वामपंथी राजनीति को याद करते हुए
मैंने सरकारी संस्थाओं में भी काम किया है और गैर-सरकारी में भी, लेकिन मेरा झुकाव वामपंथ की ओर रहा है। ऐसा पहली बार हुआ है कि देश भर में किसी भी राज्य में वामपंथियों को बहुमत प्राप्त नहीं हुआ। यह बात अलग है कि मेरी पसंद की दूसरे नंबर की राजनीतिक पार्टी ने उस राज्य में बड़ हांक रही पार्टी भाजपा के पांव नहीं लगने दिए।
वहां इंडियन नेशनल कांग्रेस, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, केरल कांग्रेस (जोसेफ ) और रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के संयुक्त यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यू.डी.एफ.) ने बड़ी जीत हासिल की है। वैसे इस राज्य में 1967 से वामपंथी पार्टियों का बोलबाला रहा है। उस समय भी एम.एस. नंबूदरीपाद की लोकतांत्रिक सरकार बनी थी। केरल राज्य में ही दुनिया की पहली लोकतांत्रिक सरकार बनी थी। एक राज्य ने पूरी दुनिया में वामपंथियों को रौशन किया था।
जहां तक मेरा निजी संबंध है, मैं भारत सरकार का नौकर होते हुए भी जब कभी पंजाब आता तो जालन्धर के देश भगत यादगार हॉल में ज़रूर जाता, जहां पास के गांव गढ़ा के कामरेडों का पूरा प्रभाव था। यह बात अलग है कि तब मैं तब भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के पब्लिकेशन विभाग में सम्पादक था, जहां से मेरा सम्पर्क देश की दूसरी भाषाओं के सम्पादकों से हुआ। उनमें तमिलनाडु के डी. मुथुस्वामी, आंध्र प्रदेश के रामचंद्र राव ही नहीं, बल्कि केरल की राधा मेनन भी एक ही कमरे में बैठते थे।
वामपंथियों की दोस्ती का ज़िक्र करते हुए मुझे अपने गढ़ा के कामरेड भी याद आ गए, जिनके साथ मेरा संबंध अभी भी कायम है। गढ़ा के नोनिहाल चट्ठा ने अपनी बहन भूपिंदर की शादी मेरे मित्र बिक्रम गरचा से की थी। बिक्रम मेरे कार्यालय में खोज अधिकारी थे और लगभग छह महीने मेरे सहकर्मी रह कर दिल्ली क्लॉथ मिल में सलाहकार बन गए और वहां करीब दो साल बिताने के बाद वह जॉर्जिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बन गए।
बिक्रम और उनकी पत्नी जब भी भारत आते तो मुझसे मिले बिना नहीं जाते। अब तक उनका पूरा परिवार अमरीका में खुशी से रह रहा था। बुरी बात यह हुई कि पिछले हफ्ते पता चला कि अप्रैल में भूपिंदर के पहने हुए कपड़ों को उनके हाथ में पकड़ी मोमबत्ती ने छू लिया और भूपिंदर तथा उसके अस्तित्व को जला दिया।
इस घटना ने मुझे वामपंथियों के साथ अपनी साझ की याद ही नहीं दिलाई, बल्कि गढ़ा वाले कामरेड भी याद करवा दिए, जिनके साथ बिक्रम की शादी के बाद और मज़बूत संबंध बनते रहे। उनमें हरदयाल चोना उर्फ नेता जी मेरे साढू भी बने। अब तो डिजिटल युग के कारण सबकी खबर मिलती रहती है। मेरा मन अब भी कहता है कि अप्रिय खबरों को भुला कर यह सोचना चाहिए कि यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट सत्ता में आते रहें ताकि सांप्रदायिक ताकतों पर अंकुश लगे और देश की राजनीति सही दिशा की ओर लौटे जिसकी वर्तमान में बहुत ज़रूरत है।
