मणिपुर की आत्मा का उत्सव है लाई हाराओबा
भारत के उत्तर पूर्वी राज्य मणिपुर की सांस्कृतिक पहचान जितनी प्राचीन है, उतनी ही जीवंत भी है। इस पहचान का सबसे सुंदर और गहन प्रतीक है यहां का लाई हाराओबा उत्सव। इसका शाब्दिक मतलब है देवताओं की प्रसन्नता यानी ‘देव उत्सव’। यह पर्व न केवल मणिपुर की सभ्यता, यहां की लोक आस्था और जीवनदर्शन का जीवंत मंच है बल्कि इस उत्सव के जरिये मानव जीवन की नश्वर यात्रा और प्रकृति के साथ उसके आत्मीय संबंधों को भी भव्यतम ढंग से अभिव्यक्ति मिलती है। मुख्यत: मैतेई समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला यह उत्सव लगभग एक महीने तक चलता है, जो इस साल 19 अप्रैल से शुरु हुआ है और 12 मई 2026 को खत्म होगा। इस उत्सव में देवताओं की पूजा की जाती है, सृष्टि की उत्पत्ति का जश्न मनाया जाता है और मानव जीवन की यात्रा तथा प्रकृति के साथ उसके संबंधों को बेहतर से बेहतर बनाने की कोशिशें की जाती हैं। कुल मिलाकर यह उत्सव उमंग और उत्साह की सामूहिक अभिव्यक्ति होता है।
मणिपुर समाज मूलत: धार्मिक और उत्सवप्रिय समाज है। अपनी परम्पराओं पर मणिपुर के लोगों को न सिर्फ श्रद्धा बल्कि अत्यंत गर्व है। इसलिए प्राचीनकाल से ही मैतेई समुदाय द्वारा मनाये जाने वाले इस उत्सव में आजतक बाजार या किसी दूसरे कारकों का जरा भी असर नहीं पड़ा जिससे कि इस उत्सव में कभी कोई कमी दिखी हो। मैतेई समुदाय के लोग अपने पुरखों द्वारा मनाये जाने वाले देवताओं की पूजा का यह उत्सव आज भी उतनी ही उत्साह और उमंग के साथ मनाते हैं। हालांकि पिछले कई सालों से मणिपुर बेहद तनाव से गुजरा रहा था जिस कारण पिछले कुछ सालों से इस उत्सव का वह रंग देखने को नहीं मिला, जिसके लिए यह प्रसिद्ध रहा है। लेकिन इस साल थोड़ी शांति है और धीरे-धीरे स्थिरता भी आ रही है। शायद यही वजह कि कई सालों के बाद इस साल लाई हाराओबा उत्सव की शुरुआत फिर से हुई है और इसमें बड़े पैमाने पर लोग उत्साह के साथ भागीदारी कर रहे हैं।
इस उत्सव में ‘मैबी’ जिसका मतलब होता है महिला पुजारिनें और ‘मैबा’ यानी पुरुष पुजारी, ये दोनों ही इस उत्सव के मुख्य पात्र होते हैं। उत्सव के दौरान महिला पुजारिनों द्वारा किया जाने वाला भव्य लोकनृत्य केवल मनोरंजनभर नहीं होता बल्कि सृष्टि के क्रमिक विकास की इस नृत्य में एक लयात्मक कथा प्रस्तुत की जाती है। ये कथाविद्ध नृत्य अलग-अलग विषयों में अलग-अलग भाव-भंगिमाओं वाले होते हैं और इन नृत्यों के विषय मुख्यत: पृथ्वी की उत्पत्ति, मानव का जन्म, कृषि की शुरुआत, प्रेम और सामाजिक संबंधों को बड़े विस्तार और बड़े मनोभावनात्मक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है।
ये नृत्य एक तरह से पृथ्वी में जीवन उत्पन्न होने की क्रमिक ढंग से कहानी कहते हैं। कुल मिलाकर लाई हाराओबा उत्सव एक तरह से मानव जीवन का लोक इतिहास है, जिसे सदियों से मैतेई समाज अपनी आने वाली पीढ़ियों को विरासत के रूप में सौंपता रहा है। इसलिए कहते हैं मणिपुर की संस्कृति को समझना हो तो यहां के लाई हाराओबा उत्सव में शामिल होना चाहिए या उसे प्रत्यक्ष देखना चाहिए।
