चक्रव्यूह बनते कोचिंग सैंटर और शिक्षण संस्थान
शिक्षण संस्थानों और कोचिंग सैंटरों में भिन्न-भिन्न कारणों से विद्यार्थियों में आत्महत्या की घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसा लगता है जैसे ऐसे कुछ स्थान विद्यार्थियों के लिए चक्रव्यूह बन जाते हैं जिसमें वे बहुत सारे सपने और दबावों के साथ घुस तो जाते हैं, लेकिन उन्हें भेदकर वापस नहीं निकल पाते। जैसे ही छोटी-बड़ी परीक्षाओं व नौकरियों के विज्ञापन अथवा परिणाम आते हैं, वैसे ही आजकल मीडिया तथा सोशल मीडिया में भी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करवाने वाले कोचिंग सैंटरों के बड़े-बड़े विज्ञापनों की भरमार होती चली जाती है। कोचिंग के लिए प्रवेश हेतु जहां एक ओर विभिन्न प्रकार की स्वरचित नियमावली, लुभावनी छूट एवं अन्य आकर्षण उपलब्ध हैं तो वहीं दूसरी ओर परीक्षा के परिणाम आते ही फोटो के साथ रैंकिंग में एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ भी साफ देखी जा सकती है।
यह मामला यहीं तक सीमित नहीं है। ये विज्ञापन स्वप्न दिखाते हैं और फिर पैकेज, प्लेसमेंट, सफलता दर आदि के नाम पर बच्चों, युवाओं और माता-पिता का भावनात्मक, मानसिक और आर्थिक शोषण भी कर रहे हैं। इन पर अंकुश लगाने हेतु शासन-प्रशासन की कोई नियमावली नहीं है। जब छोटी बड़ी कोई दुर्घटना होती है तो दो-चार दिन मीडिया में चर्चा होती है और फिर मामला नेपथ्य में चला जाता है। प्रत्येक बच्चे की अपनी क्षमताएं होती हैं, लेकिन कई बार माता-पिता की जबरदस्ती के कारण बच्चा केवल एक उपकरण बनकर रह जाता है। कई बार बच्चे की आर्थिक और भाषिक पृष्ठभूमि भिन्न होने से जब वह पढ़ाई के नए मध्यम एवं नए परिवेश में जाता है तो वह सामंजस्य नहीं बैठा पाता, जिससे उसका अवसाद ग्रस्त होना स्वाभाविक है। ध्यान रहे, घर में स्कूल में, कोचिंग केन्द्र्र पर, प्रवेश के बाद शिक्षण संस्थानों में और फिर अच्छे पैकेज वाली नौकरी के लिए बने तनाव और अवसाद का यह सिलसिला धीरे-धीरे भयावह विकृति का रूप ले लेता है। थोड़ी-सी भी असफलता व तनाव में वह निराश होकर आत्महत्या की ओर बढ़ जाता है।
पिछले दिनों आइआइटी बाम्बे से बीटेक करने के बाद बहु-राष्ट्रीय कंपनी से संबद्ध और फिर प्रशासनिक सेवा की तैयारी कर रहे अभिनव नामव युवक का सुसाइड नोट चिंतित करने वाला था, जिसमें लिखा था, ‘किसान-माली बन जाना, पढ़ाई का दबाव मत लेना।’ इस समाचार के अगले ही दिन दो और समाचार छपे। एक समाचार खड़गपुर से था। जहां एक संस्थान के कैंपस में मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के तीसरे वर्ष के छात्र जयवीर सिंह डोडिया ने आठवीं मंजिल से कूद कर आत्महत्या कर ली थी। विदित हो कि यहां वर्ष 2025 में सात छात्रों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई थी जिनमें से पांच के शव फंदे से लटके मिले थे। दूसरा समाचार हरियाणा के कुरुक्षेत्र से था, जहां हाल ही में एक संस्थान के बीटेक प्रथम वर्ष की एक छात्रा ने आत्महत्या की कोशिश की। वह बोली, ‘मीडिया को बुलाओ, कुछ सच्चाई बताना चाहती हूं।’ यह सच्चाई क्या है, यह अभी सामने आना बाकी है।
ज्ञात हो कि कुरुक्षेत्र में विगत दो महीने में चार विद्यार्थियों ने आत्महत्या कर ली, जिससे उपजे हगांमे के बाद प्रशासन ने 20 दिन की छुट्टी की घोषणा कर दी। क्या छुट्टी कर देने से अथवा इस प्रकार के मामलों को दबा देने से इस दिशा में सुधार होगा? ध्यान रहे आत्महत्याओं के अधिकांश मामले तकनीकी और प्रबंधन संस्थानों से अधिक आ रहे हैं। आज एक समाज, शिक्षण संस्थान और शासन-प्रशासन के नाते हमें गंभीरता से यह विचार करना होगा कि आखिर ये छात्र आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? क्या पाठ्यक्रमों की विसंगतियां इन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर कर रही हैं अथवा क्या हम इन्हें इतना भी शिक्षित नहीं कर पा रहे हैं कि वे जीवन में आने वाली छोटी-मोटी परेशारियों एवं तनाव को झेल सकें। सामान्यत: उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थी मित्रों, परिवार और समाज से दूर छात्रावास आदि में रहकर पढ़ाई करते हैं। दूर होने से कई बार विद्यार्थी अवसाद का शिकार हो जाते हैं। कई बार अकेले रहकर ऐसे विद्यार्थी ऑनलाइन गेमिंग एवं नशे जैसी बुराई के शिकार भी हो जाते हैं। देश के अनेक शिक्षण संस्थानों में ऐसे छात्रों की काउंसलिंग के लिए समुचित व्यवस्थाएं नहीं हैं। जहां हैं, वहां शर्म और डर भी एक बड़ी बाधा दिखाई देती है।
विगत दिनों प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 4 प्रतिशत की दर से छात्र आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार देश के महाराष्ट्र, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश वे राज्य हैं, जहां छात्र सबसे ज्यादा आत्महत्या करते हैं। आज हमें यह भी समझना होगा कि विकास-क्रम के साथ-साथ जीवन पद्धति और परिस्थितियों में भी बदलाव आ रहे हैं। तकनीक आधारित और अत्यधिक आधुनिक कही जाने वाली जीवनशैली अपने साथ कई प्रकार की विकृतियां भी लेकर आ रही है। क्या इन सब बातों को देखते हुए स्कूलों, महाविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में इन विकृतियों से निपटने हेतु प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था है? ध्यान रहे, किसी छात्र द्वारा आत्महत्या केवल एक जीवन की हानि नहीं है अपितु यह परिवार, समाज और राष्ट्र की बहुत बड़ी क्षति है। विकसित भारत का संकल्प जिन युवाओं के भरोसे आगे बढ़ रहा है, वे केवल मानव संसाधन नहीं है अपितु उस संकल्प की नींव हैं। इसलिए उनका शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ जीवन बहुत बड़ी आवश्यकता है। (अदिति फीचर्स)