पंजाबी यूनिवर्सिटी की विश्व पंजाबी कॉन्फ्रैंस
पंजाबी यूनिवर्सिटी में ‘पंजाबी लोकधारा : उपलब्धियां और संभावनाएं’ विषय पर आयोजित तीन दिवसीय विश्व पंजाबी कॉन्फ्रैंस सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गई है। पंजाबी साहित्य अध्ययन विभाग द्वारा आयोजित यूनिवर्सिटी के स्थापना दिवस को समर्पित इस कॉन्फ्रैंस का मुख्य विषय पंजाबी लोकधारा था। इस कॉन्फ्रैंस में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि लोकधारा सिर्फ अतीत की पेशकारी नहीं करती, बल्कि हमारे अस्तित्व का अहम हिस्सा है।
यहां लोकधारा के इतिहास और इसके विभिन्न रूपों पर भी चर्चा की गई। इस चर्चा में अपेक्षित योगदान देने वालों में यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर जगदीप सिंह और विभाग प्रमुख मोहन त्यागी के अलावा दो दर्जन विद्वान तथा अनुसंधानकर्ता शामिल थे, जिनमें भीमइन्द्र सिंह, दर्शन बुट्टर, मान सिंह ढींडसा, योगराज अंगरिश, सतीश कुमार वर्मा, गुरनायब सिंह, निवेदिता सिंह और अरविंदर संधू जाने-पहचाने नाम थे।
पाठकों की जानकारी के लिए यह बताना भी ज़रूरी है कि विश्व पंजाबी कॉन्फ्रैंस की नींव जून 1980 में ब्रिटेन में रहने वाले भारतीयों और पाकिस्तानियों ने रखी थी। मैं उस कॉन्फ्रैंस का चश्मदीद गवाह हूं। पाठकों के लिए तो यह बात भी नई होगी कि तब 80 वर्षीय जसवंत सिंह कंवल, संत सिंह सेखों और सोहन सिंह जोश पहली बार ब्रिटेन गए थे। जोश के कामरेड शिष्य और संत सिंह सेखों, हरिभजन सिंह और दिलीप टिवाना के रह चुके विद्यार्थी चाव से मिल रहे थे।
यह कॉन्फ्रैंस ब्रिटेन की प्रगतिशील लेखक सभा के प्रयास से हुई थी। रणजीत धीर, जुगिंदर शमशेर, साथी लुधियानवी, अवतार जंडियालवी और शिवचरण गिल इसके प्रबंधकों में शामिल थे। सोहन सिंह जोश की बुज़ुर्गी का बहुत प्रभाव था।
इस दो सप्ताह की इस कॉन्फ्रैंस के दौरान ब्रिटेन के पंजाबी साहित्यकारों ने अपने-अपने मेहमान सम्भाले हुए थे। मैं तथा संत सिंह सेखों मुख्य रूप से शिवचरण गिल के मेहमान थे। वैसे अवतार जंडियालवी और अजीत सतभमरा भी हमारी सेवा में उपस्थित रहते थे। संत सिंह सेखों मुझे अपने साथ अंगरक्षक की तरह रखते थे। पूरी दुनिया के पंजाबियों का बहुत समर्थन मिला।15 दिन भारत, पाकिस्तान, जर्मनी, नीदरलैंड, अमरीका और कनाडा के पंजाबी लेखक पूरे ब्रिटेन की यात्रा भी करते रहे।
यदि मुझसे पूछते हैं तो उस कॉन्फ्रैंस का सबसे बड़ा योगदान विश्व पंजाबी कॉन्फ्रैंसों की नींव रखना था। यही वजह है कि अब शहर, कस्बे और संस्थाएं भी ऐसी कॉन्फ्रैंसें आयोजित कर रही हैं। बड़ी बात यह है कि वे अपने स्थान तथा चर्चा के विषय सीमित करके उत्तम विधियों का केन्द्र बनते हैं। पंजाबी यूनिवर्सिटी में हुई कॉन्फ्रैंस इस बात की पुष्टि करती है।
ई-मेल : sandhugulzar@yahoo.com