इस उत्सव में स्थानीय मिथकों, लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं का बेहद सुंदर और सकारात्मक समावेश है।
इस उत्सव से इस समुदाय की न केवल धार्मिक आस्था का पता चलता है बल्कि इस समाज के नैतिक मूल्यों और जीवन जीने के तौर-तरीकों की भी झलक मिलती है। यह उत्सव विशेषत: पंथोइबी और निंगथौ जैसे देवी-देवताओं की सरस कथाओं को नृत्य और गीत के साथ जीवंत ढंग से पेश करने का तरीका है। जैसे कि उत्तर-पूर्व के ज्यादातर उत्सव व्यक्तिगत न होकर सामुदायिक होते हैं, उसी तरह यह भी सामुदायिक उत्सव है। पूरा समुदाय एक साथ मिलकर इस खुशी का आयोजन करता है, इसमें हिस्सेदारी करता है और उसका आनंद उठाता है। लाई हाराओबा उत्सव कोई एक व्यक्ति नहीं मनाता बल्कि पूरा गांव, पूरा समुदाय मिलकर इस उत्सव को मनाता है, लेकिन इस उत्सव में हरके व्यक्ति की अपनी एक विशिष्ट भूमिका होती है। चाहे उसे अनुष्ठान में भाग लेना हो, चाहे नृत्य करना हो, चाहे कोई विशेष वाद्य बजाना हो, चाहे खाना बनाना हो या उसमें सहयोग करना हो और कुछ नहीं तो कुछ लोगों की ज़िम्मेदारी सिर्फ सफाई करना और आयोजन स्थल की सुरक्षा करना भी होता है। इस प्रकार लाई हाराओबा उत्सव में समाज का हर व्यक्ति हिस्सा लेता है और हरके की एक निश्चित भूमिका होती है।
इस उत्सव में, जिसे मणिपुर की आत्मा का उत्सव कहा जाता है, वाद्ययंत्रों का भी विशेष महत्व है।
खास करके मणिपुरी ड्रम का, जिसे यहां की स्थानीय भाषा में ‘पुंग’ कहते हैं और ऐसा ही एक दूसरा वाद्य जो बहुत मशहूर है, उसे ‘पेना’ कहा जाता है। यह एक पारंपरिक तंतुवाद्य होता है, जिससे सुरीली धुनें विकसित की जाती है। इन दोनो वाद्यों की संगति से निकली ध्वनि पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर कर देती है। लाई हाराओबा उत्सव में ध्वनियों का भी एक विशिष्ट महत्व होता है। यह दर्शकों को आध्यात्मिक ऊर्जा और अनुभव प्रदान करती हैं और ध्वनि निकालने की अपनी विशिष्टता से ही किसी वादक को बेहतर या कमतर वादक माना जाता है और हां, यह सामूहिक उत्सव केवल अतीत की गाथाओं को ही नहीं दोहराता और न ही सिर्फ परंपराओं के प्रति आदर व्यक्त करता है। यह वर्तमान और भविष्य के लिए ज़रूरी दिशा-निर्देश और मार्गदर्शन प्रस्तुत करता है।
इस उत्सव में प्रकृति के प्रति सम्मान, सामूहिक जीवन और संतुलित अस्तित्व का संदेश बार-बार दिया जाता है। यही कारण है कि आज जब बाजार के हस्तक्षेप से ज्यादातर उत्सवों को खर्च करने की क्षमता का प्रदर्शन करना बना दिया गया है, वहीं लाई हाराओबा जैसे उत्सव जीवंत और आत्मीय बने हुए हैं। इसीलिए इसे मणिपुर की आत्मा का उत्सव कहा जाता है, जो हमें सीख देता है कि संस्कृति केवल अतीत की धरोहर नहीं बल्कि वर्तमान के जीने का ढंग भी होती है। -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर




