बहानेबाजी का युग है यह
बेशक आज कलियुग है जहां दया, धर्म, शर्म, लिहाज, सच्चाई, ईमानदारी, कठिन परिश्रम, नैतिकता, कर्तव्यपरायणता आदि पर चलने वाले को दकियानूसी तथा पुराने विचारों वाला कहकर दुतकारा तथा फटकारा जाता है, लेकिन इससे भी बड़ा कटु सत्य यह है कि हमारा आज का बहानेबाजी का भी कमाल का युग है जहां लोग या तो कुछ करते नहीं या फिर बहुत कम करते हैं, लेकिन उसकी भी प्रशंसा/शाबासी हद से ज्यादा लेना चाहते हैं।
मुलतानी भाषा में एक कहावत है ‘मन हरामी ते हुज्जतां ढेर’ अगर हम किसी काम को न करना चाहें तो उसके लिए हम हजारों बढ़ाने ढूंढ लेते हैं। असल में किसी काम को करने या न करने की बात हमारे मन की मर्जी पर निर्भर करती है। अगर किसी काम को न करना हो तो उसके विरुद्ध तर्कों की भी हमारे पास कमी नहीं होती। कई बार तो किसी काम को करने या न करने का हमें पता ही नहीं होता, उससे बचने के लिए हम बढ़ाने ढूंढ़ते रहते हैं।
बहानेबाजी के लिए झूठ, पाखण्ड, फरेब, छलित्र दूसरे को गलत साबित करना, पैंतरेबाजी वाक्पटुता आदि में माहिर होना ज़रुरी है। बचपन में स्कूल जाने से बचने के लिए हम कभी पेट दर्द, कभी सिर तो कभी कान दर्द, उल्टियां या फिर पेट में गड़बड़ी होने के बहाने लगाते रहे हैं। ऐसा ही नहीं कि बहानेबाजी हमारे वर्तमान युग की ही देन है। यह तो युगों-युगांतरों से हमारे साथ रही है।
साहित्य में तो इसका प्रभाव बहुत देखने को मिलता है। कालिदास का प्रयोग चालाक लेकिन विद्वान पंडितों के विद्वती महारानी के खिलाफ कितनी चतुर बहानेबाजी से कर उन दोनों का विवाह करा दिया, यह हम सब अच्छी तरह जानते हैं। वो बात अलग है कि विद्वपी महारानी ने कितनी मेहनत तथा समझदारी से कालिदास को पढ़ा-लिखाकर इतना बड़ा विद्वान बना दिया, जिसकी मिसाल दुनिया में नहीं मिलती।
बहानेबाजी की प्रचलित प्रथा को ‘नाच न जाने आंगन टेढ़ा’ या फिर ‘न नौ मन तेल होता और न राधा नाचेगी’ को लेकर ही तो कहा जाता है। बात दिल्ली की है और चांदनी चौक इलाके की है। एक आदमी ने किसी के कुछ रुपये देने थे। बार-बार मांगने पर भी वह पैसे नहीं लौटा रहा था। एक दिन लेनदार ने देनदार पर दबाव बनाते हुए कहा, ‘आज मैं तुम्हारे से अपने पैसे लेकर ही जाऊंगा।’
ऐसे में देनदार ने कहा-‘चलो, मैं तुम्हें किसी से लेकर देता हूं।’ देनदार लेनदार को सुबह से शाम तक कभी खारी बावली, कभी पतासे वाली गली, कभी नई सड़क तो कभी कहां घुमाता रहा। आखिर एक बंद दुकान को दिखाकर और माथा पीटते हुए लेनदार को कहा-‘इसी दुकान वाले से ही मांगकर मैंने अपना कर्ज चुकाना था और यही बंद है। फूट गई किस्मत। अब तो बात कल परसों पर जा पड़ी।’ अब इससे बढ़कर और क्या बहानेबाजी होगी। लोग भी न जाने कैसे-कैसे बहाने बनाते हैं। लोग बहाने बनाने में एक्सपर्ट होते हैं। मौके के मुताबिक ऐसा बहाना बनाकर दूसरे को बेवकूफ बनाते हैं कि दूसरा हक्का-बक्का रह जाता है। आप हर रोज ऐसे भिखारियों को देखते होंगे जो कि नकली जख्मों पर पट्टियां बांधकर, अपने अंधे, लंगड़े, लूले तथा बहरे होने के सर्टिफिकेट को दिखाकर भीख मांग रहे होते हैं। कुछ और अपने बेटे के दाहसंस्कार के लिए तो कुछ अपनी बेटी के विवाह के खर्चे के लिए भीख मांगते देखे जा सकते हैं। ये लोग कठिन परिश्रम करके कमाने वाले श्रमिकों के मुकाबले में भी ज्यादा भीख बटोरते हैं, शाम को विलायती शराब के जाम का मजा लेते हैं तथा अपने बच्चों को फर्स्टक्लास स्कूलों में पढ़ाते हैं। कोई -कोई भिखारी तो इनकम टैक्स भी देता है, है न कमाल की बहानेबाजी से पैसा कमाने का यह अनूठा ढंग।
एक अफसर अपने अधीनस्थ अधिकारी को बहानेबाजी के गुर्र सिखा रहा था। अगर आपने अपनी बीवी के साथ फिल्म का मैटिनी शो देखना हो तो छुट्टी लेने के लिए कभी भी साफ-साफ ऐसा मत लिखा। बल्कि लिखो कि बीवी की तबितय खराब है, उसे डॉक्टर के पास दिखाने के लिए ले जाना है। बेशक फिर उसे चाहे मैटिनी शो पर ले जाओ या फिर अपनी गर्लफ्रेंड के साथ पिकनिक का आनंद उठाओ। अगर कभी दफ्तर से छुट्टी होने पर दोस्तों के साथ गपशप लगाने, ताश खेलने या वाइन के दो पैग लगाने की इच्छा हो तो टेलीफोन पर बीवी पर को सूचना दे दो कि आज दफ्तर में ज़रुरी मीटिंग या फिर ओवरटाइम करने की वजह से देरी हो जाएगी। हां, घर जाते समय बीवी की कोई मनपसंद चीज ले जाना मत भूलें।
बहानेबाजी को लेकर हमारे राजनेता को एक से बढ़कर एक गुरु घंटाल हैं। चुनावों से पहले वे किसी को भाई, किसी को दोस्त, किसी को मां तो किसी को बाप कहकर संबोधित करते हैं। लेकिन चुनाव जीतने के बाद जब लोग उनके पास कोई काम कराने जाते हैं तो नेताजी ज़रुरी मीटिंग में है, सो रहे हैं, तबियत ठीक नहीं है, डॉक्टर ने रेस्ट बताया है, बाहर गये हैं, पता नहीं कब आयेंगे आदि बहानों से उन्हीं मतदातों को टर्का दिया जाता है जिनके सामने उन्होंने कुछ दिन पहले दंडवत प्रणाम करते हुए नाक रगड़ा था।
पत्नियां अपने पतियों को मुट्ठी में बंद रखने के लिए तरह-तरह के बहाने बनाती हैं। जो जितनी बड़ी बहानेबाज होगी उतनी ही ज्यादा सफल गृहिणी होगी। घर का सारा काम पति से करायेगी, किट्टी पार्टी में जायेगी और पलंग पर बैठकर ठाठ से टीवी देखेगी या मोबाइल पर अपने मां-बाप या सहेलियों से गप्पे हांकेगी। जो पत्नियां अपने बच्चों की देखभाल करने को मुसीबत समझती हैं, वे कोई न कोई बहाना लगाकर घर में बच्चों के लिए आया लगवाती हैं, होमवर्क कराने के लिए ट्यूशन रखवाती है या फिर बच्चों को किसी दूर के स्कूल तथा होस्टल में भेज देती हैं।
लेकिन बहानेबाजों को संभल-संभल कर चलना चाहिए। काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। रंगे हाथों पकड़े जाने पर मुसीबत भी खड़ी हो सकती है, 420 का केस भी बन सकता है, जूते भी पड़ सकते हैं, उम्र भर का विश्वास भी खत्म हो सकता है। लेकिन एक चतुर, स्याना तथा सफल बहानेबाज हर बार नये-नये बहाने इस्तेमाल करता है और यह भी याद रखता है कि अपना उल्लू सीधा करने के लिए कब, कहां तथा किसके आगे कौन-सा बहाना लगाया था। इसलिए जब तक बहानेबाजी की गाड़ी चल सकती है, कौन न चलाना चाहेगा।
(सुमन सागर)



