चली आ रही एक व्यवस्था का हिस्सा बन चुकी है। चाहे कांग्रेस का शासन रहा हो, वामपंथी शासन रहा हो या तृणमूल कांग्रेस का दौर, विरोधियों को दबाने के लिए राज्य में हिंसा का इस्तेमाल किए जाने के आरोप लगातार लगते रहे हैं। सत्ता द्वारा पोषित गुड़ों का कहर लोगों पर टूटा है, महिलाओं की इज्जत-आबरू के साथ खिलवाड़ हुआ है और राजनीतिक हत्याओं के आंकड़े भी कम डराने वाले नहीं हैं।
अब भाजपा की नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि व्यवस्था का हिस्सा बन चुकी इस परंपरा को खत्म कैसे किया जाए। यह काम आसान नहीं होने जा रहा है, लेकिन भाजपा ने इस बात के संकेत दिया है कि वो इस हिंसा की इस संस्कृति को बदल देगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कार्यकर्ताओं को चुनावी जीत के बाद ‘बदला नहीं, बदलाव’ का संदेश इसी वजह से अहम है। इसका मतलब है कि कानून का राज कायम हो लेकिन बिना किसी प्रतिशोध की भावना के। साथ ही यह भी ज़रूरी होगा कि वर्षों से दबाव में रहे कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों को सुरक्षा और भरोसा मिल सके। यह संतुलन बनाना ही असली चुनौती है।
बंगाल की प्रशासनिक व्यवस्था पर भी लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। यह आरोप लगता रहा है कि सरकारी मशीनरी खासकर पुलिस और स्थानीय प्रशासन सत्ताधारी दल के प्रभाव में काम करती रही है। नई सरकार के लिए चुनौती यह है कि इस पूरे सिस्टम को निष्पक्ष बनाया जाए। लेकिन यह कोई ऐसा काम नहीं है जो एक दिन में हो जाए। हजारों अधिकारियों और कर्मचारियों को न तो तुरंत बदला जा सकता है, न ही हटाया जा सकता है। ऐसे में उनसे ईमानदारी और निष्पक्षता के साथ काम करवाना, सिस्टम में भरोसा लौटाना, यह एक धीमी लेकिन ज़रूरी प्रक्रिया होगी।
बंगाल में भाजपा के मुख्यमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार और ममता बनर्जी को चुनावी रण में पटखनी देने वाले शुभेंदु अधिकारी ने अपनी जीत के बाद कहा है कि ‘वे हिंदुओं के हक के लिए काम करेंगे’। हो सकता है कि यह बात सुनने में सांप्रदायिक लगे लेकिन बंगाल की जमीनी स्थिति को देखते हुए ऐसा करना बेहद ज़रूरी है। अब इन्हीं हिंदुओं ने एकजुट होकर हालात बदल दिए हैं, भगवा पार्टी को सत्ता में ला दिया है। तो ऐसे में अब पार्टी के सामने भी यह चुनौती है कि जिन हिंदुओं ने प्रताड़ना झेली उन्हें अब आगे ऐसी प्रताड़ना ना झेलनी पड़े, उनके लिए हालात सुरक्षित हों और सरकार की योजनाओं का लाभ उन लोगों तक सीधे पहुंचे। और ये फिर एक बार अपने ही देश में उपेक्षित या दोयम दर्जे के नागरिक जैसा ना महसूस करने लग जाएँ। पश्चिम बंगाल की जनता ने इस बार केवल सरकार नहीं बदली बल्कि अपने भीतर छुपे डर, गुस्से और उम्मीद तीनों को एक साथ भाजपा के सामने रख दिया है। यह जनादेश एक संदेश है कि लोग बदलाव चाहते हैं लेकिन वह बदलाव जमीनी हकीकत में दिखे यह भाजपा के शुभेंदु अधिकारी की जिम्मेदारी है। जनता ने अपना काम कर दिया है और अब बारी सत्ता में बैठने वाले भाजपाईयों की है कि वे जन आकांक्षा के अनुरूप शासन का संचालन करें।



